Congress Fund Collection: चंदे के पैसे से कैसे चलेगी कांग्रेस?
Congress Fund Collection: कांग्रेस पार्टी के स्तर पर कितनी अस्तव्यस्त हो गयी है उसका उदाहरण इस बात से समझा जा सकता है कि डोनेट फॉर देश का कार्यक्रम तो उन्होंने लांच कर दिया लेकिन उसी नाम की वेबसाइट बनाना भूल गये। आज के इस सूचना क्रांति के युग में ऐसी गलती शायद ही कोई करे। लेकिन कांग्रेस में कुछ भी हो सकता है। दूसरी ओर भाजपा बैठी ही है कांग्रेस की गलतियों का लाभ उठाने के लिए। इसलिए डोनेट फॉर देश का कैम्पेन शुरु किया कांग्रेस ने और इसी नाम से डोमेन रजिस्टर करा लिया भाजपा ने।
अब दानदाताओं के सामने मुश्किल यह होगी कि अगर वो इंटरनेट पर डोनेट फॉर देश सर्च करेंगे तो भाजपा की बनाई वेबसाइट डोनेट फॉर देश.ऑर्ग दिख जाऐगी, जो भाजपा के लिए डोनेशन करने वाले पेज पर ले जायेगी। जबकि एक न्यूज पोर्टल ने इसी कैम्पेन से मिलता जुलता डोमेन बना भी लिया है और उसे अपने डोनेशन पेज पर रिडायरेक्ट भी कर दिया है। कांग्रेस में जिन भी लोगों ने यह कैम्पेन प्लान किया है उन्होंने यहां भी मानों कोई घोटाला कर दिया। देश के नाम पर पैसा मांगने का अभियान शुरु किया डोनेट फॉर देश के नाम से और उस डोनेशन के लिए जो वेबसाइट बनायी उसका नाम डोनेशनफॉरआईएनसी कर दिया।

वैसे स्वतंत्रता के बाद कांग्रेस का अपना राजनीतिक चरित्र ऐसा बन गया है कि अगर उसके नेता कोई काम करें और उसमें घोटाला न हो तो भरोसा करना मुश्किल होता है कि क्या सचमुच यह कांग्रेस का ही नेता है। घोटाला और कांग्रेस एक दूसरे के लिए पर्यायवाची जैसे हो गये हैं। उसके नेता सत्ता में रहें या पार्टी का काम करें, घोटाला करने से नहीं चूकते। शायद इसीलिए इस डोनेशन कैम्पेन में डोमेन घोटाला हो गया।
कांग्रेस भाजपा की तरह कैडर आधारित पार्टी नहीं है। वह नेता आधारित पार्टी है इसलिए उसकी सफलता और असफलता उसकी लीडरशिप पर निर्भर करती है। इस लिहाज से देखें तो कांग्रेस में भाजपा के मुकाबले अधिक लोकतांत्रिक व्यवस्था है जिसका खामियाजा अक्सर कांग्रेस को एक पार्टी के रूप में उठाना पड़ता है। स्वतंत्रता के 75 सालों में लगभग 60 साल सत्ता में रहनेवाली कांग्रेस को अगर आज पार्टी चलाने के लिए चंदे की जरूरत महसूस हो रही है तो इसके पीछे उसके पास कैडर का न होना ही है।
कांग्रेस एक सत्ता आधारित राजनीतिक दल है। उसके नेताओं का सारा जोर सदैव सत्ता पाने का रहता है जो कि गलत भी नहीं है। राजनीतिक दलों का गठन और संचालन सत्ता प्राप्ति के लिए ही किया जाता है ताकि वो लोकतांत्रिक तरीके से चुनाव लड़कर 'जनता की सेवा' कर सके। सत्ता आधारित दलों का संकट यह होता है कि उनके पास पार्टी कैडर नहीं होता। एक बार वह पार्टी अगर लंबे समय तक सत्ता से बाहर रह जाए तो उसके समर्थक ही नहीं, नेता भी उसे छोड़कर चले जाते हैं। ठीक यही बीते दस सालों से कांग्रेस के साथ हो रहा है।
2014 में जब से कांग्रेस केन्द्र की सत्ता से बाहर गई, उसके नेता उसको छोड़कर जा रहे हैं। 2024 में अगर कांग्रेस ने मजबूत वापसी नहीं की तो नेताओं के जाने का सिलसिला और तेज भी हो सकता है। जो नेता सत्ता आधारित राजनीति को ध्यान में रखकर काम करते हैं वो उसके साथ चले जाते हैं जिनकी सत्ता होती है। कांग्रेस के जो नेता भाजपा या दूसरे दलों में जा रहे हैं वो मान चुके हैं कि कांग्रेस निकट भविष्य में सत्ता में नहीं लौटनेवाली। जब पार्टी का ही कोई भविष्य नहीं तो फिर उनका क्या भविष्य होगा?
