China on Kashmir: नयी दिल्ली से टकराव की नित्य नयी जमीन तैयार करता बीजिंग
चीन जानबूझकर भारत से टकराव की नित्य नयी जमीन तैयार कर रहा है। कश्मीर में आयोजित जी-20 के पर्यटन मंत्रियों की बैठक का बहिष्कार और कश्मीर को विवादित क्षेत्र बताकर उसने भारत के साथ टकराव का एक और मोर्चा खोल दिया है।

China on Kashmir: कश्मीर में जी 20 के पर्यटन कार्य समूह की बैठक का चीन द्वारा खुला बहिष्कार यह समझने के लिए काफी है कि बीजिंग भारत के साथ संबंध सुधारने के प्रति गंभीर नहीं है। चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता वांग वेनबिन ने बकायदा एक बयान जारी कर कहा कि "उनका देश कश्मीर जैसे किसी विवादित क्षेत्र में जी20 बैठक के आयोजन का दृढ़ता से विरोध करता है और ऐसी बैठकों में शामिल नहीं होगा।" बावजूद इसके भारत ने श्रीनगर में जी 20 देशों की सफल बैठक का आयोजन कर चीन को इसका ठीक जवाब दे दिया।
यही नहीं मार्च के अंतिम सप्ताह में अरूणाचल प्रदेश के इटानगर में हुई जी 20 की एक अन्य बैठक का भी चीन ने बायकॉट किया, जबकि इस बैठक में 100 से ज्यादा सदस्य देशों के प्रतिनिधियों ने भाग लिया था। उसी समय भारत को उकसाने के लिए बीजिंग ने अरुणाचल के कई गांवो, नदियों का चीनी भाषा में नया नामकरण भी कर दिया। चीन के भारत के प्रति आक्रामक रवैये को देखकर इस बात की आशंका हो रही है कि बीजिंग एक नए टकराव की जमीन तैयार कर रहा है।
देखा जाए तो कश्मीर को विवादित बताकर जी 20 बैठक से अलग होने की चीन की घोषणा भारत के मामले में सीधा हस्तक्षेप है। चीन अभी तक इसे विवादित मुद्दा बताकर यूएनओ के करार के मुताबिक हल करने की सिफ़ारिश करता रहा है। ऐसा वह पाकिस्तान के प्रति अपने प्यार के इजहार में करता है। पर पहली बार अपने को आगे रखकर कश्मीर को मुद्दा बनाया और भारत को नीचा दिखाने कीे कोशिश की। यह चीन की दोहरी नीति का सबूत है। एक तरफ चीन के विदेश मंत्री वांग यी एससीओ की बैठक में यह कह कर गए कि सीमा विवाद को एक तरफ परे रखकर भारत को व्यापार एवं अन्य द्विपक्षीय मुद्दों को सुलझाने का प्रयास करना चाहिए। दूसरी तरफ वह स्वयं व्यापार बढाने की संभावनाओं को कुचलने का प्रयास करता है। क्या बीजिंग को यह मालूम नहीं है कि कश्मीर में जी 20 देशों के सदस्यों के बीच पर्यटन उद्योग को बढ़ावा देने पर ही चर्चा हो रही है, जिसे बिगाड़ने की वह असफल कोशिश कर चुका है।
हालांकि चीन के साथ तुर्की, सऊदी अरब, मिस्र और इंडोनेशिया ने भी कश्मीर में हुई मीटिंग से दूरी बनाई, लेकिन किसी ने भी वह बयान नहीं दिया, जो पाकिस्तान दिलाना चाहता था। पाकिस्तान जी 20 का सदस्य नहीं है, उसके बावजूद वह सदस्य मुस्लिम देशों को जम्मू-कश्मीर न जाने के लिए मनाने में जुटा रहा। इस्लामाबाद ने कश्मीर में मानवाधिकारों का उल्लंघन, राजनीतिक उत्पीड़न और अवैध गिरफ्तारियों की मनगढंत किस्सों को बेचने की कोशिश की। किसी और देश ने पाकिस्तान के प्रोपेगांडा पर ध्यान भी नहीं दिया, लेकिन चीन ने इस्लामाबाद की हां में हां मिलाने में कोई कसर नहीं छोड़ी।
भारत के पास इस समय जी 20 देशों की अध्यक्षता है और उसे पूरा अधिकार है कि वह किसी भी क्षेत्र में बैठकों का आयोजन कर सकता है। अमेरिका, ब्रिटेन और यूरोप के सदस्य देशों ने भारत की संप्रभुता का पूरा सम्मान किया और खुशी खुशी कश्मीर में आकर शिरकत की। 22 से 24 मई के बीच चले इस आयोजन में भारत ने जिन 25 देशों को आमंत्रित किया था, उनमें से 20 देशों ने भाग लिया। चीन इससे ही समझ सकता है कि विश्व मंच पर भारत के समकक्ष उसकी हैसियत क्या है।
