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Comment on Sita: रामायण, महाभारत के मूल संदर्भ और दिव्यकीर्ति के विवादित बोल

Comment on Sita: विकास दिव्यकीर्ति ने अपने यूट्यूब चैनल 'दृष्टि IAS' में साल 2018 में कहा था, "हे सीते अगर तुम्हें लगता है कि मैंने ये युद्ध तुम्हारे लिए लड़ा है, वह तुम्हारी गलतफहमी है। युद्ध तुम्हारे लिए नहीं लड़ा है, युद्ध कुल के सम्मान के लिए लड़ा है और रही तुम्हारी बात जैसे कुत्ते द्वारा चाटे जाने के बाद घी भोजन योग्य नहीं रहता है, वैसे तुम अब मेरे योग्य नहीं हो।"

Controversy on comment on Sita by ias divyakirti

अब यह वीडियो क्लिप वायरल हो रही है। उन्होंने इस प्रसंग का उल्लेख जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के प्रोफेसर, पुरषोत्तम अग्रवाल की पुस्तक 'संस्कृति वर्चस्व और प्रतिरोध' को आधार बना कर दिया था।

अग्रवाल की इस पुस्तक में वाल्मीकि रामायण के उत्तर कांड का उल्लेख करते हुए लिखा है, "क्या कोई अच्छे वंश में जन्मा पुरुष ऐसी नारी को, जो दूसरे के घर में रह कर आई हो, मैत्री के लोभ में पुनर्वार करेगा? रावण की अंक-कलंकिता तथा उसकी दृष्टि से दूषिता तुम जैसी नारी को मैं अपने महान वंश को दूषित करके किस प्रकार दूसरी बार ग्रहण करूँगा। जिस कारण मैंने तुम्हारा उद्धार किया है, वह उद्देश्य मेरा सिद्ध हो गया - तुममें मेरी अब कोई आसक्ति नहीं। जहाँ इच्छा हो वहां चली जाओ।" इसी पुस्तक में 'कुत्ते और घी' का भी जिक्र महाभारत को आधार बनाकर दिया गया है।

दिव्यकीर्ति के उस यूट्यूब वीडियो पर जब हंगामा मचा तो उन्होंने एक बार फिर इन प्रसंगों का समर्थन उनके मूलभूत स्रोत के आधार पर देने का प्रयास किया। इस बार उन्होंने कहा कि उनका अधिकतर समय ट्विटर पर नहीं बल्कि अध्ययन में गुजरता है।

दिव्यकीर्ति ने अपनी बात को अधिक मुखरता से और गीता प्रेस द्वारा प्रकाशित महाभारत की प्रति को दिखाते हुए कहा कि "महाभारत के रामोपाख्यान में राम का कथन और भी हृदय विदारक है। अब तुम सचरित्र या दुश्चरित्र, जो भी हो, मैथली! मैं तुम्हारा परिभोग नहीं कर सकता, तुम कुत्ते के द्वारा चाटे गए घी की तरह हो, जिसका उपयोग संभव नहीं।"

वाल्मीकि रामायण क्या कहती है

पहली बात तो एकदम स्पष्ट है कि वाल्मीकि रामायण में 'कुत्ते और घी' का कोई उल्लेख नहीं है। पुरषोत्तम अग्रवाल ने सिर्फ सीता के त्याग की बात कही है। इसलिए इस प्रसंग को वाल्मीकि रामायण से जबरन नहीं जोड़ा जा सकता है। अब बात करते है गीता प्रेस गोरखपुर द्वारा प्रकाशित श्री वाल्मीकि रामायण की। गीता प्रेस द्वारा प्रकाशित 47वें मुद्रण में इस महाकाव्य को दो खण्डों में बांटा गया है। पहला खंड, बालकांड से किष्किन्धाकांड तक है और दूसरा, सुन्दरकांड से उत्तरकांड तक है।

माता सीता को त्यागने का उल्लेख गीता प्रेस द्वारा प्रकाशित वाल्मीकि रामायण के पहले खंड में नहीं है, बल्कि दूसरे खंड में है। इस खंड के युद्धकांड में 'सीता के चरित्र पर संदेह करके श्रीराम का उन्हें ग्रहण करने से इनकार करना और अन्यत्र जाने के लिए कहना' का पूरा प्रसंग मिलता है। यह पच्चदशाधिकशततमः सर्गः है और पृष्ठ संख्या 619 से लेकर 621 तक उपलब्ध है।

