BJP State Leaders: मोदी को संघ की बात माननी चाहिए

भारतीय जनता पार्टी अपने क्षत्रपों को खत्म करके इंदिरा गांधी की रणनीति पर चल निकली है। इंदिरा गांधी ने 1967 से 1975 के बीच कांग्रेस के सभी क्षत्रपों को ठिकाने लगा दिया था। इसलिए जब 1975 में उन्होंने आपातकाल लगाया, तो बहुत सारे कांग्रेसी इंदिरा गांधी का साथ छोड़ गए थे। अपने करिश्मे से 1980 में इंदिरा गांधी सत्ता में वापस लौट आई थी, लेकिन उनके बाद कांग्रेस कमजोर होती गई। 1984 में इंदिरा गांधी की हत्या और 1991 में राजीव गांधी की हत्या के कारण कांग्रेस जीती, लेकिन उसके बाद क्या।

कोई भी संगठन जिसमें जन भागीदारी हो, वह तानाशाही से ज्यादा देर नहीं चलता। लोकतंत्र में हर स्तर पर योग्य नेता जरूरी होता है, तभी राजनीतिक दल की जड़ें मजबूत होती है। भारतीय जनता पार्टी वही गलती कर रही है, जो इंदिरा गांधी और कांग्रेस ने की थी।

BJP State Leaders: Modi should listen to Sangh

2015 से भाजपा के क्षत्रपों का कद घटना शुरू हुआ था। 2015 में दिल्ली, 2018 में मध्यप्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ और कर्नाटक में चुनाव हारी, 2022 में हिमाचल और 2023 में कर्नाटक हारी। इस बीच सिर्फ उत्तरप्रदेश में भाजपा को स्पष्ट बहुमत मिला। केंद्र सरकार की नाक के नीचे राजधानी दिल्ली में तो भाजपा को लगातार दो बार विधानसभा चुनावों में शर्मनाक हार का सामना करना पड़ा। रही सही कसर नगर निगम चुनावों में हार ने पूरी कर दी।

हिमाचल प्रदेश और कर्नाटक की हार के बाद संघ परिवार से जुड़े ओर्गनाईजर ने दोटूक शब्दों में लिखा कि हिंदुत्व और मोदी करिश्मा चुनाव जीतने के लिए काफी नहीं है। चुनाव जीतने की असली कुंजी क्षत्रपों के हाथ में है। हिमाचल प्रदेश और कर्नाटक में मोदी ने चुनाव डबल ईंजन के नारे के बावजूद सिर्फ अपने नेतृत्व में खुद लड़ा, सारा प्रचारतन्त्र उन्हीं के इर्दगिर्द था। ओर्गनाईजर ने कर्नाटक की हार के बाद लिखा कि क्षेत्रीय स्तर पर नेतृत्व और लोगों की आकांक्षाएं पूरी किए बिना चुनाव नहीं जीता जा सकता। उसने आगे लिखा कि यही सही वक्त है कि स्थिति की नाजुकता को समझ लिया जाए।

BJP State Leaders: Modi should listen to Sangh

आरएसएस का नेतृत्व भी भाजपा के शीर्ष नेतृत्व को यही सलाह दे रहा होगा। लेकिन क्या भाजपा नेतृत्व यानी नरेंद्र मोदी और अमित शाह दीवार पर लिखी इबारत को पढ़ रहे हैं। मध्यप्रदेश के टिकट बंटवारे में जो कुछ हुआ है, वह कर्नाटक का ही दोहराव लगता है। मध्यप्रदेश में शिवराज सिंह चौहान और राजस्थान में वसुंधरा राजे की उसी तरह उपेक्षा के संकेत मिल रहे हैं, जैसे कर्नाटक में येदीयुरप्पा की उपेक्षा हुई थी। बाद में येदीयुरप्पा की मान मनोव्वल हुई, लेकिन बहुत देर हो चुकी थी।

