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BBC Documentary Row: बीबीसी की विश्वसनीयता का बढ़ता संकट

बीबीसी जैसे अंतरराष्ट्रीय मीडिया संस्थानों ने पिछले पचास वर्षों में जो किया है, उसका सन्दर्भ लेकर ही उसकी आज की हरकतें देखी जाएंगी।

BBC Documentary Row

BBC Documentary Row: कुछ वर्ष पहले (2019 में) एक अंतरराष्ट्रीय सर्वे संस्था (Ipsos MORI) ने एक सर्वेक्षण के जरिए ये जानने का प्रयास किया कि ब्रिटिश जनता समाचारों के विषय में क्या सोचती है। इस सर्वेक्षण के नतीजे बताते हैं कि करीब 44% ब्रिटिश लोग बीबीसी को निष्पक्ष मानते थे, केवल 3% ने गार्डियन अख़बार चुना था और और एक-एक प्रतिशत लोग ऐसे थे जो अल जजीरा, डेली मेल और सन जैसे स्रोतों पर भरोसा करते थे।

जैसा कि दूसरे सभी चैनलों के साथ भी हुआ होगा, कोविड-19 के प्रकोप के दौरान लोग घरों में रहे और इससे टीवी, इन्टरनेट-यू ट्यूब, ओटीटी चैनल आदि देखने वालों की गिनती भी बढ़ी। ये जरूर था कि इसी दौर में बीबीसी देखने वालों की गिनती बढ़ी, लेकिन साथ ही चीन ने झूठी ख़बरें (फेक न्यूज़) चलाने के आरोप में बीबीसी को प्रतिबंधित भी किया। आज अगर विश्वसनीयता की बात की जाए तो बीबीसी की विश्वसनीयता पचास वर्ष पहले की तुलना में काफी कम ही होगी।

ऐसा संभवतः इसलिए है क्योंकि वामपंथी झुकाव का आरोप बीबीसी पर मार्गरेट थेचर के काल से, यानि अस्सी के दशक से ही लगता रहा है। मार्गरेट थेचर की ही कंजर्वेटिव पार्टी के नार्मन टेब्बिट बीबीसी को "देशविहीन लोगों का ब्राडकास्टिंग कॉरपोरेशन" या मोटे तौर पर देशद्रोही कहते थे। इसी पार्टी के सांसद रहे पीटर ब्रुइन्वेल्स तो एक कदम और आगे बढ़कर इसे "बोल्शेविक ब्रॉडकास्टिंग कॉरपोरेशन" बुलाते थे।

अब सवाल उठता है कि अगर व्यूअरशिप यानि देखने वालों की गिनती घट रही होगी तो बीबीसी कोई सुधार क्यों नहीं करता? इसकी वजह यह है कि बीबीसी का आर्थिक मॉडल काफी हद तक किसी सरकारी संस्था जैसा है। बीबीसी देखने के लिए ब्रिटेन के 95% प्रतिशत घरों से प्रतिवर्ष लगभग 16500 रुपये (दो सौ डॉलर के लगभग) का शुल्क/कर लिया जाता है। बुजुर्ग जो 75 वर्ष से ऊपर हैं या बहुत गरीब लोग 1998 के बाद से इस "देखने के कर" से मुक्त हैं। यानि बीबीसी ब्रिटिश करदाताओं के पैसे से चलता है और जब मजबूरी में टैक्स देना ही है, तो लोग चैनल भी देख लेते होंगे।

जो फेक न्यूज़ या अफवाहें बीबीसी समाचारों के नाम पर चलाती रही है, उसकी शुरुआत का दौर अभी जैसा नहीं था। ये एक निजी कंपनी की तरह 1922 में स्थापित हुई और अभी वाला जो आर्थिक स्वरुप है, उस स्वरुप में यह पांच वर्ष बाद 1927 में आई। इसका मतलब ये होता है कि इस वर्ष बीबीसी को सौ साल का घोषित किया जाए तो कोई इसे भी यह कहता हुआ गलत समाचार घोषित कर सकता है कि मौजूदा स्वरुप में, करदाताओं के पैसे से चलने वाली कंपनी तो 1927 में बनी, इसलिए अभी सौ वर्ष नहीं हुए।

