Opposition Boycott: मोदी विरोध के लिए बहिष्कार की राजनीति
नये संसद भवन के उद्घाटन का बहिष्कार असल में मोदी विरोध की राजनीति का एक हिस्सा है। राष्ट्रपति आते तो यही विपक्ष मोदी विरोध के लिए कोई और मुद्दा तैयार कर लेता।

हिंदी का एक मुहावरा है, मौके पर चौका मारना। अवसर हाथ लगा नहीं कि उसका फायदा उठा लिया जाए। फायदा उठाने का तरीका जायज हो या नाजायज, कम से कम मौजूदा राजनीति इससे प्रभावित नहीं होती। नई संसद भवन के उद्घाटन के अवसर पर बीस विपक्षी दलों ने जो रणनीति अपनाई है, वह मौके पर चौका मारने वाली कहावत का बेहतरीन उदाहरण है।
28 मई को नए बने संसद भवन का उद्घाटन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी करने जा रहे हैं, विपक्ष ने इसे मुद्दा बनाकर इस समारोह के बहिष्कार का ऐलान कर दिया है। विपक्षी दलों की मांग है कि इस भवन का उद्घाटन राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू से कराया जाना चाहिए। विपक्ष आरोप लगा रहा है कि मोदी सरकार ने ऐसा करके राष्ट्रपति पद की गरिमा और सम्मान को चोट पहुंचाई है।
लेकिन सवाल यह है कि क्या जिन्हें राष्ट्रपति के सम्मान की चिंता हो रही है, उनका इस मामले में रिकॉर्ड बेहतर रहा है? 2004 में केंद्र में सत्ता संभालते ही सोनिया गांधी की अध्यक्षता वाली कांग्रेस की अगुआई वाली बनी संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन की सरकारों ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की पृष्ठभूमि वाले राज्यपालों भाई परमानंद, सुंदर सिंह भंडारी, विष्णुकांत शास्त्री आदि को बर्खास्त कर दिया था। राज्यपालों की विदाई के वक्त प्रोटोकॉल के तहत गॉर्ड ऑफ ऑनर देने की व्यवस्था है। लेकिन मनमोहन सिंह की अगुआई वाली सरकार ने राज्य सरकारों को आदेश दिया था कि किसी भी राज्यपाल को पारंपरिक विदाई गार्ड ऑफ ऑनर न दिया जाए।
चूंकि यह कार्यपालिक आदेश था, इसलिए तमाम राज्य सरकारों ने इसे स्वीकार कर लिया था, सिवा उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव के। यादव ने अपने राज्य के राज्यपाल रहे विष्णुकांत शास्त्री को गार्ड ऑफ ऑनर के साथ विदाई दी थी। उनका कहना था कि इतने शरीफ और साहित्यकार के रूप में ख्यात शास्त्री जी का वे अपमान नहीं कर सकते थे। सवाल यह है कि क्या उस वक्त संवैधानिक पदों वाले राज्यपालों की कोई गरिमा नहीं थी?
