BJP Target: बिना सुकून जीत का जुनून
BJP Target: नरेन्द्र मोदी और अमित शाह की जोड़ी राजनीति में ऐसी जोड़ी है जो बड़ी से बड़ी जीत से संतुष्ट नहीं होती, बल्कि उस जीत के बाद और बड़ी जीत को हासिल करने में लग जाती है।
2001 में जब नरेन्द्र मोदी को मुख्यमंत्री बनाकर संघ/भाजपा ने गुजरात की कमान सौंपी थी तब उनको भी ये अनुमान नहीं था कि एक दिन यही मोदी न केवल गुजरात की कलह को खत्म कर पार्टी को अजेय बना देंगे बल्कि भाजपा को उसके इतिहास की अनवरत बड़ी से बड़ी जीत दिलाते जाएंगे।

गुजरात में मोदी और अमित शाह की जोड़ी ने जो जीत दर जीत हासिल की, वही क्रम उन्होंने केन्द्र में भी दोहरा दिया। 2014 से बड़ी जीत 2019 में मिली और अब 2023 में वो पिछली जीत से भी बड़ी जीत हासिल करना चाहते हैं।
वो जीत चाहते हैं और उन्हें जीत मिल जाती है, ऐसा होता नहीं है। जीत और सीट का जो लक्ष्य निर्धारित करते हैं उसके लिए जीतोड़ मेहनत करते हैं, साम-दाम-दंड-भेद वाली नीति चतुष्टय का इस्तेमाल करते हैं। अंतत: असंभव से दिखनेवाले उनके लक्ष्य संभव सी जीत में बदल जाते हैं। बीते दस सालों के दौरान विधानसभा चुनावों में भी तीन चार मौके ही ऐसे आये हैं जब उनका गणित गड़बड़ाया हो। वरना वो जो तय करते हैं, उसे हासिल करते हैं। हासिल करते ही अगले लक्ष्य निर्धारित करके उसे पाने में जुट जाते हैं।
यही कारण है कि जब अमित शाह ने 2013 में पार्टी की चुनावी कमान संभाली तो पूर्ण बहुमत का संदेश पार्टी कार्यकर्ताओं को दिया। उस समय वो बतौर चुनाव कोआर्डिनेटर ही काम कर रहे थे लेकिन उनकी हैसियत पार्टी अध्यक्ष से कम न थी। जब अमित शाह पार्टी कार्यकर्ताओं और नेताओं को यह टार्गेट दे रहे थे तब पार्टी में ही किसी को भरोसा नहीं था कि भाजपा को अकेले दम पर पूर्ण बहुमत मिल जाएगा। उस समय तक मोदी 'सबसे पॉपुलर' लीडर भले बन चुके थे फिर भी 282 सीटें अपने अकेले के बूते जीतना इतना आसान तो नहीं था?
पार्टी में नेता दाहिने बायें से यही कहते रहे कि पूर्ण बहुमत का लक्ष्य है तो सबसे ज्यादा सीटें तो ही आ ही जाएंगी। लेकिन दूसरी ओर मोदी शाह की जोड़ी ने स्वतंत्र रूप से इतना तगड़ा कैम्पेन चलाया कि जनता पर जादू चल गया। सोशल मीडिया हो या मीडिया, सब पर मोदी छा गये। चुनाव के 4 महीने पहले से उनकी रैलियां शुरु हो गयीं। वो लोग जानते थे कि दिल्ली का रास्ता यूपी से होकर ही जाता है इसलिए सबसे अधिक फोकस यूपी पर ही किया। खुद मोदी बनारस से प्रत्याशी बनकर पहुंच गये और परिणाम आया तो विपक्ष से अधिक पार्टी के नेता चौंक गये। पूर्ण बहुमत मिल चुका था।
आमतौर पर जो दल सत्ता में रहता है तो दूसरी बार या तो वह हारता है या फिर उसकी सीटें कम होती हैं। इसे राजनीतिक लोग एन्टी इन्कम्बैंसी कहते हैं। लेकिन 2019 में मोदी शाह की जोड़ी ने 2014 से बड़ी जीत हासिल करते हुए 303 सीटें जीत ली। यह 2014 के 282 से 21 सीट अधिक थी। अब 2023 में वो दोनों 370 सीट जीतने का लक्ष्य घोषित कर चुके हैं। तो क्या यह सिर्फ उनके कार्यकर्ताओं में जोश भरने के लिए तैयार किया गया आंकड़ा है या सचमुच तीसरी बार उनकी सबसे बड़ी जीत होने जा रही है?