दिव्यकीर्ति कहते है कि इस प्रसंग का उल्लेख उत्तरकांड में है, जबकि 47वें मुद्रण में यह युद्धकांड में है। यह ठीक है कि पच्चदशाधिकशततमः सर्गः में सीता को त्यागने का वर्णन किया गया है, जिसका 17वां श्लोक का हिंदी भावार्थ इस प्रकार है, "तुम्हारे चरित्र में सदेश का अवसर उपस्थित है; फिर भी तुम मेरे सामने खड़ी हो। जैसे आँख के रोगी को दीपक की ज्योति नहीं सुहाती, उसी प्रकार आज तुम मुझे अप्रिय जान पड़ती हो।"

इस प्रसंग में कही भी 'कुत्ते और घी' जैसे शब्दों का इस्तेमाल नहीं किया गया है। दिव्यकीर्ति ने अपनी बात को रखने के लिए जानबूझकर बिना तथ्यों के वाल्मीकि रामायण को इस प्रसंग से जोड़ दिया है।

क्या सिर्फ गीता प्रेस द्वारा ही रामायण का अनुवाद किया गया है

रामायण मूलतः संस्कृत में है। गीता प्रेस के अलावा भी इसके हिंदी में कई अनुवाद उपलब्ध है। जैसे वर्ष 1929 में लाहौर स्थित डीएवी कॉलेज के प्रोफेसर, पंडित राजाराम ने भी वाल्मीकि रामायण का हिंदी में अनुवाद किया है।

उन्होंने भी इस प्रसंग का उल्लेख युद्धकांड में किया है। वे पृष्ठ संख्या 693 पर 17वें श्लोक का हिंदी अनुवाद इस प्रकार करते है, "जिसके चरित्र में संदेह (का अवसर) हुआ है, वह मेरे सामने स्थित नेत्र रोगी को दीपक की तरह तू निःसंदेह प्रतिकूल है।" इसप्रकार वाल्मीकि रामायण के इस अनुवाद में भी 'कुत्ते और घी' का कोई उल्लेख नहीं मिलता है।

महाभारत क्या कहती है

वास्तव में, दिव्यकीर्ति ने पुरषोत्तम अग्रवाल की पुस्तक के आधार पर 'कुत्ते और घी' को गीता प्रेस द्वारा प्रकाशित महाभारत से जोड़ा है। यह ठीक है कि गीता प्रेस द्वारा प्रकाशित महाभारत के रामोपाख्यानपर्व में 'श्रीराम का सीता के प्रति संदेह, देवताओं द्वारा सीता की शुद्धि का समर्थन, श्रीराम का दल-बल सहित लंका से प्रस्थान एवं किष्किन्धा होते हुए अयोध्या में पहुंचकर भरत से मिलना तथा राज्य पर अभिषिक्त होना' का प्रसंग मिलता है।

यह 15वें मुद्रण का एकनवत्यधिकद्विशततमोअध्यायः है। इसमें कुल 70 श्लोक है, जिसके 13वें श्लोक में मार्कंडेय उवाच का हिंदी भावार्थ इस प्रकार है, "मिथिलेशनन्दिनी! तुम्हारा आचार-विचार शुद्ध रह गया हो अथवा अशुद्ध, अब मैं तुम्हे अपने उपयोग में नहीं ला सकता - ठीक उसी तरह, जैसे कुत्ते के चाटे हुए हविष्य को कोई ग्रहण नहीं करता।"

गीता प्रेस के इस मुद्रण का हिंदी अनुवाद साहित्याचार्य पंडित रामनारायण दत्त शास्त्री पाण्डेय 'राम' द्वारा किया गया है। उन्होंने इस अनुवाद का उल्लेख वनपर्व में रामोपाख्यान में किया है। यह तब कि बात है जब पांडवों को वनवास दिया गया था और उन्हें रामायण की कहानी सुनाई गयी थी।

इसके अलावा, महाभारत के वनपर्व का हिंदी अनुवाद पद्म भूषण से सम्मानित श्रीपाद दामोदर सातवलेकर ने भी किया है। उन्होंने माता सीता के त्यागने के प्रसंग पर पृष्ठ संख्या 1396 में लिखा है, 'कुत्ते की चाटी हुई खीर को।' साल 1884 के आसपास महाभारत का अंग्रेजी में अनुवाद करने वाले किशोरी मोहन गांगुली ने भी 'कुत्ते और घी' का जिक्र किया था।