जहां तक हाल के दौर की फर्जी ख़बरों की बात है, जियोपॉलिटिक्स यानि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देशों के बीच की राजनीति को प्रभावित करने में 2000 से अधिक संवाददाताओं और 50 न्यूज़ ब्यूरो वाले इस संगठन का काफी योगदान रहा है। सिर्फ हाल की घटनाओं को देखें तो बीबीसी की पोल इतनी तेजी से खुलने की एक बड़ी वजह इन्टरनेट का फैलना भी रहा। सोशल मीडिया के होने से लोग आसानी से बीबीसी द्वारा फैलाए जा रहे भ्रमों को तोड़ने लगे हैं।

इसके अलावा कई भूतपूर्व कर्मचारियों और पत्रकारों ने भी एकतरफा झुकाव होने के आरोप बीबीसी पर लगाए हैं। एंथनी जे के अलावा उत्तरी अमेरिका के संपादक जस्टिन वेब्ब, "टुडे" नामक कार्यक्रम के संपादक रॉड लिड्डल, भूतपूर्व संवाददाता रोबिन एटकिन और समाचार प्रस्तुतकर्ता पीटर सिस्सन्स ने भी पक्षपात के आरोप बीबीसी और उसके प्रबंधन पर लगाए हैं।

राजनैतिक मामलों के एक संपादक एंड्रू मार्क ने 2006 में ही यह आरोप लगाना शुरू कर दिया था कि जिस किस्म के लोगों को बीबीसी काम पर रखता है, उसके कारण यह कोई निष्पक्ष राजनैतिक विचार नहीं रखता बल्कि एक सांस्कृतिक पक्ष की ही बात कर रहा होता है। कई पुस्तकों के लेखक पीटर ओबोर्न ने भी इस विषय पर काफी लिखा है। पीटर ओबोर्न का कहना था कि वामपंथी और तथाकथित प्रगतिशील (लिबरल) कहलाने वाले एक अभिजात्य वर्ग के पक्ष में बीबीसी एक महत्वपूर्ण स्रोत की तरह और कई बार तो एक घातक हथियार की तरह काम करता है।

पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन अंतरराष्ट्रीय मंचों पर एक बड़ा मुद्दा रहा है। अचानक एक बच्ची (ग्रेटा थम्बर्ग) का समाचारों में आ जाना और छा जाना हम सभी देख चुके हैं। भारत के किसान आन्दोलन के समय इसी ग्रेटा थम्बर्ग के एक टूलकिट बांटने और अलगाव को बढ़ावा देने की कोशिशों को भी हम सभी ने देखा है। विकासशील देशों पर दबाव बनाने और विकसित देशों और ब्रिटिश हितों को बढ़ावा देने के लिए बीबीसी ने कई बार पर्यावरण से सम्बंधित फर्जी डाक्यूमेंट्री बनाई और प्रसारित की है।

"ह्यूमन प्लेनेट" नाम की एक डाक्यूमेंट्री में जब ये सिद्ध हो गया कि कई हिस्से चिड़ियाघर में शूट किये गए हैं तो बीबीसी ने इसे स्वीकारा भी था। इसके बाद 2011 में अमेज़न और नेटफ्लिक्स के ओटीटी प्लेटफार्म से इस डाक्यूमेंट्री को हटाना भी पड़ा था। कथित रूप से पर्यावरण सुरक्षा की पैरोकार बीबीसी और दूसरे ऐसे मीडिया संस्थान, कैसे अपने हितों के लिए किसी गरीब, "थर्ड वर्ल्ड" के माने जाने वाले देश को नीचा दिखाते हैं, ये भी इस डाक्यूमेंट्री की पोल खुलने से साबित हो गया था। विशुद्ध समाचारों को छोड़ भी दें तो तथाकथित सम्पादकीय (ओपिनियन, एडिटोरियल, ऑप एड) और कार्टून के जरिये जो किया जाता है, वो नजर आता ही रहता है।

