Congress and Hindutva: कांग्रेस नेताओं को हिंदू मान्यताओं और प्रतीकों से चिढ़ क्यों है?
Congress and Hindutva: राहुल की भारत जोड़ो यात्रा के दौरान कांग्रेस नेताओं ने दो नए विवाद इस हफ्ते खड़े कर दिए। एक था कर्नाटक कांग्रेस नेता सतीश जारकीहोली का बयान, जिसमें इंटरनेट के हवाले से उनका दावा था कि हिंदू शब्द बहुत गंदा है, इसका अर्थ गाली है। इस बयान पर कांग्रेस ने किनारा कर लिया, लेकिन जी20 के नए लोगो में 'कमल' के फूल के इस्तेमाल पर वो तमाम खुलासों के बावजूद अड़े रहे। ऐसे में सवाल उठता है कि कांग्रेस ऐसे मुद्दों पर जोकि हिंदुत्व या राष्ट्रीय स्वाभिमान से जुड़े हैं, उन पर हमेशा गलत स्टैंड क्यों लेती है?

नेहरू गांधी परिवार के दो सदस्यों के नाम 'कमल' पर, फिर भी सवाल
G20 के नए लोगो में कमल का फूल उस कांग्रेस पार्टी के निशाने पर है, जिसके एक प्रधानमंत्री का नाम ही कमल यानी राजीव था और जिनकी नानी का नाम था कमला। राजीव का पूरा नाम रखा गया था राजीव रत्न। इंदिरा गांधी ने अपने बड़े बेटे राजीव का नाम अपनी मां कमला नेहरू के नाम यानी कमल से और रत्न पिता जवाहरलाल के नाम से लिया था।
ये ठीक है कि एक कटाक्ष बीजेपी पर बनता है कि उसने जी 20 की अध्यक्षता के लिए जो लोगो डिजाइन करवाया उसमें अपना चुनाव चिह्न इस्तेमाल कर लिया होगा। लेकिन उन्हें ये भी याद रखना था कि कमल के फूल से भारत का भावनात्मक रिश्ता भी है। यही वो कमल था, जिसे रोटी के साथ 1857 की क्रांति में बांटा गया था। कमल के ही 8 फूल उस ध्वज पर नीचे की पट्टी में डिजाइन किये गए थे, जिसे 1907 की स्टुटगार्ट कांग्रेस में भीखाजी कामा ने फहराया था। यही वो कमल का फूल है, जो भगवान विष्णु के हाथ की शोभा है तो स्वयं ब्रह्मा जी इसी कमल के आसन पर विराजमान हैं। स्वयं लक्ष्मी जी कमल के आसन पर विराजमान हैं। कमल के फूल का आध्यात्मिक महत्व भी है।
"नेहरू: द लोटस ईटर फ्रॉम कश्मीर"
अब बात उस किताब की, जिसका शीर्षक है "नेहरू: द लोटस ईटर फ्रॉम कश्मीर", यानी कश्मीर का कमल खोर। लंदन से प्रकाशित इस किताब के लेखक हैं दोसू फ्रॉमजी कराका। यहां 'लोटस ईटर' का मतलब 'परम आलसी' होता है।
1953 में लिखी इस किताब में लेखक ने नेहरू जी की खामियां जुटाने में काफी मेहनत की है। हालांकि इस किताब के सामने आने के बाद इन्हीं नेहरूजी की सरकार ने अगले ही साल कमल को राष्ट्रीय पुष्प भी चुना था। ऐसे में जिस फूल का भारत के राष्ट्रीय आंदोलन और सनातन धार्मिक परम्परा में इतना महत्व हो, आज कांग्रेस का उसी पुष्प पर सवाल उठाना उलटा तो पड़ेगा।
रही सही कसर कर्नाटक कांग्रेस के कार्यकारी अध्यक्ष सतीश जारकीहोली ने पूरी कर दी। इससे पहले हिंदुत्व और सनातन पर बोल बोलकर मल्लिकार्जुन खड़गे, शशि थरूर और दिग्विजय सिंह भी ऐसी गलती कर चुके हैं। कांग्रेस नेता सतीश को पता ही नहीं होगा कि मोहम्मद साहब की पहली पत्नी खदीजा बेगम के पहले पति से हुई बेटी का नाम हिंदाह था, तो दूसरे पति से हुई बेटी का नाम हिंद था। इस्लाम की परम्परा में कई प्रमुख लोगों के परिवारों में हिंद या हिंदाह नाम बेटे या बेटियों के नाम रखे गए, ऐसे में ये नाम गाली कैसे हो सकता है?
गांधी परिवार और कांग्रेस की समझ में कब आएगा कि इन विषयों पर कन्फ्यूजन की स्थिति को जल्दी से जल्दी दूर करने की जरूरत है। वरना राम मंदिर का फैसला होने के बाद उसका ताला खुलवाने का श्रेय लेने का कोई अर्थ नहीं रह जाता और ना ही महाकाल कॉरीडोर का श्रेय लेने का। यूं विश्वनाथ कॉरीडोर के लिए संजय गांधी ने भी कोशिश की थी, लेकिन आधे मन से या चुनावी फायदे के लिए कोशिश करना और फिर पीछे हट जाना आपको सारे श्रेय से वंचित कर देता है। फायदा मोदी जैसे इरादों को धरातल पर उतारने वाले नेता ले जाते हैं।
हिन्दू से विरोध क्यों?