मध्यप्रदेश में तीन केन्द्रीय मंत्रियों, चार अन्य सांसदों और चुनावी राजनीति से अलग हो चुके पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव कैलाश विजयवर्गीय को चुनाव मैदान में उतार कर साफ़ संकेत दिए गए हैं कि भाजपा जीती तो शिवराज सिंह चौहान मुख्यमंत्री नहीं होंगे। मुख्यमंत्री केवल मोदी और अमित शाह की पसंद का होगा या जो अपने क्षेत्र से ज्यादा विधायक जीता कर लाएगा, वही मुख्यमंत्री होगा।

मध्य प्रदेश में छह हेवीवेट नेताओं को चुनाव मैदान में उतारकर जहां एक ओर मोदी और अमित शाह ने यह मान लिया है कि मध्यप्रदेश में सिर्फ हिंदुत्व और मोदी के नाम पर चुनाव जीतना आसान नहीं, वहीं हेवीवेट को अलग अलग संभागों में उतार कर उनके आसपास की सीटों को मजबूत करने की चुनावी रणनीति का संकेत भी दिया है। निश्चित ही भाजपा की इस रणनीति ने कांग्रेस को मुश्किल में लाकर खड़ा कर दिया है, जो यह समझ कर बैठी थी कि मध्यप्रदेश उसका सबसे आसान स्टेट है। अगर यह फार्मूला कामयाब हो गया, तो इसे भाजपा का हार को जीत में बदलने का करिश्माई फार्मूला भी कहा जा सकता है।

संकेत साफ़ हैं कि जो फार्मूला मध्यप्रदेश में अपनाया गया है, वही फार्मूला राजस्थान में भी अपनाया जाएगा। इस फार्मूले में 15-20 विधायकों के टिकट कटेंगे, तो बड़े पैमाने पर बगावत भी होगी। इसलिए टिकटों का एलान करने से पहले 27 सितंबर को अमित शाह, जेपी नड्डा, बीएल संतोष और अरुण सिंह ने दो दिन सभी बड़े नेताओं वसुंधरा राजे, राजेन्द्र राठौड़, सीपी जोशी और सतीश पूनिया से बंद कमरे में बात की, इससे पहले दोनों ने वसुंधरा राजे से अकेले में बात की। इन दो दौर की बातचीत के बाद फिर बड़े ग्रुप में बात की गई, जिसमें केन्द्रीय प्रभारियों के साथ लगभग 30 नेता थे।

वसुंधरा राजे आज भी राजस्थान में सबसे मजबूत नेता हैं, लेकिन उन्हें न मोदी पसंद करते हैं, न राजस्थान का संघ नेतृत्व। इसलिए पिछले छह-सात साल से उनका विकल्प ढूँढने की कोशिश हो रही है। अमित शाह और जेपी नड्डा ने 28 सितंबर को संघ के नेताओं से भी सलाह ली। वसुंधरा विरोधी होने के बावजूद संघ भी अब यह मानता है कि हिंदुत्व और मोदी चुनाव जीतने की कुंजी नहीं रह गए है।

क्षेत्रीय नेतृत्व को तवज्जो दिए बिना और जन आकांक्षाओं की पूर्ति के बिना चुनाव नहीं जीता जा सकता। लेकिन भाजपा नेतृत्व इस बार भी वही गलती कर रहा है, जो उसने पिछले विधानसभा चुनाव में की थी। पिछले विधानसभा चुनावों में वसुंधरा राजे को मुख्यमंत्री होने के बावजूद मुख्यमंत्री प्रोजेक्ट नहीं किया गया, अलबत्ता भाजपा के कार्यकर्ताओं से नारे लगवाए गए कि मोदी तुझ से बैर नहीं, वसुंधरा तेरी खैर नहीं। चुनाव मोदी के चेहरे पर लड़ा गया। अंतिम चुनाव सर्वेक्षण में जब भाजपा 20-25 सीटों पर निपटती दिखी तो वसुंधरा को आगे किया गया, तब सिर्फ एक हफ्ता बचा था, इसके बावजूद भाजपा 70 पार हो गई।