इसी तरह एक घटना और देखिए। 26 फरवरी 2003 को संसद के केंद्रीय कक्ष में वीर सावरकर का तैल चित्र लगाया गया था। उस कार्यक्रम का भी कांग्रेस की अगुआई में विपक्ष के कई दलों ने बहिष्कार किया था।
भारतीय संविधान और परंपरा के मुताबिक, प्रधानमंत्री के देश से बाहर जाने और लौटने के बाद राष्ट्रपति को जानकारी देने की परंपरा रही है। लेकिन राजीव गांधी ने इस परंपरा को ताक पर रखना शुरू कर दिया था। शायद उन्हें लगा था कि उनकी मां इंदिरा के कहने पर झाड़ू लगाने की बात करने वाले राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह उनकी इस नाफरमानी को स्वीकार कर लेंगे। लेकिन ज्ञानी जी ने इसके लिए राजीव गांधी को टोक दिया था, तब राजीव गांधी ने उन्हें जवाब दिया था कि संविधान में ऐसी किसी बाध्यता का जिक्र नहीं है। ज्ञानी जी भरे हुए थे, उन्होने तपाक से जवाब दिया था, लेकिन संविधान भारत के राष्ट्रपति को यह अधिकार देता है कि नाफरमानी करने वाली सरकार को बर्खास्त कर सकता है।
राजीव गांधी और ज्ञानी जैल सिंह के बीच तनातनी इतनी बढ़ी कि ज्ञानी जी ने तीन अप्रैल 1987 को राजीव सरकार को बर्खास्त करने की तैयारी कर ली थी। यह बात और है कि संवैधानिक प्रावधानों के तहत कोई नेता सरकार बनाने को तैयार नहीं हुआ, लिहाजा ज्ञानी जी ने अपना विचार त्याग दिया। तब राजीव गांधी ने राहत की सांस ली थी। उस दिन राजीव अपने सलाहकारों के साथ दूरदर्शन और रेडियो चलाकर बैठे थे क्योंकि उन्हें पता था कि राष्ट्रपति ने सरकार की बर्खास्तगी की जानकारी देने के लिए आकाशवाणी और दूरदर्शन की टीम को बुला रखा था।
यह ठीक है कि संविधान के अनुच्छेद 79 के तहत अपनी संसद के दोनों सदनों राज्यसभा और लोकसभा के अलावा एक अंग राष्ट्रपति भी है। यह देखते हुए तो विपक्ष की मांग प्रथम दृष्टया वाजिब भी लगती है। लेकिन इस मांग के लिए बाल हठ पकड़ते हुए उद्घाटन कार्यक्रम का बहिष्कार करना भी ठीक नहीं कहा जा सकता। संसदीय लोकतंत्र में संसद ना सिर्फ राष्ट्र की संप्रभुता की गारंटी है, बल्कि वह सबसे पवित्र और सर्वोच्च पंचायत भी है। वह ना सिर्फ देश को दिशा देती है, बल्कि राष्ट्र की संप्रभुता का संरक्षण भी करती है। इसलिए प्रधानमंत्री के नाम पर उसके उद्घाटन अवसर का बहिष्कार करना एक तरह से संसद की पवित्रता पर शुरूआत में ही आशंकाओं की बुनियाद डालना है।
वैसे भी साल 2014 से जिस तरह विपक्ष राजनीतिक दांवपेच चल रहा है, जिस तरह से आए दिन विपक्षी राजनीतिक एजेंडे वाले टूलकिट सामने आते रहे हैं, उससे देश में एक धारणा भी पुष्ट हुई है। धारणा यह कि चूंकि देश की कार्यपालिका के सर्वोच्च पद पर विपक्षी नजर में अनचाही शख्सियत नरेंद्र मोदी पहुंच चुकी है, इसलिए उसका विरोध करना है। यह अवधारणा भी स्थापित हुई है कि विपक्षी विरोध का एकमात्र लक्ष्य मोदी के विरोध के लिए विरोध करना है। इससे यह भी स्थापित हुआ है कि विपक्षी दल कार्यपालिका के सर्वोच्च पद पर मोदी के नाम को पचा नहीं पाया है। इसलिए वह अक्सर किसी न किसी बहाने गैर वाजिब मुद्दों पर भी विरोध करता रहता है।
तमिलनाडु के किसानों का दिल्ली के जंतर-मंतर पर चला लंबा धरना हो या फिर नागरिकता संशोधन कानून में बदलाव का देशव्यापी विरोध, अफजल की फांसी का विरोध हो या फिर शिक्षा के कथित भगवाकरण के विरोध में जामिया, जादवपुर और जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में चला विरोध, रोहित वेमुला के नाम पर चला मोदी सरकार विरोधी आंदोलन हो या फिर किसान आंदोलन, ऐसे तमाम आंदोलन रहे, जिनके बारे में मोटे तौर पर देश में यह धारणा बनी है कि विपक्ष की शह पर ये सारे आंदोलन सिर्फ और सिर्फ मोदी विरोध के लिए किए जाते रहे हैं।
