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Comment on Sita: माता सीता पर सवाल और सोशल मीडिया का बवाल

विकास दिव्यकीर्ति कह रहे हैं कि वनवास से लौटने के बाद राम ने सीता से कहा कि "जैसे कुत्ते द्वारा चाटे गये घी के बाद वह सेवन योग्य नहीं रहता, वैसे तुम अब मेरे योग्य नहीं हो।"

दिल्ली में दृष्टि आईएएस कोचिंग चलाने वाले विकास दिव्यकिर्ती नामक एक अध्यापक पर आरोप है कि उन्होंने माता सीता को लेकर अपमानजनक वाक्य कहे हैं। शुक्रवार को विहिप नेता साध्वी प्राची ने उनका एक वीडियो सोशल मीडिया पर सामने रखा जिसमें वो माता सीता के बारे में एक अपमानजनक उद्धरण प्रस्तुत कर रहे हैं। विकास दिव्यकीर्ति कह रहे हैं कि वनवास से लौटने के बाद राम ने सीता से कहा कि "जैसे कुत्ते द्वारा चाटे गये घी के बाद वह सेवन योग्य नहीं रहता, वैसे तुम अब मेरे योग्य नहीं हो।"

sita

हालांकि ये दिव्यकीर्ति का एडिटेड वीडियो था और यहां यह बात वो नहीं बल्कि शास्त्र के हवाले से कह रहे थे। सोशल मीडिया पर विवाद होने पर उनके समर्थकों द्वारा पूरा वीडियो जारी किया गया। इसमें वो आगे स्पष्ट भी करते हैं कि यह बात राम ने नहीं कही होगी बल्कि उस शास्त्रकर्ता ने कही होगी जिसने इसे लिखा है। शास्त्र लिखने वाले ऐसा करते हैं। वो अपनी बात पात्र के मुंह से बुललाते हैं।

लेकिन सोशल मीडिया तो ऐसे विवादों का अखाड़ा होता है। यह दो धड़ों में चलता है। बॉयकॉट और सपोर्ट। एक समूह ऐसा होता है जो बॉयकाट करता है जबकि दूसरा समूह ऐसा होता है जो सपोर्ट करता है। विकास दिव्यकीर्ति के संपादित वीडियो के बहाने भी सोशल मीडिया पर यही हो रहा है।

लेकिन इसका नुकसान ये होता है कि बात कहीं से शुरु होती है और कहीं पहुंच जाती है। जैसे सीता के बारे में विकास दिव्यकीर्ति के जिस बयान को मुद्दा बनाया गया है वह महाभारत से लिया गया है। विकास दिव्यकीर्ति हालांकि इसमें महाभारत का नाम लेने की बजाय एक शास्त्र कहते हैं। लेकिन यह प्रकरण महाभारत के रामोपाख्यानपर्व में आता है जहां मार्कण्डेय ऋषि त्रेता युग का वर्णन कर रहे हैं। इसमें वो बता रहे हैं कि लंका विजय के बाद का घटनाक्रम क्या रहा।

स्वाभाविक है महाभारत का कालखंड रामायण काल से बहुत बाद का है। हम ऐसा मान भी लें कि महाभारत की रचना वेदव्यास द्वारा उसी समय की गयी थी, तब भी इन दोनों कालों में लंबा अंतर है। महाभारत काल में महिलाओं को लेकर क्या अवस्था आ गयी थी इसका उदाहरण द्रौपदी के चीरहरण से मिलता है। इसलिए अगर राम के नाम से महाभारत में कोई ऐसा संवाद रख भी दिया गया तो सवाल महाभारत पर उठेगा या विकास दिव्यकीर्ति पर?

