Get Updates
Get notified of breaking news, exclusive insights, and must-see stories!

Collegium System: कब तक चलेगी, जजों के द्वारा जजों की नियुक्ति?

2022 में कॉलेजियम व्यवस्था को पलटने के लिए सरकार की तेज हुई कोशिशें 2023 में भी जारी रहेंगी और हो सकता है कि इस साल सरकार जजों की नियुक्ति में अपने हस्तक्षेप का कानूनी अधिकार पा ले।

Collegium System government brings new law to appointment of Judges

Collegium System: पश्चिम बंगाल में राज्यपाल रहते हुए मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की पार्टी की निरंकुशता पर संविधान के अनुसार लगाम कसने के बाद उपराष्ट्रपति बने जगदीप धनकड़ ने 7 दिसंबर को सदन में अपने पहले ही संबोधन में सुप्रीम कोर्ट की निरंकुशता पर तीखा हमला बोला। उपराष्ट्रपति सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले की आलोचना कर रहे थे जिसमें उन्होंने 2014 के 'राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग', जिसे एनजेएसी कहा जाता है को रद्द कर दिया था।

केन्द्र सरकार ने जजों के द्वारा जजों को नियुक्त करने की चली आ रही व्यवस्था को पलटने के लिए संसद के दोनों सदनों में सर्वसम्मति से एनजेएसी कानून पास करा लिया था। उपराष्ट्रपति ने इसी पर नाराजगी जताते हुए कहा कि 'यह संसदीय संप्रभुता के साथ गंभीर समझौते' की मिसाल है और लोकतांत्रिक इतिहास में इस घटना जैसा कोई उदाहरण नहीं है जिसमें समुचित रूप से वैध संवैधानिक उपाय को न्यायिक रूप से खारिज कर दिया गया हो।'

ऊंची अदालतों में जजों की नियुक्ति को लेकर कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच चल रही खींचतान में शामिल होकर उपराष्ट्रपति ने इसे फिर से सार्वजनिक बहस में ला दिया। उपराष्ट्रपति के पहले मोदी सरकार में कानून मंत्री किरण रिजिजू ने भी कॉलेजियम व्यवस्था पर सवाल खड़े करते हुए कहा था कि 'भारत के अलावा दुनिया में कहीं भी जजों की नियुक्ति जज नहीं करते।' सुप्रीम कोर्ट के कई दिग्गज वकीलों ने भी कॉलेजियम व्यवस्था को 'अपारदर्शी' और 'गैर जवाबदेह' बताते हुए कहा है कि न्याय देने के अपने सबसे अहम काम की अनदेखी करके 'जज अक्सर यह तय करने में व्यस्त रहते हैं कि अगला जज कौन होगा'।

कॉलेजियम व्यवस्था पर केन्द्र सरकार की आलोचना से कोर्ट को बचाव की मुद्रा अपनाने के लिए मजबूर होना पड़ा। पूर्व मुख्य न्यायाधीश एन वी रमन ने कॉलेजियम का बचाव करते हुए कहा था कि 'यह धारणा गलत है कि जजों की नियुक्ति जज करते हैं। नियुक्ति सलाह मशविरे की लंबी प्रक्रिया के जरिए और सभी पक्षों से मशविरे के बाद की जाती है।' 3 दिसंबर को न्यायमूर्ति एमआर शाह और सीटी रविकुमार की पीठ ने बचाव करते हुए कहा कि 'किसी दखलंदाजी' के बयान के आधार पर कॉलेजियम व्यवस्था को पटरी से नहीं उतारना चाहिए।

भारत के नए प्रधान न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ ने भी इस बात को स्वीकार किया कि न्यायपालिका और कार्यपालिका के बीच कॉलेजियम विवाद का खासा असर उनके कार्यकाल पर पड़ेगा। चंद्रचूड़ चाहते हैं कि कॉलेजियम प्रणाली जारी रहे। न्यायपालिका का मानना है कि जजों की नियुक्ति के लिए 'राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग' लागू हो जाता है तो इससे जजों की नियुक्ति में विश्वसनीयता का संकट उत्पन्न हो जाएगा और जजों की नियुक्ति सरकार की पसंद और नापसंद से होने के रास्ते खुल जाएंगे।

वहीं, केन्द्र सरकार की कोशिश जल्द से जल्द 'राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग' को लागू करने की है। केन्द्र सरकार न्यायपालिका से टकराव से बचने की कोशिश करते हुए चाहती है कि न्यायपालिका इसे लागू करने में सरकार का साथ दे।

कैसे काम करता है कॉलेजियम?

सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट में न्यायिक नियुक्तियां 1998 में तैयार किए गए सहयोगात्मक प्रारूप वाले एक मेमोरेंडम ऑफ प्रोसीजर के तहत होती है। हाई कोर्ट जजों की नियुक्ति की प्रक्रिया हाइ कोर्ट कॉलेजियम से होती है, जिसमें हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश और अन्य वरिष्ठ न्यायाधीश शामिल होते है।

यह कॉलेजियम नई नियुक्तियों के लिए नामों की अनुशंसा करता है। फिर इसे राज्य सरकार, आईबी और केन्द्रीय कानून मंत्रालय को भेजा जाता है। किसी तरह का ऐतराज न पाए जाने पर केन्द्रीय कानून मंत्रालय इन नामों को सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम के पास भेजता है जिसमें भारत के प्रधान न्यायाधीश और सुप्रीम कोर्ट के अन्य वरिष्ठ जज होते हैं।

सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम अंतिम सिफारिशें कानून मंत्रालय को भेजता है। आपत्ति होने पर सरकार नामों को पुनर्विचार के लिए वापस भेज सकती है। सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम यदि अपनी सिफारिशें दोहराता है, तो केन्द्र नियुक्तियां करने के लिए बाध्य होता है। इस नियुक्ति प्रक्रिया के चरणों के लिए समय सीमांए तय हैं, लेकिन कोई भी पक्ष इनका पालन नहीं करता। आलोचक इस प्रणाली के पारदर्शी न होने की बात कहते हैं, खासकर नियुक्तियों के आधार और मानदंडों को सार्वजनिक न किए जाने के संदर्भ में।

गौरतलब है कि कॉलेजियम प्रणाली से पहले उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालयों में न्यायाधीशों की नियुक्ति राष्ट्रपति करते थे। यह काम वे मंत्रिपरिषद की सहायता और सलाह तथा भारत के प्रधान न्यायाधीश के परामर्श से करते थे। लेकिन न्यायाधीशों की सलाह राष्ट्रपति के लिए बाध्यकारी नहीं थी। 1958 में भारत के विधि आयोग ने तर्क दिया कि नियुक्ति की इस प्रणाली से सर्वश्रेष्ठ प्रतिभाओं को न्यायालयों में नियुक्ति का अवसर नहीं मिलता।

सरकार की नियुक्ति पर लगातार आलोचना होती रही और न्यायपालिका भी जजों की नियुक्ति को लेकर इस मामले में पूरी स्वतत्रंता चाहता था। 1998 में सुप्रीम कोर्ट की नौ जजों की पीठ ने अपने एक आदेश में व्यवस्था दी कि कॉलेजियम में भारत के प्रधान न्यायाधीश और शीर्ष अदालत के चार वरिष्ठतम न्यायाधीश शामिल होंगे और जजों की नियुक्ति कॉलेजियम के द्वारा होगी।

क्यों हो रही है कॉलेजियम की आलोचना?

सरकार के हाथ से निकलकर जजों के हाथ में जज की नियुक्ति करने का अधिकार आने के बाद भी कॉलेजियम प्रणाली की आलोचना होती रही है। इस आलोचना का सबसे बड़ा कारण इस पर अपारदर्शी होने का आरोप है। आलोचना करने वाले कहते हैं कि कॉलेजियम प्रक्रिया में उन कारणों का सार्वजनिक खुलासा नहीं किया जाता कि कोई उम्मीदवार नियुक्ति के लायक या नाकाबिल क्यों है?

