Punjab News: पंजाब की ‘स्टूडेंट दादी'! 45 साल बाद थामी कलम, 61 साल की नरिंदर कौर ने कैसे पास की 10वीं परीक्षा

Punjab Narendra Kaur Success Story: फगवाड़ा के पास स्थित सरहाली गांव की गलियों में आजकल एक 61 वर्षीय महिला की चर्चा हर जुबान पर है। घर के दरवाजे पर हाथ में किताब लिए खड़ी नरिंदर कौर जब मुस्कुराते हुए किसी की बधाई स्वीकार करती हैं, तो उनकी आंखों में 45 साल का लंबा इंतजार और संघर्ष साफ झलकता है।

पंजाब स्कूल शिक्षा बोर्ड (PSEB) की 10वीं की परीक्षा में 77 प्रतिशत अंक हासिल कर नरिंदर ने साबित कर दिया है कि पढ़ने की कोई उम्र नहीं होती।

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61 साल की उम्र में नरिंदर कौर ने वो कर दिखाया, जिसे करने का सपना उन्होंने दशकों पहले देखा था। करीब 45 साल बाद उन्होंने पंजाब स्कूल शिक्षा बोर्ड (PSEB) की ओपन स्कूल 10वीं परीक्षा दी और 77 प्रतिशत अंक हासिल कर सबको हैरान कर दिया।

Narendra Kaur की 1981 में छूटी थी पढ़ाई, दिल में रह गई थी टीस

नरिंदर कौर की पढ़ाई का सिलसिला साल 1981 में थम गया था। इसके सात साल बाद उनकी शादी हो गई। वे याद करती हैं, "वे साल मेरे लिए भावनात्मक रूप से बहुत कठिन थे। मैं अक्सर सपने में खुद को कॉलेज जाते देखती थी। मैंने रिश्तेदारों से भी सिफारिश करवाई कि मेरे परिवार को मनाएं, पर बात नहीं बनी।" शादी के बाद उन्होंने अपने पति से भी आगे पढ़ने की इजाजत मांगी, लेकिन वहां भी उन्हें इनकार ही मिला। इसके बावजूद उनके मन में शिक्षा के लिए प्यार कम नहीं हुआ। भावुक होकर वह कहती हैं, "मैनू पढ़ाई नाल बहुत प्यार है।"

बेटों ने पूरा करवाया मां का सपना

कई सालों बाद जब नरिंदर कौर ने अपने विदेश में रहने वाले बेटों को अपने अधूरे सपने के बारे में बताया, तब उनकी जिंदगी बदल गई। उनके बेटों ने उन्हें पढ़ाई जारी रखने के लिए प्रेरित किया। नरिंदर कौर कहती हैं, उन्होंने मुझसे कहा कि अगर आप पढ़ना चाहती हो, तो जरूर पढ़ो। इसके बाद उन्होंने बिना देर किए किताबों और कॉपियों की खरीदारी की।

हालांकि 45 साल बाद दोबारा पढ़ाई शुरू करना आसान नहीं था। वह हंसते हुए बताती हैं, "मैं ठीक से पेन भी नहीं पकड़ पाती थी। इसलिए मैंने रोज दो घंटे लिखने की प्रैक्टिस की।" धीरे-धीरे उनका आत्मविश्वास बढ़ता गया और पढ़ाई फिर से उनकी जिंदगी का हिस्सा बन गई।

खुद की मेहनत से हासिल की सफलता

नरिंदर कौर ने बिना किसी ट्यूशन या कोचिंग के खुद पढ़ाई की। उनके कमरे में आज भी अंग्रेजी, पंजाबी, विज्ञान, सामाजिक विज्ञान, हिंदी और फिजिकल एजुकेशन की किताबें करीने से रखी हुई हैं। उनकी नोटबुक्स हस्तलिखित नोट्स से भरी हुई हैं। उनका पसंदीदा विषय अंग्रेजी था। परीक्षा देने वाले कई छात्र उनकी लगन से इतने प्रभावित हुए कि वे उनसे कठिन सवालों को समझाने भी लगे। गांव के लोग कहते हैं कि नरिंदर कौर ने आसपास के हर व्यक्ति को प्रेरित किया है।

10वीं नहीं, अब ग्रेजुएशन का सपना

नरिंदर कौर के लिए यह उपलब्धि सिर्फ शुरुआत है। वह अब आगे की पढ़ाई भी जारी रखना चाहती हैं। आत्मविश्वास से भरी आवाज में वह कहती हैं, एह ते शुरुआत है, मैं ग्रेजुएशन भी करूंगी। जब भी वह शिक्षा की बात करती हैं तो उनकी आंखें भर आती हैं। अधूरे सपनों और वर्षों की चुप्पी का दर्द आज भी उनकी आवाज में महसूस होता है।

पढ़ाई के साथ गायकी का भी शौक

नरिंदर कौर को पढ़ाई के साथ-साथ पंजाबी लोकगीत गाने का भी शौक है। उन्हें 'मधाणियां... हाय ओ मेरे धड्ढेया रब्बा' जैसे पारंपरिक गीत बेहद पसंद हैं। उनके मुताबिक ये गीत महिलाओं के संघर्ष और भावनाओं को दर्शाते हैं। वह कहती हैं, आज भी मुझे लगता है कि लड़कियां पूरी तरह स्वतंत्र नहीं हैं। उन्हें वो सब करने की आजादी मिलनी चाहिए जो वे करना चाहती हैं।"

नरिंदर कौर की कहानी सिर्फ एक परीक्षा पास करने की नहीं, बल्कि उस जज्बे की कहानी है जो उम्र, परिस्थितियों और समाज की सीमाओं को पार कर अपने सपनों को फिर से जीना चाहता है।

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