चुनावों को प्रभावित करने में बीबीसी की कितनी रूचि होती है, इसका अनुमान आप 2019 में हुए ब्रिटिश चुनावों के दौर के प्रसारण से लगा सकते हैं। "बीबीसी क्वेश्चन टाइम" के एक विशेष एपिसोड में तत्कालीन प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन के एक प्रश्न पर दर्शक जब हंस पड़े तो उस हिस्से को बीबीसी ने हटा दिया। दबाव बढ़ने पर बीबीसी ने अपनी गलती स्वीकारी थी। विपक्षी नेताओं जेरेमी कोर्बिन और जो स्विनसन से जैसे कड़े सवाल किये जाते थे, वैसे कड़े सवाल कभी बोरिस जॉनसन से पूछे ही नहीं गए थे।

स्वयं को आरोपों से बचाने के लिए बीबीसी ने कहा था कि 29 नवम्बर 2019 के आतंकी हमलों को ध्यान में रखते हुए राष्ट्रहित में कई फैसले लिए गए थे। नस्लीय भेदभाव के आरोप भी बीबीसी पर रहे हैं। ईराक पर हमले को 2003 में कवर करने वाले एक भूतपूर्व बीबीसी के युद्ध संवाददाता रागेह ओमार ने 2006 में बीबीसी को "गोरे लोगों का क्लब" कहते हुए इस्तीफा दे दिया था। ब्रिटेन के एक सिक्खों के संगठन "ब्रिटेन्स नेटवर्क ऑफ़ सिख आर्गेनाइजेशन्स" ने भी सामाजिक सौहार्द और सरोकारों के लिए कुछ भी न करने का आरोप बीबीसी और दूसरे संगठनों पर लगाया था।

इतना जानने समझने के बाद जब हम भारत की ओर देखते हैं, तो यह समझ आता है कि बीबीसी क्यों भारत के प्रति एक "संस्थानिक घृणा" से ग्रस्त है। अधिकांश मामलों में भारत की सोच बीबीसी की सोच से ठीक विपरीत दिशा में है। एक तो उपनिवेशवाद के दौर में बनी संस्था को वर्षों भारत के पक्ष में कुछ दिखाने की आदत नहीं होगी। फिर जब भारत स्वतंत्र हुआ और फिरंगी खदेड़े गए, तब उन्हीं के कर से चलने वाले संगठन को कुछ ख़ास अच्छा तो नहीं ही लगा होगा।

जिस भारत के जल्दी ही विखंडित हो जाने की वो सोचते थे, वहां "अनेकता में एकता" दिखती रही और ब्रिटिश ब्रॉडकास्टिंग कॉरपोरेशन पर नस्लीय भेदभाव के आरोप लगते रहे। जिस धार्मिक सहिष्णुता का परिचय भारत देता है, उससे भी इस संगठन का दूर-दूर तक वास्ता नहीं रहा है। ऐसे में भारत जब कोविड-19 काल के बाद भी तेजी से, जीडीपी के मामले में विश्व के पांचवे स्थान पर पहुंचने लगा है तो भारत के नेतृत्व को खराब दिखाना तो बीबीसी के लिए आवश्यक ही था। अगले ही वर्ष भारत में लोकसभा चुनाव हैं, और बीबीसी की गुजरात पर नयी डाक्यूमेंट्री को चुनाव प्रचारों की शुरुआत की तरह ही देखा जाना चाहिए।

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    अंतरराष्ट्रीय बिरादरी को भारत में किस तरह के नेतृत्व से समस्या है, प्रधानमंत्री पर आई डाक्यूमेंट्री यही बताती है। दूसरे देशों के न्यायालयों को एक उपनिवेशवादी देश किस नजर से देखता है, डाक्यूमेंट्री ये भी बताती है। रही बात उद्देश्य की तो जिसकी छवि बिगाड़ने के उद्देश्य से यह फर्जी डाक्यूमेंट्री बीबीसी ने बनाई थी, उसे कोई नुकसान होने के बदले उल्टा समर्थन ही मिल रहा है। बदलता भारत अपना हित पहचानने लगा है, ये विश्व समुदाय को जितनी जल्दी समझ में आ जाये, उतना बेहतर ही होगा।

    यह भी पढ़ें: BBC Documentary: बीबीसी ने उठाए भारत की न्यायपालिका पर सवाल

    (इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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