Congress on Manipur: मणिपुर आपदा में अवसर की तलाश
Congress on Manipur: पहले कांग्रेस की शीर्ष नेता सोनिया गांधी का बयान, फिर सर्वदलीय बैठक में कांग्रेस का फरमान। दोनों का मकसद सिर्फ इतना कि मणिपुर में जारी हिंसा का अधिक से अधिक राजनीतिक लाभ राज्य में कांग्रेस पार्टी को मिल जाए। कुछ दिन पहले सोनिया गांधी ने मणिपुर पर अपना बयान जारी करते हुए कहा कि एक माँ होने के नाते वो मणिपुर हिंसा के शिकार लोगों का दर्द समझ पा रही हैं। उन्होंने 3 मई से जारी हिंसा पर खेद व्यक्त किया। वहीं शनिवार को हुई सर्वदलीय बैठक में कांग्रेस के नेता जयराम रमेश ने मुख्यमंत्री को बदले बिना राज्य में शांति संभव नहीं का फरमान जारी किया।
हालाँकि जिन्होंने समाचारों पर नजर रखी होगी, उन्हें पता होगा कि मणिपुर में हिंसा का ये दौर कोई 3 मई को शुरू नहीं हुआ था। उससे करीब एक हफ्ते पहले जब 27 अप्रैल को मणिपुर के मुख्यमंत्री द्वारा उद्घाटन किये हुए एक जिम को जलाया गया था, हिंसा तभी शुरू हो गयी थी। सोनिया गांधी ने अपने बयान में आगे जोड़ा था कि इस हिंसा से देश की अंतरात्मा पर एक गहरा घाव लगा है जिसे भरने में वक्त लगेगा। उन्होंने कांग्रेस के चिरपरिचित जुमले जैसे देश में नफरत फ़ैल रही है, वगैरह का इस्तेमाल भी किया।

कांग्रेस की शीर्ष नेता के मणिपुर दर्द से इतना तो साफ हो गया है कि राज्य में कांग्रेस अपने लिए आपदा में अवसर तलाश रही है इसलिए सर्वदलीय बैठक के पहले सोनिया गांधी का बयान जारी करवा दिया गया। इसके बाद रही सही कसर शनिवार को गृहमंत्री की अध्यक्षता में हुई सर्वदलीय बैठक में जयराम रमेश ने भाजपाई मुख्यमंत्री पर हमला बोलकर पूरी कर दी। इससे इतना तो स्पष्ट हो गया है कि आने वाले दिनों में राजनीति के लिए मणिपुर एक अहम मुद्दा रहने वाला है। इसके साथ ही थोड़ा अनुमान इस बात का भी हो ही जाता है कि इस हिंसा का आरोप किस समुदाय पर थोपा जायेगा।
मैतेई समुदाय को अनुसूचित जनजाति का दर्जा दिए जाने के पक्ष में फैसला देते हुए मणिपुर उच्च न्यायालय ने मणिपुर सरकार को आदेश दिया था कि केंद्र से इसकी अनुशंसा की जाये। असल में विरोध प्रदर्शन और हिंसा इसी फैसले के बाद शुरू हुए थे। यही वजह है कि कहा भले गया हो कि हिंसा 3 मई को शुरू हुई, लेकिन असल में हिंसा 26-27 अप्रैल को ही शुरू हो चुकी थी। पिछले कई दिनों से जारी इस हिंसा में अब तक सौ से अधिक लोगों की जान जाने की आशंका है। इस हिंसा के मणिपुर में भड़कने के साथ ही एक और बात ये भी हुई है कि म्यामांर की स्थिति के कारण भारत के लिए जो समस्याएँ उत्पन्न हो रही हैं, उनके बारे में बातचीत शुरू हो गयी है।
मार्च 2021 में जब म्यांमार में हिंसा भड़की हुई थी और कथित तौर पर 500 से अधिक लोग म्यांमार द्वारा सैन्य कार्रवाई में मारे गए थे तो बड़ी संख्या में सीमा पार से लोगों ने भारत में घुसने की कोशिश की थी। उस समय जब भारत बढ़ते हुए शरणार्थियों को जगह देने की स्थिति के नहीं रहा तो मणिपुर की सरकार और केंद्र ने पहले तो शरणार्थियों को "विनम्रतापूर्वक वापस जाने का आदेश" देने को कहा। बाद में फिर इस आदेश को वापस लिया गया और जो भोजन-आवास इत्यादि उपलब्ध न करवाने की बात थी, उसे भी वापस लिया।