लेकिन सवाल ये है कि स्वतंत्रता के बाद कांग्रेस का हिन्दू धर्म से सदैव इतना विरोध क्यों रहा है? क्या इसकी वजह दशकों से कांग्रेस के आलाकमान परिवार यानी नेहरू गांधी परिवार के इतिहास में है?
वर्तमान नेहरु वंश के पूर्वज इस्लामिक शासकों की नौकरी में थे। इस वंश में इंदिरा गांधी ने पारसी समुदाय से रिश्ता जोड़ा, फिर राजीव गांधी ने ईसाई समुदाय से, उनकी बेटी प्रियंका भी उसी रास्ते चलीं। जबकि इंदिरा के दूसरे बेटे संजय ने पंजाबी परिवार में शादी की। नेहरूजी की एक बहन कृष्णा जैन परिवार में ब्याहीं। बावजूद इसके नेहरू परिवार इन सब अलग-अलग समुदायों से रिश्तों को सेकुलर परिवार की मिसाल के तौर पर ना तो पेश करता है और ना ही हिंदू समुदाय को ही खुश रख पाता है।
नेहरू परिवार ने हिंदू समुदाय से रिश्ते तभी सुधारे जब जब सनातन शक्तियां मजबूत हुईं। चाहे वो 1966 का गौ हत्या विरोधी करपात्री महाराज का आंदोलन हो, या फिर विहिप का आंदोलन जिसके चलते राजीव गांधी को रामजन्मभूमि का ताला खोलना पड़ा। या फिर मोदी के हिन्दुत्व के जवाब में राहुल गांधी को जनेऊ-धोती पहनना पड़ा और कैमरे पर आकर अपना गोत्र बताना पड़ा।
मजबूरी में हिन्दू होने का स्वांग
नेहरू गांधी परिवार के सबसे पुराने पुरखे थे राज कौल, जो कश्मीर के विद्वान थे और मुगल शासक फर्रुखसियर के बुलावे पर दिल्ली आकर रहने लगे। उसके बाद जिनकी जानकारी मिलती है, वो थे लक्ष्मीनारायण नेहरू जो ईस्ट इंडिया कम्पनी के दूत के तौर पर मुगल दरबार से जुड़े थे और उनके बेटे गंगाधर नेहरू जिन्हें नेहरू परिवार 1857 की क्रांति के वक्त दिल्ली का कोतवाल बताता आया है।
गंगाधर नेहरू के एक बेटे मोतीलाल नेहरू का सनातन परम्पराओं से दूर का ही नाता रहा, हालांकि वो अंतिम दिनों में हर वक्त गायत्री मंत्र का जाप करते रहे थे। पंडित नेहरू के सेकुलरिज्म के बारे में तो सारे देश को पता ही है, लेकिन अंतिम समय में उनके लिए भी महामृत्युंजय जाप करवाया गया था। शुरूआत उन्होंने ही की, हिंदुओं को बिना भरोसे में लिए हिंदू कोड बिल ले आए, लेकिन इतना साहस वो मुस्लिम कोड बिल, समान नागरिक संहिता लागू करने या कश्मीर को विशेष दर्जा हटाने में नहीं दिखा पाए।
इंदिरा गांधी तमाम मंदिरों-मठों में जाती थीं, लेकिन उनका हिंदुत्व चुनाववादी और अंधविश्वासी ज्यादा था। कई साल तक संजय गांधी के लिए झांसी के एक मंदिर में लक्ष चंडी पाठ भी संजय की मौत नहीं रोक पाया था, ज्योतिषियों और सलाहकारों पर भरोसा करके उन्होंने जो जो किया, उस पर पूरी किताब लिखी जा सकती है। राजीव गांधी तो सोनिया से शादी करके पहले ही निशाने पर थे, सिख दंगों पर उनका पेड़ गिरने पर धरती हिलने वाला बयान और भारी पड़ गया। रामजन्मभूमि का ताला खुलवाना, शाहबानो केस आदि ने बता दिया कि उनकी चालें उलटी पड़ी हैं। अब उन्हीं के बेटे राहुल गांधी भी 'भारत एक खोज' में जुटे हैं।
लेकिन नेहरु वंश की वर्तमान पीढी का हिंदुत्व भी उनके आसपास के जेएनयू ब्रांड सलाहकारों का डिजाइन किया हुआ हिंदुत्व है। सबसे पहले तो उन्होंने हिंदू को हिंदुत्व से अलग कर दिया। उन्हें हिंदूइज्म पसंद है, हिंदुत्व नहीं। पिछले कुछ सालों से नई पीढ़ी को उसमें अंतर समझाने में लगे हैं कि हिंदुत्व बेहद खतरनाक है। फिर मंदिरों के चक्कर, गोत्र, जनेऊ, धोती पहनकर पूजा आदि में जुट जाते हैं और उनके विरोधी दो मिनट में उनके पूजा करने, बैठने के तरीकों से ही साबित कर देते हैं कि उनको कुछ आता नहीं है।
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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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