इंडिया गेट से: 2024 में भाजपा का मिशन 400
अमित शाह ने भारतीय जनता पार्टी की कमान फिर से संभाल ली है। ऐसा नहीं है कि जेपी नड्डा को हटा कर फिर से अध्यक्ष बन गए हैं। पार्टी का संगठन अपनी जगह पर चलता रहेगा, लेकिन लोकसभा चुनावों की दृष्टि से मोर्चेबंदी की कमान अमित शाह ने अपने हाथ में ले ली है। लोकसभा चुनावों में अभी 19 महीने पड़े हैं। अगर विपक्ष की गतिविधियाँ अभी शुरू न होती, तो भाजपा की चुनावी तैयारियां भी शुरु न होतीं।

बिहार में बने नए राजनीतिक समीकरणों के कारण भाजपा को प्रदेश की सत्ता से बाहर होना पड़ा। यह भाजपा के लिए इस लिहाज से बड़ा झटका था कि पिछले तीन साल में जहां भाजपा ने महाराष्ट्र, कर्नाटक और मध्य प्रदेश की हारी बाज़ी को जीत में बदला, वहीं बिहार में जीती बाज़ी हार गई। सत्ता परिवर्तन और उसके बाद नीतीश कुमार की ओर से मोदी को सत्ता से बाहर करने की चुनौती ने भाजपा को समय से पहले मोर्चाबन्दी करने के लिए मजबूर किया।
बिहार के घटनाक्रम ने गैर भाजपा दलों में भी नया जोश भर दिया है। विपक्ष की राजनीति में हालांकि नेतृत्व की तस्वीर साफ़ नहीं है, लेकिन नीतीश कुमार विपक्ष के पहले नेता हैं जिन्होंने नरेंद्र मोदी को 2024 में निपट लेने की धमकी दी है। इसलिए नीतीश कुमार विपक्ष की राजनीति के केंद्र बिन्दु बन गए हैं। नीतीश कुमार ने मोदी को चुनौती तो दे दी है लेकिन भानुमती के कुनबे को इकठ्ठा करना उनके खुद के लिए चुनौती बन गई है।
नीतीश कुमार की रणनीति भी अब साफ़ नजर आने लगी है। वह राजनीति में नैतिकता को दरकिनार कर उन सभी को एकजुट कर रहे हैं, जो हाल के वर्षों में या तो भ्रष्टाचार के आरोपों में सजायाफ्ता हुए हैं या जिन पर सीबीआई और ईडी की जांच चल रही है। उनकी शुरुआत चारा घोटाले के पांच मामलों में सजायाफ्ता लालू यादव के साथ गठजोड़ से हुई है। उनकी दूसरी मुलाक़ात तेलंगाना के मुख्यमंत्री केसीआर से हुई, जिनकी सरकार पर भाजपा ने हाल ही में पारिवारिक भ्रष्टाचार के आरोप लगाए हैं। दिल्ली प्रदेश भाजपा के नेताओं ने केसीआर की बेटी पर आरोप लगाया है कि दिल्ली के शराब घोटाले में वह भी शामिल थीं। नीतीश कुमार की तीसरी मुलाक़ात ओम प्रकाश चौटाला से हुई है।
चौटाला को अभी तीन महीने पहले ही आमदनी से ज्यादा सम्पत्ति के आरोप में चार साल कैद की सजा हुई है। उनकी चार सम्पत्तियां जब्त भी की गई हैं। इससे पहले वह शिक्षकों की भर्ती घोटाले के आरोप में 10 साल जेल की सजा काट चुके हैं।
तेलंगाना के मुख्यमंत्री केसीआर, बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और दिल्ली के मुख्यमंत्री केजरीवाल पर सीबीआई का शिकंजा कसता जा रहा है। ये तीनों मुख्यमंत्री कांग्रेस के नेतृत्व में विपक्षी एकता नहीं चाहते। वे राहुल गांधी को भी विपक्ष का नेता मानने को तैयार नहीं हैं। इनमें सबसे ज्यादा अडियल केजरीवाल और केसीआर हैं क्योंकि दोनों की पार्टियों का विस्तार कांग्रेस की कीमत पर हुआ है। आम आदमी पार्टी तो दिल्ली और पंजाब दोनों राज्यों में कांग्रेस को हरा कर सत्ता में आई है।