इस किस्म की घुसपैठ जो शरणार्थियों की शक्ल में होती है, उससे इस किस्म की हिंसा के बढ़ने, उसके भड़कने की संभावना लगातार बनी रहती है। इससे पहले देखें तो 1993 में नागा और कुकी शरणार्थियों के बीच इसी किस्म की झड़पें हुई थी। उस दौर में हिंसा के शिकार अधिकांश लोग कुकी ही थे। अलग-अलग आंकड़ों के हिसाब से 1993 की हिंसा में लगभग 230 लोग मारे गए थे और हजारों विस्थापित हुए थे। कथित तौर पर नेशनल सोशलिस्ट कौंसिल ऑफ नागालैंड नाम के संगठन के नागा उग्रवादियों ने 13 सितम्बर 1993 को करीब 115 कुकी लोगों की हत्या कर दी थी। इसे जोउपी नरसंहार कहा जाता है और ये सबसे बड़े नरसंहारों में से एक था।
नेशनल सोशलिस्ट कौंसिल ऑफ नागालैंड के इसाक मुइवाह गुट के मुताबिक 1992 में ये हिंसक दौर इसलिए शुरू हुआ था क्योंकि शुरुआत कुकी लोगों ने की थी। अंग्रेजों के शासन काल से ही नागा और कुकी लोगों में संघर्ष जारी है और 1990 का दौर आते-आते ये जमीन की लड़ाई तो बना ही, साथ ही नागा लोगों के "वृहत नागालैंड" या "नागालिम" देश की स्थापना के उद्देश्य के कारण भी बढ़ने लगा। फ़िलहाल जो "नागालिम" का नक्शा बनाया जाता है उसमें असम, मणिपुर, अरुणांचल प्रदेश के अलावा म्यांमार के भी कई इलाके शामिल हैं। जाहिर है कि जैसे पंजाब में कभी खालिस्तान का जो शोर उभरा था, उसी तरह इस मांग को भी एक ही बार में समाप्त नहीं किया जा सकता। ऐसी मांग के उठने के साथ ही चीन से लेकर पाकिस्तान और अमेरिका की उसमें कितनी रूचि होगी, इसका अंदाजा लगाना भी आसान है।
इस बार ये चाल इतनी आसानी से सफल इसलिए नहीं हो पा रही क्योंकि हिन्दुओं ने शांतिपूर्वक हर स्थिति को स्वीकारना बंद कर दिया है। विदेशी फंड पर पलने वालों को संभवतः हिन्दुओं से प्रतिरोध की अपेक्षा नहीं थी, इसलिए भी जो विवाद एकतरफा हिंसा के बाद शांतिपूर्वक समाप्त हो जाना था, उसे संघर्ष की तरह झेलना पड़ रहा है। इस वर्ष जब हाईकोर्ट का मैतेई समुदाय को अनुसूचित जनजातियों में शामिल करने का आदेश आया तो उस पर तीखी प्रतिक्रियाएं भी इसी वजह से हुईं।
सर्वोच्च न्यायालय में इस आदेश के विरुद्ध पहुँचने वाले कई लोगों और संस्थाओं में से एक याचिका भाजपा विधायक और "हिल एरिया कमेटी" के चेयरमैन गिंगांगलुंग गांगमेई की भी है। उन्होंने उच्च न्यायालय के आदेश पर तीन प्रमुख आपत्तियां जतायीं थीं। उनकी पहली शिकायत तो यही थी कि हाईकोर्ट के फैसले में "हिल एरिया कमेटी" को शामिल नहीं किया गया, जबकि वो इस फैसले में एक पक्ष है। दूसरी शिकायत यह थी कि मैतेई लोगों को जनजाति मानने का मामला दस वर्षों से लंबित है, जो कि सत्य नहीं। तीसरी शिकायत यह थी कि मैतेई तो जनजाति होते ही नहीं। इस पर फैसला सुनाते हुए मुख्य न्यायाधीश डी. वाई. चंद्रचूड़, जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस जेबी पारदीवाला की पीठ ने कहा कि मणिपुर उच्च न्यायालय का फैसला "तथ्यात्मक रूप से गलत" था। इसके अलावा ये सर्वोच्च न्यायालय की संवैधानिक पीठों के फैसलों के मुताबिक अनुसूचित जातियों और जनजातियों के मामले में फैसला भी नहीं दे रहा।
अब ये मामला फिर से राज्य सरकार के पाले में है। जब तक राज्य सरकार ये तय नहीं कर लेती कि मैतेई सचमुच एक जनजाति है या नहीं, तब तक अब कुछ नहीं हो सकता। दूसरी ओर हिंसा करने वालों के ही पक्ष से आवाज उठाने और शोषकों को ही पीड़ित बताने के लिए कांग्रेस सुप्रीमो का सन्देश उनके पक्ष वालों ने सुन लिया होगा। आगे कांग्रेस इकोसिस्टम से जुड़े लोग मणिपुर की क्या तस्वीर पेश करेंगे इसे समझना कठिन नहीं है।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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