सवालों के घेरे में कांग्रेस की "राजमाता" सोनिया
सोनिया गांधी के कार्यकाल में कांग्रेस ने ऐसा स्वरूप अख्तियार कर लिया है कि नेहरू परिवार तथा कांग्रेस में कौन किसका इस्तेमाल कर रहा है, इसे समझ पाना कठिन ही नहीं नामुमकिन हो गया है। लेकिन इतना तो स्पष्ट है कि बिना नेहरू गांधी परिवार के कांग्रेस जिन्दा नहीं रह सकती और बिना कांग्रेस के नेहरू गांधी वंश अस्तित्वहीन हो जाएगा। इसलिए दोनों के बीच यह एक ऐसा गठबंधन है जिसे चाहकर भी कोई एक पक्ष तोड़ नहीं सकता। दोनों को अपने होने के लिए एक दूसरे की जरूरत है। इसलिए समय समय पर दोनों एक दूसरे के प्रति अपनी वफादारी साबित करते रहते हैं जैसे आज ईडी की पूछताछ पर कांग्रेस के नेता कर रहे हैं।

लेकिन जनसामान्य को इस रिश्ते से भला क्या लेना देना? उसे तो उन सवालों के जवाब चाहिए जो इस समय प्रवर्तन निदेशालय के सवालों से भी ऊपर है। और सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या सोनिया गांधी देश के कानून से भी ऊपर हैं जिन्हें कानूनी एजेंसियां अपने दफ्तर में पूछताछ के लिए बुला भी नहीं सकतीं?
असल में इस समय सड़क से लेकर संसद तक जो कांग्रेसी हंगामा कर रहे हैं उसका कारण ईडी के सवाल नहीं बल्कि ईडी का दफ्तर है। कांग्रेसियों को ईडी के सवालों से ज्यादा ईडी के इस व्यवहार से दिक्कत है कि वह सोनिया गांधी को अपने दफ्तर बुलाकर पूछताछ क्यों कर रही है? क्या ईडी दस जनपथ जाकर "राजमाता" सोनिया गांधी से अपने सवालों के जवाब हासिल नहीं कर सकती थी?
संभवत: कांग्रेस के नेताओं के लिए देश का राष्ट्रपति प्रथम नागरिक नहीं होता। उनके लिए देश का प्रथम नागरिक नेहरू गांधी परिवार का वह व्यक्ति होता है जो कांग्रेस का अध्यक्ष होता है। वह प्रथम नागरिक ही उनका अपना "मालिक" है जिसे वो "देश का मालिक" बनाकर जन सामान्य के सामने प्रस्तुत करते हैं। याद करिए 2013 में दिया गया सलमान खुर्शीद का वह बयान जब उन्होंने कहा था कि "सोनिया गांधी राहुल गांधी की ही मां नहीं है, हमारी मां हैं, पूरे देश की मां हैं।"
कांग्रेस के नेता सार्वजनिक रूप से ऐसा दिखावा करने से भी परहेज नहीं करते जैसे नेहरू गांधी परिवार भारतीय संविधान और कानून से भी ऊपर हैं। निजी बातचीत में तो नेहरु गांधी परिवार को "देश का असली राजपरिवार" कहने में भी कोई संकोच नहीं करते।
इसलिए देश की कोई संवैधानिक एजंसी इस "राजपरिवार" के रॉयल दर्जे को चुनौती दे तो कांग्रेसी विरोध में उतर आते हैं। इस परिवार को "राज परिवार" का दर्जा बनाये रखने के लिए ही कांग्रेस ने एसपीजी एक्ट में संशोधन करके करीब तीन दशक तक इस पूरे परिवार को वह एसपीजी सुरक्षा दी जो मात्र प्रधानमंत्री के लिए होती है। उस परिवार का कोई व्यक्ति प्रधानमंत्री की कुर्सी पर रहे या न रहे, उनके "राजपरिवार" वाला रॉयल दर्जा कम नहीं होना चाहिए।
एक सामान्य कांग्रेसी नेता अभी भी अपने अतीत के उन्हीं सुनहरे दिनों में जी रहा है जहां दस जनपथ सत्ताओं की सत्ता का केन्द्र होता था। लेकिन अब समय बदल गया है और सोनिया गांधी परिवार के द्वारा जो भ्रष्टाचार किया गया है उसकी जांच ठीक उसी तरह से हो रही है जैसे किसी अन्य नेता, मंत्री या अफसर द्वारा किये गये भ्रष्टाचार की होती है।
सोनिया गांधी पर आरोप क्या है?
