सीबीआई तो औजार बन गयी, मोदी-ममता का हथियार बन गयी!

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    CBI vs Kolkata Police: Mamata Banerjee के इस दांव से फंस गई CBI | वनइंडिया हिंदी

    नई दिल्ली। कोलकाता में जंग छिड़ी हुई है। यह उस बड़ी जंग का ट्रेलर है जो अप्रैल-मई में होने वाली है। ममता बनर्जी ने नारा दे रखा है- 2019 बीजेपी Finish. इस बात की चर्चा बेमानी है कि इस जंग में कौन गलत है, कौन सही है। सबका जवाब वही है- मोहब्बत और जंग वाला जुमला।

    सीबीआई तो औजार बन गयी, मोदी-ममता का हथियार बन गयी!

    सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और राज्य, मोदी और ममता, सीबीआई और बंगाल पुलिस के बीच की जंग को और आने वाले समय में बड़ी जंग की तैयारी को शायद समझ लिया। इसलिए कोर्ट ने सीबीआई को उल्टे पैर अपने दरवाजे से लौटा दिया।

    दो अहम सवाल

    दो अहम सवाल

    · एक सवाल बहुत जायज है कि 5 साल से चल रहे चिटफंड घोटाले की जांच में इतना बड़ा कदम आम चुनाव से पहले क्यों लिया जा रहा है?
    · एक और सवाल है कि जब सीबीआई के नये डायरेक्टर कार्यभार सम्भालने वाले हैं तो जाते-जाते अंतरिम डायरेक्टर इतना बड़ा फैसला कैसे ले सकते हैं?

    यह बड़ा फैसला क्यों है? इसलिए, क्योंकि पश्चिम बंगाल और आन्ध्र प्रदेश की सरकारों ने अपने-अपने राज्यों में सीबीआई के प्रति अविश्वास जताते हुए उसे बगैर अनुमति की जांच करने देने से मना कर दिया है।

    इस मामले में यह जरूर है कि सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर सीबीआई की जांच जारी है। लिहाजा उसे पश्चिम बंगाल सरकार से अनुमति की जरूरत नहीं थी। मगर, सीबीआई को यह समझने की जरूरत थी कि साख आपकी जा चुकी है। ऐसे में आप पश्चिम बंगाल की सरकार और पुलिस से दोस्ताना व्यवहार की उम्मीद नहीं कर सकते। खासकर तब, जब जांच सरकार के मंत्रियों और पुलिस अधिकारियों के ख़िलाफ़ हो। आपकी मदद आपकी तैयारी ही करेगी। कोलकाता पुलिस कमिश्नर के पास पुलिस फोर्स है। इसलिए तैयारी मजबूत होनी चाहिए थी। जैसा कि सुप्रीम कोर्ट ने सबूत मांगा है। वह सबूत होने चाहिए थे। वॉरंट भी लेकर आते, तो किसी को कुछ बोलने का मौका नहीं मिलता।

    कार्यमुक्त होने से पहले प्रभारी डायरेक्टर क्यों हो गये अधीर?

    कार्यमुक्त होने से पहले प्रभारी डायरेक्टर क्यों हो गये अधीर?

    प्रश्न ये है कि क्या इस बात का अंदेशा नहीं था? अंदेशा था। मगर, एक कार्यकारी सीबीआई डायरेक्टर को जिसे अगले दिन ही कार्यमुक्त होना हो, उसे इस बात से क्या मतलब? उसे अपने अगले असाइनमेंट की चिन्ता होगी जो केंद्र सरकार ही दे सकती है। जैसा कि ममता बनर्जी ने अमित शाह और नरेंद्र मोदी पर सीधे तौर पर इस मामले के पीछे जिम्मेदार होने का आरोप लगाया है कि उनके इशारे पर ही ऐसा हुआ। इस पूरी कार्रवाई से बीजेपी को फायदा ये होना था कि सीबीआई की नकेल कसे जाने पर या तो ममता बनर्जी झुकेंगी। और, नहीं झुकीं तो राजनीतिक लड़ाई में उन्हें भ्रष्टाचार में ‘सबका साथ, सबका विकास' करता दिखाया जा सकेगा।