इन सब राजनीतिक चालों के बीच सीबीआई और ईडी ने परिस्थियां धीरे-धीरे बदल दी हैं। ऐसा लगता है कि नीतीश कुमार केंद्र बिन्दु बन सकते हैं। नीतीश कुमार ने दिल्ली आकर केजरीवाल से भी मुलाक़ात की, जिनकी सरकार शराब और स्कूल के कमरों के निर्माण में हुए भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरी हुई है। केजरीवाल और नीतीश की मुलाक़ात में फोटो सेशन के सिवा कोई गंभीर बात नहीं हुई। दोनों ने केंद्र सरकार की ओर से सीबीआई और ईडी के इस्तेमाल के खिलाफ एकजुटता दिखाने का संकल्प जरुर लिया, लेकिन केजरीवाल नेशनल हेराल्ड की हेराफेरी के मामले में कांग्रेस के पक्ष में बयान देने को तैयार नहीं हुए।
केजरीवाल गुजरात और हिमाचल प्रदेश के चुनाव नतीजों का इन्तजार करने के बाद ही अपनी रणनीति बताएंगे। इन दोनों राज्यों में उन्हें कांग्रेस का वोट बैंक हथियाने की उम्मीद है। पिछले लोकसभा चुनाव से पहले केजरीवाल और ममता विपक्षी एकता के प्रयासों में शामिल थे। दोनों ने 2018 की कोलकाता रैली और 2019 की बेंगलुरु रैली में एकता का प्रदर्शन किया था। नीतीश कुमार उन सभी से मिल रहे हैं, जो पिछले लोकसभा चुनावों से पहले हुई इन दोनों रैलियों में शामिल थे। अपने दिल्ली दौरे के दौरान उन्होंने राहुल गांधी, सीताराम येचुरी और डी राजा से मुलाक़ात की। वो कुमारस्वामी से भी मुलाक़ात कर चुके हैं।
अगर पांच मुख्यमंत्री ममता, केजरीवाल, केसीआर, नीतीश कुमार, स्टालिन एकजुट हो जाते हैं और राहुल, उद्धव, लालू, मुलायम, चौटाला और वामपंथी भी इनके साथ आ जाते हैं, तो भाजपा को फायदा ही होगा, क्योंकि दो विचारधाराओं का ध्रुवीकरण होगा। नीतीश कुमार ने खुद आज़ादी के आन्दोलन और गांधी हत्या का जिक्र करके आरएसएस और भाजपा पर हमला बोला है। विपक्ष के ये बयान ध्रुवीकरण को बढावा देने में मददगार साबित होंगे। भाजपा से नाराज चल रहा हिन्दू वोटर फिर से उसके साथ मजबूती के साथ खड़ा हो जाएगा। तटस्थ वोटर भी भाजपा के साथ जुड़ेगा क्योंकि नरेंद्र मोदी भ्रष्टाचार और परिवारवाद बनाम ईमानदार सरकार का मुकाबला बना देंगे।
विपक्ष की रणनीति के मुकाबले भाजपा ने 19 महीने पहले ही अपनी रणनीति बनाना शुरू कर दिया है। महाराष्ट्र के निकाय चुनावों में शिंदे गुट के साथ मिलकर चुनाव लड़ने का फैसला महाराष्ट्र की राजनीति के हिसाब से बड़ी घटना है। महाराष्ट्र के निकाय चुनाव विधानसभा से भी ज्यादा महत्व रखते हैं। अमित शाह ने देवेन्द्र फडनवीस के घर पर हुई बैठक में इस रणनीति को हरी झंडी देकर लोकसभा चुनाव से पहले ही उद्धव ठाकरे की राजनीति को खत्म करने की रणनीति बनाई है।
भाजपा में इस समय अगले लोकसभा चुनाव के लिए एक एक प्रदेश की परिस्थितियों के अनुसार अलग अलग रणनीति बनाई जा रही है। अमित शाह और जेपी नड्डा ने जून में केंद्र सरकार के मंत्रियों को राज्यों की परिस्थितियों का जायजा लेने की जिम्मेदारी दी थी। छह सितंबर को भाजपा कार्यालय में उन सब मंत्रियों को बुला कर अमित शाह और नड्डा ने रिपोर्ट तलब की है।
सभी आंकलन और आंतरिक रिपोर्ट के बाद जहां विपक्ष भाजपा को 250 से नीचे देखना चाहता है, वहीं भाजपा 400 का टार्गेट बना कर चल रही है। पहले जीती हुई सीटों के अलावा इस बार भाजपा के निशाने पर वो सीटें हैं जहां वह 2019 के चुनाव में दूसरे नंबर पर रही थी।
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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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