एसोसिएटेड जर्नल्स लिमिटेड (एजेएल) की स्थापना जवाहरलाल नेहरू ने 1937 में की थी। इस कंपनी के तहत तीन अखबार निकलते थे। अंग्रेजी में नेशनल हेराल्ड, हिन्दी में नवजीवन और उर्दू में कौमी आवाज। उस समय नेहरू ने 5000 स्वतंत्रता सेनानियों को इसका शेयरहोल्डर बनाया था। लेकिन कर्जों के बोझ तले दबी कंपनी ने 2008 में सभी अखबारों का प्रकाशन बंद कर दिया।
इसके बाद 2010 में पांच लाख रुपये की पूंजी से स्थापित की गयी वाली यंग इंडियन कंपनी द्वारा 2011 में नेशनल हेराल्ड का टेकओवर कर लिया जाता है। इस टेकओवर में नेशनल हेराल्ड की 5000 करोड़ की संपत्तियां भी अब प्रत्यक्ष तौर पर पांच लाख रुपये की पूंजी वाली यंग इंडियन कंपनी के पास आ जाती हैं जिसके चार डायरेक्टर होते हैं: सोनिया गांधी, राहुल गांधी, मोतीलाल वोरा और ऑस्कर फर्नांडीज। इसमें सोनिया गांधी और राहुल गांधी के पास क्रमश: 38-38 प्रतिशत शेयर थे, अर्थात कुल 76 प्रतिशत। बाकी शेयर मोतीलाल वोरा और ऑस्कर फर्नांडीज के पास थे।
यंग इंडियन कंपनी द्वारा नेशनल हेराल्ड का यह टेकओवर इसलिए किया गया क्योंकि कांग्रेस ने नेशनल हेराल्ड को 100 करोड़ रूपया कर्जा दिया था जिसे चुका पाने में नेशनल हेराल्ड असमर्थ हो चुका था। ऐसे में कांग्रेस अध्यक्ष को 100 करोड़ कर्ज की ऐवज में 5000 करोड़ की परिसंपत्तियों वाला नेशनल हेराल्ड सौंप दिया गया।
यही वह भ्रष्टाचार है जिसके खिलाफ प्रवर्तन निदेशालय 2014 से जांच कर रहा है। जांच के आठ साल बाद अब जाकर प्रवर्तन निदेशालय ने राहुल और सोनिया गांधी को पूछताछ के लिए अपने दफ्तर बुलाया है। जिसे कांग्रेसी नेता रटे रटाये डॉयलॉग की तरह "लोकतंत्र और विपक्ष पर हमला" बता रहे हैं।
जांच एजंसी के लिए यह जानना जरूरी है नेशनल हेराल्ड के मामले में यह हेराफेरी आखिर क्यों की गयी? क्या यह किसी एक व्यक्ति या परिवार को लाभ पहुंचाने के लिए नहीं किया गया? क्या नेशनल हेराल्ड 5000 करोड़ की परिसंपत्तियां होने के बावजूद 100 करोड़ का कर्जा चुकाने में सक्षम नहीं था? ये ऐसे सवाल हैं जिनका जवाब कांग्रेस की "राजमाता" सोनिया गांधी को देना पड़ेगा।
वो सिर्फ इसलिए संवैधानिक व्यवस्थाओं के परे नहीं हो जाती क्योंकि वो एक ऐसी पार्टी की 20 साल से मुखिया हैं जिसने आजादी के आंदोलन का नेतृत्व किया था। अगर ऐसा था तो इस मामले में सोनिया गांधी ने नेहरू के उस सपने के साथ भी धोखा किया है जिन्होंने नेशनल हेराल्ड में 5,000 फ्रीडम फाइटर्स को शेयरधारक बनाया था। इसलिए सोनिया गांधी द्वारा नेशनल हेराल्ड का टेकओवर न सिर्फ आर्थिक धोखाधड़ी का मामला है बल्कि यह देश की स्वतंत्रता का संघर्ष करने वाले सेनानियों के साथ भी नैतिक धोखाधड़ी है। क्या नेहरु ने नेशनल हेराल्ड की शुरुआत इसलिए की थी कि एक दिन उनके नाम पर राजनीति करनेवाले इसकी संपत्तियों पर कब्जा कर लेंगे?
कुछ सवाल तो ईडी के पास होंगे जिनके जवाब सोनिया गांधी को देने ही होंगे लेकिन कुछ सवाल समाज के पास भी हैं जिनके जवाब देर सबेर पूरी कांग्रेस को देना होगा। नेशनल हेराल्ड मामले में कांग्रेस और सोनिया गांधी ने केवल आर्थिक धोखाधड़ी की है बल्कि स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के संघर्ष के साथ भी धोखा किया है।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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