चीन ने कश्मीर मामले पर तब भी भारत का इतना खुला विरोध नहीं किया था जब भारत ने 2019 में जम्मू-कश्मीर से धारा 370 हटाकर दो संघ शासित क्षेत्रों, जम्मू-कश्मीर और लद्दाख का गठन कर दिया था। जबकि लद्दाख भारत और चीन के बीच वास्तविक नियंत्रण रेखा के साथ बसा है और चीन ने इसके कुछ हिस्सों को भी विवादित घोषित कर रखा है।
इधर भारत और चीन के बीच एक सैन्य गतिरोध अभी भी बना हुआ है। डोकलाम की घटना को हुए छह साल और तवांग नदी पर हुए खूनी संघर्ष के तीन साल होने वाले हैं, लेकिन अब भी सीमा विवाद के समाधान के कोई संकेत नहीं हैं। जबकि मंत्री और सैन्य कमांडर स्तर पर कई दौर की बातचीत हो चुकी है। दोनों देशों के बीच 3500 किलोमीटर लंबी सीमा पर हमेशा ही तनाव बना रहता है।
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चीन एक तरफ बातचीत का माहौल बनाने का दावा करता है और दूसरी तरफ लगातार एकतरफा कार्रवाई कर संबंधों में जटिलता बनाए रखता है। पिछले महीने चीन ने अरुणाचल प्रदेश के 11 स्थानों का नाम चीनी भाषा में बदल दिया। चीन इन्हें अपना क्षेत्र दक्षिणी तिब्बत कहता है। जबकि भारत ने इस पर कड़ा एतराज जताया था। भारत से लगी अपनी सीमाओं पर चीन तेजी से सैन्य और अन्य बुनियादी ढांचे का विकास कर रहा है। भारत भी उसी त्वरित गति से सुरंगों, सड़कों और पुलों का निर्माण कर रहा है।
हाल ही में गृह मंत्री अमित शाह ने अरुणाचल प्रदेश का दौरा कर पूर्वोत्तर में लगभग 3000 सीमावर्ती गांवों को विकसित करने के लिए 57 अरब डॉलर की परियोजनाओं का अनावरण कर चीन को माकूल जवाब दिया था। शाह ने चीन को जवाब देते हुए कहा था - हमारी नीति स्पष्ट है कि हम सभी से शांति चाहते हैं। कोई भी हमारी एक इंच जमीन का भी अतिक्रमण नहीं कर पाएगा।
चीन के रवैये से भारत सरकार और राजनयिकों को निराशा ही मिली है। पिछले 23 अप्रैल को18वें दौर की सैन्य वार्ता के बाद भी विवाद हल करने की दिशा में कोई सकारात्मक पक्ष सामने नहीं आया। चीन ने इन बैठकों को सकारात्मक तो बताया है लेकिन साथ में यह सलाह भी दी है कि अमेरिका की शह पर भारत चीन के खिलाफ आक्रामक रुख न अपनाये। पहले रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और हाल ही में विदेश मंत्री एस जयशंकर ने स्पष्ट रूप से कह दिया कि चीन की तरफ से अनिश्चितता बनी हुई है और भारत अपनी सीमा की रक्षा के लिए तत्पर है। राजनाथ सिंह ने यहां तक कह दिया कि सीमा प्रबंधन समझौतों के उल्लंघन ने द्विपक्षीय संबंधों को खत्म कर दिया है, और संबंधों का विकास सीमाओं पर शांति पर आधारित है।
भारत लगातार कह रहा है कि चीन द्वारा सीमा पर सेना के भारी जमावड़े से द्विपक्षीय संबंध सामान्य नहीं बन पाएंगे। संबंध तभी सुधर सकता है जब पीएलए अलग हो जाए और अतिरिक्त बल वापस ले ले। सीमा पर इस समय दोनों ओर लगभग एक एक लाख सेना के जवान तैनात हैं। भारतीय सेना के कमांडर सीमा पर किसी भी आकस्मिक स्थिति को संभालने के लिए पूरी क्षमता से डटे हुए हैं। चीन यदि कूटनीति के बजाय आक्रामकता की नीति पर कायम रहता है तो आने वाले दिनों में फिर से किसी बड़े टकराव की आशंका बनी रहती है।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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