किसी काल में युग काव्य की बजाय कालांतर में लिखे गये काव्य की भक्ति प्रामाणिकता तो हो सकती है, इतिहास मूल्य नहीं रह जाता। जैसे आज रामचरित मानस को आधार बनाकर आप रामायण काल का निर्धारण नहीं कर सकते, वैसे ही महाभारत में लिखे गये संवाद को हम ठीक राम का संवाद नहीं मान सकते। इसके लिए प्रामाणिक ग्रंथ वाल्मिकी रचित रामायण ही माना जाता है जो उस समय के समकालीन महर्षि थे।

कालांतर में कोई अतीत के किसी चरित्र के बारे में क्या लिखता है इस पर उस युग का प्रभाव रहता ही है। जैसे महाभारत काल में लिखे गये संवाद में राम के नाम से ऐसा संवाद रख दिया गया है उसी तरह हाल फिलहाल में पेरियार की सच्ची रामायण का भी नाम आता है। अब सच्ची रामायण नामक पेरियार की रचना में राम और सीता का चरित्र हनन किया गया है। दोनों का उल्लेख करते हुए पेरियार ने जो एक छोटी सी पुस्तिका लिखी है उसमें वो कहीं राम को कायर, चरित्रहीन और पौरुष क्षमता से हीन बताते हैं तो कहीं पर सीता को चरित्रहीन और रावण के सामने स्वेच्छा से समर्पण करनेवाली बताते हैं। कहीं वो ये कहते हैं कि भरत सीता पर गलत दृष्टि रखता था तो कहीं वो सीता को एक बाजारू औरत जैसा बताते हैं।

तो क्या इसका मतलब ये मान लिया जाएगा कि पेरियार ने जो लिखा वो सत्य है? नहीं। समाज में एक वर्ग ऐसा हो सकता है जिसकी अपनी कोई कुंठा हो और वो पेरियार की सच्ची रामायण को सच्ची मान ले, लेकिन पेरियार के धूर्ततापूर्ण लेखन का कोई सामाजिक, धार्मिक, वैज्ञानिक आधार ही नहीं है। कोई कुछ भी लिख सकता है, ये उसकी स्वतंत्रता है लेकिन ऐसे क्षेपक लेखन को शास्त्रीय आधार तो नहीं माना जा सकता। लिखने के लिए तो अमीष त्रिपाठी ने भी अपने उपन्यास द वैरियर ऑफ मिथिला में सीता का चरित्र चित्रण किया है।

अमीष त्रिपाठी अपने उपन्यास में सीता का जो चरित्र चित्रण करते हैं उसमें वो सीता को एक योद्धा के रूप में दिखाते हैं। सीता के जन्म की वो एक अलग ही कहानी प्रस्तुत करते हैं जिसके मुताबिक जनक को वो जमीन पर पड़ी हुई मिली थीं। सीता हरण के दृश्य में भी वो अबला सीता हरण की बात नहीं करते बल्कि ये लिखते हैं कि सीता ने रावण और उसकी विशाल सेना से वहां युद्ध किया था। अमीष के अनुसार सीता एक योद्धा थीं जिन्होंने युद्धकला की शिक्षा श्वेतकेतू के आश्रम में प्राप्त किया था।

कहने का आशय ये है कि किस काल में कौन सा लेखक सीता को किस रूप में देखता है, और लिखता है, उस लेखन पर काल का प्रभाव रहता है। उत्तर के सवर्णों के विरोध में दक्षिण के दलित चिंतक पेरियार यहां तक चले गये कि सीता और राम को ही चरित्रहीन लिख दिया। जबकि आज नारी जागरण के इस युग में कोई अमीष त्रिपाठी अगर उपन्यास लिख रहा है तो सीता में भी एक योद्धा खोज रहा है। ऐसे में महाभारत में राम के मुंह से सतीत्व से जुड़ी कोई बात रचनाकार ने लिख भी दिया जो अशोभनीय है तो इससे न तो राम का चरित्र संदिग्ध होता है और न सीता का।

हां, सपोर्ट और बॉयकॉट के बीच दिन भर टाइमपास करता सोशल मीडिया को उलझने के लिए कोई न कोई मुद्दा चाहिए जिसे वह ट्रेन्ड कराकर लाइक, ट्वीट करके प्रचार पा सके। सीता से जुड़ा नाहक विवाद भी कुछ समय का ट्विटर ट्रेन्ड ही था। इससे अधिक इस विवाद का कोई महत्व नहीं है।

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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