Children on Social Media: सोशल मीडिया का शिकार होता बचपन
Children on Social Media: आइये पहले हाल की दो घटनाओं को देखते हैं। पहली घटना है गाजियाबाद की जहां गेमिंग एप के जरिए दो बच्चों का धर्मांतरण करवा दिया गया। जिस शहनवाज नामक व्यक्ति ने ये किया उसने अन्य कई बच्चों को गेमिंग एप्प के जरिए निशाना बनाया था। अब वह गिरफ्तार हो चुका है।
इसी तरह दूसरी घटना है बरेली की जहां एक नाबालिग लड़की एक गिरोह के चक्रव्यूह में फंस गयी जिसमें शामिल कई लोगों ने उसके साथ रेप किया। इस गिरोह का सरगना एक 55 वर्षीय व्यक्ति शाह आलम था जिसने उस नाबालिग लड़की को ट्रैप में फंसाया था। उस नाबालिग लड़की के साथ इस गिरोह के लोगों ने न सिर्फ अलग अलग जगहों पर भेजकर रेप करवाया बल्कि उस पर इस्लाम कबूल करने का दबाव भी बनाया। अब शाह आलम भी गिरफ्तार किया जा चुका है।

इन दोनों ही घटनाओं में दो बातें कॉमन हैं। दोनों ही घटनाओं में पीड़ित बच्चे हैं और उन्हें सोशल मीडिया के जरिए शिकार बनाया गया। स्वाभाविक है कम उम्र के किशोरों और बच्चों को अपने जाल में फंसाने के लिए अपराधी मानसिकता के लोग सोशल मीडिया के जरिए उन्हें अपना शिकार बना रहे हैं। सोशल मीडिया पर गुपचुप बच्चों की मौजूदगी का पता भी तब चलता है जब उनके साथ कुछ अप्रिय हो जाता है। वरना वो अपनी कई कई आईडी के साथ सोशल मीडिया पर सक्रिय रहते हैं।
हो सकता है हर बच्चा इस तरह अपराधियों के चंगुल में न फंसे लेकिन खतरा सिर्फ अपराध का नहीं है। सोशल मीडिया पर बच्चों के सामने खतरे ही खतरे हैं। अमेरिका के मैरीलैंड की जिला स्कूल परिषद- हॉवर्ड काउंटी पब्लिक स्कूल काउंसिल ने मेटा, गूगल, स्नैपचैट और टिकटॉक जैसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्मों के खिलाफ केस दायर किया है। उनकी शिकायत है कि सोशल मीडिया की लत बच्चों को मनोरोगी बना रही है।
हालांकि, सोशल मीडिया को बढ़ावा देने के लिए दुनियाभर में इसके बहुत सारे फायदे गिनाए जाते हैं। जैसे कि यह बच्चों को दुनिया के बारे में ज्यादा जानकार और स्मार्ट बना रहा है, इससे उनमें कम्युनिकेशन स्किल डेवलप होती है, इसकी मदद से वे अपने क्लासमेट्स और टीचर्स के कॉन्टेक्ट में बने रहते हैं, उनमें आत्मविश्वास बढ़ता है... लेकिन, बच्चों पर मोबाइल गेम या सोशल मीडिया के मनोवैज्ञानिक प्रभाव को लेकर होने वाले अध्ययन कुछ और ही कहानियॉं बयां करते हैं।
पिछले कुछ वर्षों में सामने आए शोध निष्कर्ष बताते हैं कि सोशल मीडिया किस तरह से बच्चों से उनका बचपन छीन रहा है और उन्हें सामाजिक रूप से अलग-थलग कर रहा है। मन पर ही नहीं, मस्तिष्क पर भी इसका काफी बुरा असर पड़ता है। देर तक मोबाइल स्क्रीन पर सक्रिय रहने का खतरा सिर्फ कोमल आंखों को ही नहीं है बल्कि इसका गहरा असर अबोध मन पर भी होता है। कुछ ब्रिटिश जर्नल का दावा है कि इससे उनके सीखने की क्षमता घटती है। उनके निर्णय लेने की क्षमता भी प्रभावित होती है। इसी साल जनवरी में अमेरिका की यूनिवर्सिटी ऑफ नॉर्थ कैरोलिना के न्यूरो साइंटिस्टों ने तीन साल तक 170 स्कूली छात्रों से मिले डेटा की स्टडी के नतीजे सार्वजनिक किए। उनका कहना था कि जो बच्चे बार-बार सोशल मीडिया अकाउंट चेक करते हैं, उनके मष्तिष्क का आकार छोटा रह जाता है।
मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि सोशल मीडिया के बेजा इस्तेमाल की वजह से बच्चों में तनाव और अवसाद का स्तर बढ़ा है। इसका एडिक्शन उनमें एंजाइटी और ईटिंग डिसऑर्डर जैसी समस्याएं भी पैदा कर रहा है। इसके अलावा यह उनके ऑनलाइन अपराधियों और 'साइबर दादाओं' के चंगुल में फँस जाने का डर भी बढ़ा देता है। सोशल मीडिया की लत की वजह से वे रात को देर तक मोबाइल से चिपके रहते हैं, जिसकी वजह से उनकी नींद पूरी नहीं हो पाती और उनके अनिद्रा, मोटापे और दूसरी कई बीमारियों की गिरफ्त में आने का जोखिम बढ़ जाता है।
मोबाइल स्क्रीन से चिपके रहने का यह एडिक्शन उनकी एकाग्रता में भी बाधक बनता है क्योंकि वे हर पॉंच-दस मिनट में यह जानते रहना चाहते हैं कि इस दौरान क्या नया हो चुका है। चीजें उनके अनुकूल न हों तो उन्हें गुस्सा आता है, उनमें आक्रामकता बढ़ती है और वे खुद को या दूसरों को नुकसान पहुँचाने के बारे में सोचने लगते हैं।
ब्रिटेन के इंस्टीट्यूट ऑफ लेबर इकॉनामिक्स ने 'सोशल मीडिया यूज एंड चिल्ड्रन्स वेलबीइंग' शीर्षक से एक स्टडी की थी। इसके अंतर्गत 10 से 15 साल की उम्र वाले चार हजार बच्चों से बातचीत की गई। स्टडी में पाया गया कि जो बच्चे सोशल मीडिया पर ज्यादा वक्त बिताते थे, वे अपने घर-परिवार, स्कूल, दोस्त और जीवन से ज्यादा नाखुश या असंतुष्ट पाए गए। इसकी वजह थी कि लगातार आभासी दुनिया में बने रहने से उनके भीतर दूसरों के जीवन से अपनी तुलना करने की प्रवृत्ति विकसित होना। इससे उन्हें अपूर्णता का अनुभव होता है, जिसका असर उनकी परफॉर्मेंस और प्रॉडक्टिविटी पर पड़ता है।
मोबाइल और सोशल मीडिया की लत ने बच्चों और किशोरों को ऐसे-ऐसे विकारों की गिरफ्त में ला दिया है, जिनके कुछ साल पहले तक किसी ने नाम भी नहीं सुने होंगे। सेल्फाइटिस डिसऑर्डर (हर रोज चार-पॉंच सेल्फी लेना और सोशल मीडिया पर डालना), फैंटम वाइब्रेशन सिंड्रोम ( जेब में रखे मोबाइल का वाइब्रेशन फील करना), रिंजाइटी (बार-बार यह गलतफहमी होना कि फोन की रिंग बज रही है), नोमोफोबिया( मोबाइल पास न होने पर बेचैनी का अनुभव), फेसबुक डिप्रेशन (पोस्ट पर लाइक न आए तो डिप्रेशन में आ जाना) ऐसे ही कुछ कॉमन डिसऑर्डर हैं।
यह सच है कि आज की टेक्नोलॉजी चलित दुनिया में मोबाइल या सोशल मीडिया के बिना काम नहीं चल सकता। पैरेंट्स का यह डर बेबुनियाद नहीं है कि अगर बच्चों को इन चीजों से दूर रखा गया तो वे जीवन की दौड़ में पिछड़ जाएंगे। लेकिन, इस जरूरत को लत बनने से पहले काबू तो किया ही जा सकता है। इसके लिए सबसे ज्यादा जरूरी है, बच्चों में डिजिटल लिटरेसी को बढ़ावा देना। जिस समय स्कूलों में उन्हें कम्प्यूटर या इंटरनेट का उपयोग सिखाया जाता है, उसी समय उन्हें यह भी बताया जा सकता है कि सोशल मीडिया का सुरक्षित और जिम्मेदारी के साथ उपयोग कैसे किया जाए।
थोड़ी कोशिशें अभिभावकों को भी करनी पड़ेंगी। वे अपने बच्चों के स्टडी टाइम, गेम टाइम की तरह उनका स्क्रीन टाइम भी फिक्स कर सकते हैं। इसके अलावा बीच-बीच में बच्चों की मॉनीटरिंग करते रहना भी जरूरी होता है कि कहीं उनका ऑनलाइन व्यवहार उनके लिए नुकसानदेह तो नहीं बनने जा रहा। या कि वे किससे इंटरेक्ट कर रहे हैं और किस किस्म की बातें कर रहे हैं। इसके अलावा वे उन्हें आउटडोर एक्टिविटीज में हिस्सा लेने के लिए प्रेरित कर सकते हैं। इससे बच्चों के जीवन और सोच में सकारात्मक बदलाव आएगा और उनके साथ कुछ अप्रिय होने का खतरा भी टल जाएगा।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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