राजस्थान और छत्तीसगढ की सत्ता से विदाई के बाद अब कांग्रेस के पास तेलंगाना और कर्नाटक की सत्ता बची है। झारखण्ड में वह गठबंधन की सरकार में है। स्वाभाविक है कि जब कांग्रेस सत्ता में है ही नहीं तो कॉरपोरेट घराने भी उससे दूर हो रहे हैं। वो रिलायंस समूह भी अब कांग्रेस से दूर हो चुका है जिसके बारे में कहा जाता है कि उसे रिलायंस बनाने में कांग्रेस की सरकारों का ही योगदान रहा है। व्यावसायिक घरानों की भी मजबूरी होती है कि वो सत्ता के साथ रहें। उन्हें कोई चुनाव नहीं लड़ना होता है कि विचारधारा के आधार पर किसी दल का समर्थन या विरोध करें।
ऐसे में आज डोनेशन ड्राइव करते हुए कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे अनायास नहीं कह रहे हैं कि "अगर आप केवल अमीरों के पैसे से राजनीति करेंगे तो उनकी नीतियों को मानना पड़ेगा।" वो जानते हैं कि कांग्रेस को अमीरों का पैसा तभी मिलेगा जब वो सत्ता में वापसी की संभावना दिखायेंगे। फिलहाल 2024 में भी ऐसा होता दिख नहीं रहा है तो जरूरी हो या मजबूरी उन्हें वोट और नोट के लिए जनता के दरवाजे पर जाना ही पड़ेगा। इसके लिए कांग्रेस महात्मा गांधी का उदाहरण भी दे रही है कि कैसे उन्होंने जनता के पैसे से स्वतंत्रता आंदोलन चलाया। लेकिन कांग्रेसी नेता यह भूल रहे हैं कि अब न देश किसी का गुलाम है और न ही समाजवाद का स्वर्णयुग रहा जब निजी कारोबारी घरानों से संबंध को राजनीतिक भ्रष्टाचार समझा जाता था।
कांग्रेस ने ही नब्बे के दशक में जिस नव उदारवादी अर्थव्यवस्था की शुरुआत की थी, उसने व्यापार और समाज को ही नहीं बदला, राजनीति को भी बदल दिया है। अब कॉरपोरेट घरानों को लाभ पहुंचानेवाली नीतियां बनाना आपके आर्थिक विकास के लिए जरूरी भी है और मजबूरी भी। अब पिछले हफ्ते यूपी की योगी सरकार ने ऐसे कई कानून समाप्त कर दिये जिसके उल्लंघन पर व्यापारियों को जेल जाने का डर रहता था। ऐसी ही व्यवस्था को उदारवादी व्यवस्था कहा गया जिससे अब कोई राजनीतिक दल सरकार में आने के बाद पीछे नहीं हट सकता।
फिर चंदे की राजनीति के लिए कैडरबेस होना जरूरी होता है। कांग्रेस में समानांतर कैडर वाली जो व्यवस्था कांग्रेस सेवादल के रूप में थी अब वह कांग्रेस मुख्यालय पर झंडा फहराने लायक भी नहीं बची है। फिर चंदा इकट्ठा कौन करेगा? कांग्रेस के नेता करेंगे भी तो उसमें भी घोटाला करेंगे क्योंकि 7 दशक में उन्होंने यही सीखा है। अगर कांग्रेस सचमुच चंदे की राजनीति करना चाहती है तो उसे पुन: सेवादल को सशक्त करना पड़ेगा और पूरी पार्टी को नेता आधारित बनाने की बजाय कैडर आधारित बनाना पड़ेगा। अगर कांग्रेस ऐसा करने की शुरुआत भी कर दे तो उसके लिए भविष्य के रास्ते खुल सकते हैं।
अभी का जैसा राजनीतिक माहौल है उसे देखकर नहीं लगता कि राष्ट्रवादी राजनीति का पारा बहुत जल्द उतरनेवाला है। उतरना शुरु भी हुआ तो उतरते उतरते पांच दस साल लग जाएंगे। इसका कारण यह है कि भाजपा कैडर आधारित पार्टी है और जैसे ही उसे लीडर मिलता है वह उछलकर सत्ता तक पहुंच जाती है। कांग्रेस यहीं पर कमजोर पड़ती है। अगर वह अपनी यह कैडर वाली कमजोरी दूर कर ले तो भले ही लंबे समय तक विपक्ष में रहना पड़े, कम से कम उसका राजनीतिक वजूद बचा रहेगा। अभी की जो कांग्रेस है वो चंदे के नाम पर अपने ही नेताओं से कुछ पैसा इकट्ठा भले कर ले, आम जनता पर उसकी अपील का कोई असर होगा, ऐसा लगता नहीं है।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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