माता सीता को त्यागने के प्रसंग को लेकर विरोधाभास

महाभारत के कुल 18 पर्व अथवा अध्याय है, जिनके नाम इस प्रकार हैं - आदिपर्व, सभापर्व, वनपर्व, विराटपर्व, उद्योगपर्व, भीष्मपर्व, द्रोणपर्व, कर्णपर्व, शल्यपर्व, स्त्रीपर्व, शान्तिपर्व, अनुशासनपर्व, आश्वमेधिकपर्व, आश्रमवासिकपर्व, मौसलपर्व, महाप्रस्थानिकपर्व और स्वर्गारोहणपर्व।

साल 1923 में गीता प्रेस गोरखपुर के संस्थापक जयदयाल गोयनका द्वारा भी संक्षिप्त महाभारत का हिंदी में दो खण्डों में अनुवाद किया गया है। उन्होंने अपनी पुस्तक के पहले खंड में वनपर्व का उल्लेख किया है।

वे पृष्ठ संख्या 388 से लेकर 392 तक 'राम-रावण युद्ध, रावण वध और सीता-राम सम्मिलन' के प्रसगों का जिक्र करते है। उन्होंने इसमें भी ऋषि मार्कंडेय द्वारा दिए उवाचों को ही शामिल किया है। गौर करने वाली बात यह है कि इस रचना में कही भी 'घी और कुत्ते' का जिक्र नहीं किया गया है। जबकि वे तो कहते है माता सीता के त्यागने जैसा कोई प्रसंग ही नहीं था। भगवान राम ने उन्हें ब्रह्मा जी के कहने पर सहजता से स्वीकार कर लिया था।

पुणे स्थित भंडारकर ओरिएण्टल रिसर्च इंस्टिट्यूट द्वारा महाभारत के वास्तविक पांडुलिपियों के संकलन के माध्यम से कई खण्डों में शोध किया गया है। इसके तीसरे और चौथे खंड में वनपर्व का विस्तार से उल्लेख किया गया है। मगर इसमें भी कहीं रामायण अथवा रामोपाख्यान जैसा कोई अलग से वर्णन नहीं दिया गया है।

गीता प्रेस अथवा उसके अनुरूप अनुवादों में वनपर्व के अंतर्गत द्रौपदीहरणपर्व के बाद जयद्रथविमोक्षणपर्व और फिर रामोपाख्यानपर्व बताया गया है। इसके बाद पवित्रतामहातम्यपर्व और फिर कुण्डलाहरणपर्व है।

जबकि भंडारकर सहित अन्य रचनाओं में द्रौपदीहरणपर्व के बाद सीधे कुण्डलाहरणपर्व बताया गया है। यानि रामोपाख्यान को शामिल नहीं किया गया है। उन्होंने द्रौपदीहरणपर्व के अंतर्गत ही भगवान राम और माता सीता का उल्लेख किया है। इसमें भी वही जिक्र है जिसका उल्लेख जयदयाल गोयनका ने किया है।

साल 1933 में महावीर प्रसाद द्विवेदी ने महाभारत का हिंदी अनुवाद किया था। उन्होंने पांडवों के वनवास का उल्लेख पृष्ठ संख्या 147 से 176 तक किया है। गौरतलब है कि उन्होने भी सीता को त्यागने जैसे किसी प्रसंग का जिक्र नहीं किया है। इसी प्रकार साल 1924 में इस महाकाव्य का अनुवाद महावीर प्रसाद वैद्य ने किया और उन्होंने भी वनपर्व में ऐसे किसी प्रसंग का उल्लेख नहीं किया है।

दरअसल, इस तथ्य को हमेशा ध्यान में रखा जाना चाहिए कि रामायण और महाभारत के कालखंड विश्व के इतिहास में सबसे प्राचीन है। इससे पहले किसी भी धर्म की पुस्तकें नहीं मिलती है। इनका इतिहास हजारों साल पुराना है।

रामायण पहले आई, फिर महाभारत और दोनों के बीच भी कई शताब्दियों का अंतराल मिलता है। अतः इस बात की पूरी सम्भावना है कि किसी आधुनिक समय में किसी ने इसमें ऐसे प्रसंगों को जोड़ दिया होगा जिसका महाभारत से कोई सम्बन्ध नहीं था।

महाभारत में अभी 1 लाख से अधिक श्लोकों को शामिल कर दिया गया है जबकि कुछ इतिहासकारों का दावा है कि इनकी वास्तविक संख्या 8 हजार के आसपास ही थी। चूँकि, महाभारत पांडवों और कौरवों के ऊपर आधारित है, और उसमें रामायण का प्रसंग बहुत ही सीमित है। कई रचनाओं में उसे बढ़चढ़कर दिखाया गया है।

यह भी पढ़ें: Comment on Sita: माता सीता पर सवाल और सोशल मीडिया का बवाल

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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