अब तक का इस जोड़ी की जीत का ट्रैक रिकार्ड देखें यह सिर्फ कश्मीर से धारा 370 को खत्म करने का सांकेतिक लक्ष्य नहीं है। जब उन्होंने ऐसा कहा है तब उनके पास निश्चित रूप से पूरा खाका तैयार होगा। वो दोनों जानते हैं कि 37.36 प्रतिशत वोट और 303 सीट जीत लेने के बाद इसके आगे एक एक सीट पर बढ़ने के लिए जीती हुई सीटों के साथ हारी हुई सीटों पर फोकस करना होगा। वो ऐसा ही कर रहे हैं।
लेकिन सिर्फ रणनीति बना लेने से चुनाव नहीं जीते जाते। चुनाव जीतने के लिए कैडर या पार्टी वर्करों का आक्रामक होकर मैदान में उतरना जरुरी होता है। कैडर या पार्टी वर्कर को आक्रामक बनाने के लिए उनके मन में संतोष नहीं बल्कि असंतोष की आग जलानी होती है। उनके सामने नया लक्ष्य रखना होता है ताकि वो जो हासिल हुआ है उस पर संतोष करने के बजाय नये लक्ष्य को पाने में लग जाएं।
इसलिए रविवार को दिल्ली में बीजेपी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी में खुद नरेन्द्र मोदी ने ही कार्यकर्ताओं और नेताओं के सामने कई नये नये लक्ष्य रख दिये। जैसे, अगले कार्यकाल में भारत को दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनाना है और 2047 तक भारत को विकसित राष्ट्र बनाना है। मोदी जानते हैं कि आरएसएस पृष्ठभूमि के बीजेपी वर्करों के लिए राष्ट्र सबसे पहले होता है। इसलिए राष्ट्र के उत्थान, राष्ट्र के विकास से जुड़ी बातें जितना उनके मन को प्रभावित करेंगी, उतना दूसरा कुछ नहीं।
वैसे भी सत्ता का सफल राजनीतिज्ञ वो होता है जो चुनाव में अपनी उपलब्धियां गिनाने की बजाय नये-नये सपनों को बेचना जानता हो। उपलब्धियां मन में संतोष पैदा करती हैं जबकि सपनों को हासिल करने के लिए सक्रिय होकर काम करना पड़ता है। बीजेपी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी में मोदी ने पार्टी के नेताओं और कार्यकर्ताओं को वही सपना दिखा दिया है।
उन्हें बताया गया है कि जीत का जुनून हो तभी जीत संभव होती है और जब तक ऐसा न हो जाए तब तक शुकून और शांति से नहीं बैठ सकते। ऐसा नहीं है कि खुद मोदी शाह की जोड़ी भी सपने बेचकर शांत भाव में घर बैठ जाते हैं। मोदी भले ही 73 साल के हो गये हों, दो बार प्रधानमंत्री रह चुके हों लेकिन चुनाव के लिए या चुनाव के दौरान वो ऐसी बहुत सी बातें बोलते हैं जो सुनने में भले असहज लगती हों लेकिन वह उनके बूथ स्तर तक के कार्यकर्ताओं और कम पढे लिखे वोटरों को प्रभावित करती है।
शायद यही कारण है कि उत्तर भारत में सामान्य वोटरों के बीच 'अबकी बार' से 'मोदी की गारंटी' तक उनका क्रेज बना हुआ है। वैसे भी मोदी का राजनीतिक उभार ऐसे समय में हुआ था जब राजनीतिक नेताओं की विश्वसनीयता बहुत गिर गयी थी। 'हर नेता चोर होता है' जैसे जुमले आम हो गये थे। उस समय में मोदी ने जनता के बीच जो विश्वसनीयता अर्जित की है यह उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि है। फिलहाल वो राजनीति में उस जगह खड़े हैं जहां उनके द्वारा किया जानेवाला हर काम 'सही' होता है। इसलिए पार्टी के भीतर और बाहर भी उनके द्वारा किये गये हर निर्णय को सही ठहराने का काम मीडिया और सोशल मीडिया का बड़ा वर्ग कर ही रहा है।
फिर भी 370 का आंकड़ा पाना इतना भी आसान नहीं है। विपक्षी दल बिखरे हुए जरूर हैं लेकिन बीजेपी का सारा जोर उत्तर भारत में ही है। 370 का आंकड़ा पाने के लिए उसे केरल, तमिलनाडु जैसे राज्यों में संभावना पैदा करनी होगी। आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, कर्नाटक में मोदी लहर चलानी होगी। फिर राजस्थान, मध्य प्रदेश, हिमाचल प्रदेश जैसे राज्यों में पार्टी के भीतर की उथल पुथल भी संभालनी होगी।
लेकिन भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी में मोदी ने जो जोश अपने नेताओं और कार्यकर्ताओं में भरा है उसे देखकर लगता है कि वो 370 के अपने लक्ष्य को लेकर गंभीर हैं। लक्ष्य हासिल होता है या पिछली बार की जीत से बीजेपी नीचे चली जाती है, यह समय बतायेगा। लेकिन इतना तो तय है कि मोदी शाह की जोड़ी इस चुनाव में विपक्ष विहीन लोकसभा का सपना संजोये हुए है।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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