    किन्हें है संवैधानिक संस्थाओं की फिक्र

    किन्हें है संवैधानिक संस्थाओं की फिक्र

    बीजेपी के लिए राजनीतिक लाभ यही है कि वह पूरे विपक्ष को भ्रष्टाचार के मुद्दे पर एकजुट हुआ बता रही है। ममता बनर्जी को संवैधानिक संस्था का अपमान करने वाला दिखा रही है। अगर कोलकाता की जंग की इकलौती घटना से यह मतलब निकाला जाए, तो बीजेपी शायद अपने मकसद में सफल नज़र आए। ममता बनर्जी को अरविन्द केजरीवाल, तेजस्वी यादव, अखिलेश यादव, उमर अब्दुल्ला, चंद्र बाबू नायडू, राहुल गांधी सबका समर्थन मिलता दिखा। भ्रष्टाचार के मुद्दे पर बीजेपी ये देखना और दिखाना चाहती थी। मगर, क्या वास्तव में बीजेपी को इसका राजनीतिक लाभ मिलेगा? नहीं। यह सच है कि संवैधानिक संस्था का सम्मान करने की मंशा ममता बनर्जी सरकार की नहीं रही है। अरविन्द केजरीवाल सरकार ने भी बारम्बार इस बात को साबित किया है। कांग्रेस की सरकारों पर भी सीबीआई के दुरुपयोग के आरोप लगते रहे हैं। मगर, क्या इससे बीजेपी सरकार खुद पर लगते रहे आरोपों से बच जाएगी?

    लोकपाल न मोदी को चाहिए, न केजरीवाल-ममता को

    लोकपाल न मोदी को चाहिए, न केजरीवाल-ममता को

    लोकपाल को नरेंद्र मोदी ने न मुख्यमंत्री रहते हुए गुजरात में नियुक्त होने दिया, न प्रधानमंत्री रहते हुए केंद्र में। लोकपाल का डर अरविन्द केजरीवाल को भी रहा, ममता बनर्जी और दूसरी सरकारों के मुखिया को भी। हर नेता खुद को किसी के नियंत्रण से आज़ाद रखना चाहता है मगर दूसरे को नियंत्रित करना चाहता है। इन नेताओं को संवैधानिक संस्था चाहिए, मगर दूसरों पर नियंत्रण करने के लिए।

    ममता के लिए कभी सांप्रदायिकता से ज्यादा ‘वाम कुशासन’ था अहम

    ममता के लिए कभी सांप्रदायिकता से ज्यादा ‘वाम कुशासन’ था अहम

    पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी को राजनीतिक फायदा नरेंद्र मोदी से लड़ने में है। इसलिए ऐसी किसी भी लडाई का बहाना उन्हें चाहिए। कभी जब वामपंथी उनका मुख्य दुश्मन थे, तब ममता को बीजेपी के साथ गठबंधन करने में कोई गुरेज नहीं था। साम्प्रदायिकता से बड़ा मुद्दा तब ममता के लिए वामदलों का कुशासन था। आज वामदल मुकाबले में नहीं है और ममता की ताकत का आधार बीजेपी विरोध की राजनीति है, तो उसे बीजेपी से नफ़रत है।

    सीबीआई ममता और मोदी के बीच जंग का औजार बन गयी है। दोनों ही इस औजार का इस्तेमाल एक-दूसरे का राजनीतिक लहू निकालने में कर रहे हैं। ऐसा करते हुए सीबीआई की धार ही भोथरी होती चली जा रही है। कोई है जो सीबीआई में धार पैदा कर सके, सीबीआई का गौरव उसे वापस दिला सकें। आज ही सीबीआई को नये डायरेक्टर ऋषि कुमार शुक्ला के रूप में मिले हैं। क्या हम ऐसी शुभकामनाओं से उम्मीद रख सकते हैं?

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