इस बार फिर वही हो रहा है 25 सितंबर की रैली में मोदी ने खुद को ही प्रोजेक्ट किया। अपने भाषण में वसुंधरा राजे का जिक्र भी नहीं किया, और उनके कार्यकाल में भाजपा सरकार की ओर से किए गए किसी काम को नहीं गिनाया। जबसे राहुल गांधी ने चुनावों में वोटरों को चार-पांच गारंटियां देना शुरू किया है, तब से मोदी भी डबल ईंजन को छोड़कर कह रहे हैं, मोदी मतलब गारंटी।

मोदी-अमित शाह ने पिछले पांच सालों में वसुंधरा के विकल्प के रूप में कई नेताओं को उभारने की कोशिश की, इससे हुआ यह कि कई छुटके और मझौले नेताओं में भी मुख्यमंत्री बनने की ललक पैदा हो गई। लेकिन कोई भी अपने सीमित क्षेत्र से आगे नहीं बढ़ सका। अभी कुछ ही साल पहले राजनीति में आए गजेन्द्र सिंह शेखावत, अर्जुन राम मेघवाल मुख्यमंत्री बनने का सपना ले रहे हैं। राजेन्द्र राठौड़ वरिष्ठता के नाते दावेदार है, ओम बिड़ला स्पीकर बनने से पहले राजस्थान के मामूली नेता थे, लेकिन अमित शाह से नजदीकी के कारण वह स्पीकर बन गए और अब मुख्यमंत्री बनने का ख़्वाब देखते हैं। लोकसभा स्पीकर विधानसभा चुनाव लड़ेगा, तो कैसा लगेगा।

इनके अलावा केन्द्रीय मंत्री कैलाश चौधरी और सांसदों स्वामी सुमेधानंद, राज्यवर्धन सिंह राठौड़, दीया कुमारी, किरोड़ी लाल मीना और सुखबीर जौनपुरिया को भी चुनाव में उतारा जा सकता है। इन सभी ने लोकसभा चुनाव तो मोदी के नाम पर जीत लिया था, लेकिन विधानसभा चुनाव में इनके सामने अपनी लोकप्रियता दिखाने की चुनौती होगी।

लोकसभा चुनाव पार्टी और नेता के नाम पर जीतना आसान होता है, विधानसभा का चुनाव जीतना इतना आसान नहीं होता। वैसे भाजपा सांसदों को लोकसभा चुनाव में उतारने की रणनीति कोई पहली बार नहीं अपना रही। त्रिपुरा में जब चुनाव जीतना मुश्किल लग रहा था, तो भाजपा ने त्रिपुरा की अपनी सांसद प्रतिमा भौमिक को चुनाव में उतारा था। वह जीती भी, लेकिन उन्हें मुख्यमंत्री नहीं बनाया, तो मोदी उसे वापस लोकसभा में ले आए।

हिमाचल प्रदेश और कर्नाटक के चुनाव नतीजों का संदेश यह है कि मोदी का डबल ईंजन का नारा पिट चुका है। अगर राजस्थान, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में मोदी का यह हेवीवेट उम्मीदवारों वाला फार्मूला भी कामयाब नहीं हुआ, तो भाजपा को संघ और ओर्गनाईजर की सलाह माननी पड़ेगी कि वह अपने क्षत्रपों को ज्यादा तवज्जो देकर उन्हें दुबारा से उभारे, नहीं तो 2024 भी आसान नहीं होगा।

राजनीति कई बार सबक सिखाती है, कांग्रेस का नया इंडी एलायंस क्षत्रपों को नेतृत्व सौंपने की रणनीति पर ही आधारित है। इंदिरा गांधी की मौत से करीब 39 साल बाद कांग्रेस ने यह कबूल कर लिया है कि लोकतंत्र में कोई भी राजनीतिक दल या गठबंधन क्षत्रपों और साझा नेतृत्व के बिना ज्यादा देर ज़िंदा नहीं रह सकता। लेकिन भाजपा नेतृत्व अभी अपने ही क्षत्रपों को निपटाने में लगा हुआ है।

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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