संवैधानिक कानून विशेषज्ञों ने भी इस प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए कहा है कि कॉलेजियम प्रक्रिया में कई फैसले मौसम की तरह अप्रत्याशित होते हैं। कई जजों को सुपरसीड करने और हाईकोर्ट के कई वरिष्ठतम मुख्य न्यायाधीशों को पदोन्नत नहीं करने के आरोप भी लगे। कई आलोचकों का कहना है कि कॉलेजियम प्रणाली ज्यादा योग्य वकीलों के दावों की अनदेखी करके भाई भतीजावाद अर्थात अंकल जज सिंड्रोम को बढ़ावा देती है।

कॉलेजियम का विकल्प देने की कोशिश में केन्द्र सरकार

कॉलेजियम प्रक्रिया पर उठ रहे सवालों के बाद केन्द सरकार ने 2014 में न्यायिक नियुक्तियों की प्रक्रिया में आमूलचूल परिवर्तन के लिए संविधान में संशोधन करते हुए एक कानून पारित किया। इसके तहत राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग की स्थापना की। इस आयोग में भारत के प्रधान न्यायाधीश के बाद सुप्रीम कोर्ट के दो वरिष्ठतम जजों और केन्द्रीय कानून मंत्री के अलावा और दो ऐसे प्रतिष्ठित व्यक्ति शामिल होने थे जिनका चुनाव प्रधानमंत्री और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष की समिति करती। कम से कम एक प्रतिष्ठित व्यक्ति एससी/एसटी/ ओबीसी/धार्मिक अल्पसंख्यक समुदायों का सदस्य या महिला को होना था। किसी जज की नियुक्ति के खिलाफ अगर आयोग के दो सदस्य वोट दें दें तो उस जज की नियुक्ति नहीं की जा सकती।

2015 में सुप्रीम कोर्ट ने इस संशोधन को यह कहकर रद्द कर दिया कि यह संविधान के मूल ढांचे का उल्लंघन करता है। सुप्रीम कोर्ट का कहना था कि इस नई प्रणाली में राजनैतिक दखल का अंदेशा है, जो न्यायिक स्वतंत्रता में बाधक है। न्यायिक स्वतंत्रता संविधान के असंशोधनीय मूल ढांचे का हिस्सा है, इसलिए संशोधन अमान्य है। न्यायपालिका का मानना है सरकार की मंशा अगर पूरी होगी तो न्यायालय सरकार द्वारा नियंत्रित संस्था में तब्दील हो जाने की प्रबल संभावना उत्पन्न हो जाएगी, जिसे हम नहीं होने देना चाहते हैं।

कॉलेजियम पर न्यायपालिका से टकरा रही केन्द्र सरकार अब 'राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग' के एक नए संस्करण पर काम कर रही है, जिसमें सुप्रीम कोर्ट से झटका खा चुकी केन्द्र सरकार के पास सुप्रीम कोर्ट से प्रतिकूल फैसले के खिलाफ बचाव के पर्याप्त उपाय मौजूद रहेंगे। केन्द्र सरकार कॉलेजियम पर बहस को जिंदा रखकर कॉलेजियम प्रणाली के खिलाफ सार्वजनिक नैरेटिव खड़ा करना चाहती है। न्यायपालिका और कार्यपालिका की अपनी अपनी दलीले हैं। फिलहाल कार्यपालिका और न्यायपालिका दोनों पीछे हटने को तैयार नहीं हैं।

यह भी पढ़ें: Congress led Opposition: 2024 के लिए कांग्रेस किस तरह की खिचड़ी पका रही है?

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

More From
Prev
Next
Notifications
Settings
Clear Notifications
Notifications
Use the toggle to switch on notifications
  • Block for 8 hours
  • Block for 12 hours
  • Block for 24 hours
  • Don't block
Gender
Select your Gender
  • Male
  • Female
  • Others
Age
Select your Age Range
  • Under 18
  • 18 to 25
  • 26 to 35
  • 36 to 45
  • 45 to 55
  • 55+