अगर ऐसा नहीं है तो भला नयी संसद भवन के उद्घाटन के बहिष्कार का क्या औचित्य है? साल 2010 में लोकसभा की तत्कालीन स्पीकर मीरा कुमार की अध्यक्षता में नए संसद भवन पर विचार करने के लिए एक समिति संसद ने बनाई थी। उसी समिति ने भविष्य की चुनौतियों से निबटने और भविष्य में बढ़ने वाली सांसद संख्या के लिहाज से नई संसद बनाने का प्रस्ताव दिया था, जिसे नरेंद्र मोदी सरकार ने स्वीकार किया। इसी सरकार ने सेंट्रलविस्टा परियोजना शुरू की, जिसमें नया सचिवालय, नई संसद, प्रधानमंत्री और उपराष्ट्रपति के निवास आसपास के परिसर में बनाने का फैसला किया। लेकिन अब जब संसद भवन बनकर तैयार है तो राष्ट्रपति को न बुलाने के बहाने उसी कांग्रेस ने बहिष्कार कर दिया।
वैसे यह भी याद करना चाहिए कि कई मौके आये हैं जब कांग्रेस की ही सरकारों ने राष्ट्रपति या राज्यपाल की अनदेखी करने से परहेज नहीं किया है। फिर चाहे वह पार्लियामेंट एनेक्सी का उद्घाटन हो, या फिर संसद के पुस्तकालय भवन का शिलान्यास। कभी इंदिरा गांधी तो कभी राजीव गांधी ये काम किया था। इसी तरह मणिपुर विधानसभा का उद्घाटन सोनिया गांधी, छत्तीसगढ़ विधानसभा का भूमिपूजन सोनिया गांधी और राहुल गांधी कर चुके हैं। असम की नई विधानसभा का भूमि पूजन कांग्रेसी मुख्यमंत्री तरूण गोगोई ने किया था। अगर राष्ट्रपति या राज्यपाल के हाथों ही शिलान्यास और उद्घाटन होना है तो ऐसे कई उदाहरण अमित शाह भी गिना रहे हैं।
लेकिन यहां यह भी याद रखना चाहिए कि कांग्रेसी जिसका बहिष्कार करते हैं, मौका आने पर उसकी मदद भी ले लेते हैं। इसी तरह 2001 के संसद के अंदर कांग्रेस सहित विपक्षी पार्टियों ने जार्ज फर्नांडीज का बहिष्कार किया था। तब ताबूत घोटाले के बाद जार्ज फर्नांडिस को अटल बिहारी वाजपेयी ने फिर से रक्षा मंत्री बना दिया था। संसद में जिस दिन रक्षा मंत्रालय से संबंधित सवाल पूछे जाने होते, समूचा विपक्ष जार्ज का बहिष्कार करते हुए संसद से बाहर चला जाता। विपक्ष खुलेआम उन्हें रक्षा मंत्री मानने से इनकार कर रहा था।
संसद के शीतकालीन सत्र में यह रवायत जारी थी, इसी बीच 13 दिसंबर को संसद पर आतंकवादी हमला हो गया। भयभीत सांसद संसद के केंद्रीय कक्ष में डर और आशंका के साये में परेशान थे। इसी बीच वहां रक्षा मंत्री जार्ज फर्नांडिस पहुंचे। तब तक हमलावर आतंकी मार गिराए गए थे और संसद भवन पर सेना की टुकड़ियों ने मोर्चा संभाल लिया था। केंद्रीय कक्ष में पहुंचे जार्ज फर्नांडिस ने सांसदों को आश्वस्त किया था कि समूचे देश पर सरकार का नियंत्रण है। आतंकवादी मार दिए गए हैं। संसद भवन पर सेना पहरेदारी कर रही है। संसद परिसर में विमानभेदी तोपें तक तैनात कर दी गईं हैं, ताकि आसमान से भी खतरा न रहे।
जार्ज अभी यह बोल ही रहे थे कि उन्हें विपक्षी सांसदों ने घेर लिया। कोई उनसे हाथ मिलाने को लपक रहा था, तो कोई उन्हें अब तक का सबसे बेहतरीन रक्षा मंत्री बता रहा था। वही विपक्ष, जो कुछ देर पहले तक उन्हें रक्षा मंत्री मानने से इंकार कर रहा था, अब उन्हें देश का सबसे अच्छा रक्षा मंत्री बता रहा था। नए संसद भवन को लेकर भविष्य में विपक्षी दलों का भी रवैया कुछ वैसा ही होगा, ठीक साढ़े इक्कीस साल पहले वाले नजारे की तरह।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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