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Assembly Elections 2022: किसकी नाक का सवाल बन गए हैं गुजरात और हिमाचल चुनाव?

Importance of Himachal elections and Gujarat elections 2022

Assembly Elections 2022: हिमाचल प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस फिर से आमने सामने की लड़ाई में है। कांग्रेस ने दिल्ली से सबक सीखा है। केजरीवाल जब पहली बार कांग्रेस को हरा कर दिल्ली में चुनाव जीते थे, तब राहुल गांधी ने कांग्रेस की एक बंद कमरे की मीटिंग में कहा था कि कांग्रेस कार्यकर्ताओं को केजरीवाल से सीखना चाहिए कि चुनाव कैसे लड़ना होता है।

Importance of Himachal elections and Gujarat elections 2022

वह केजरीवाल से इतना प्रभावित थे कि उन्होंने कांग्रेस के समर्थन से दिल्ली में उनकी पहली सरकार बनवा दी थी। फिर कुछ दिन तक कांग्रेस और भाजपा में आम आदमी पार्टी को एक दूसरे की बी टीम कहने की होड़ मची। आखिर भाजपा और कांग्रेस दोनों को समझ आ गया कि आम आदमी पार्टी दोनों का वोट बैंक खा रही है। पंजाब में उसने कांग्रेस, भाजपा के साथ साथ क्षेत्रीय पार्टी अकाली दल का वोट बैंक भी निगल लिया।

हिमाचल प्रदेश में पिछले कई चुनावों में किसी राजनीतिक दल की दुबारा सरकार नहीं बनी। एक बार भाजपा और एक बार कांग्रेस की सरकार ही बनती आई है। जैसे पंजाब में भी 1967 से बाद एक बार अकाली दल और एक बार कांग्रेस जीत रही थी। पहली बार 2007 के बाद 2012 में भी अकाली दल दूसरी बार सत्ता में आ गया था। हालांकि हिमाचल में भारतीय जनता पार्टी कांग्रेस का विकल्प बन गई थी, परंतु पड़ोसी राज्यों हरियाणा और पंजाब में भाजपा कांग्रेस का विकल्प नहीं बन पाई। हरियाणा में वह देवीलाल के लोकदल की जूनियर पार्टनर बनी रही और पंजाब में अकाली दल की जूनियर पार्टनर बनी रही।

2014 से हरियाणा की राजनीति में बदलाव आया, जब देवी लाल के बेटे और पूर्व मुख्यमंत्री ओम प्रकाश चौटाला भ्रष्टाचार के आरोप में जेल चले गए, और उधर राष्ट्रीय राजनीति में मोदी का उदय हुआ, तो हरियाणा में कमल का फूल खिला, और ऐसा खिला कि 2019 में भाजपा ने सत्ता में वापसी भी कर ली।

हिमाचल में भी अब पहली बार लग रहा है कि भाजपा सरकार की वापसी हो रही है। अगर ऐसा होता है तो इसकी वजह आम आदमी पार्टी होगी, क्योंकि वह 68 में से 67 सीटों पर चुनाव लड़ रही है। आम आदमी पार्टी राष्ट्रीय स्तर पर मोदी के विपक्ष के रूप में उभरने की कोशिश कर रही है, इसलिए वह हर राज्य में मोदी विरोधी वोटरों को अपनी तरफ आकर्षित करती है।

हिमाचल प्रदेश और गुजरात दोनों ही राज्यों में वह मोदी विरोधी वोटरों को अपनी तरफ आकर्षित कर रही है। इसका सीधा नुकसान मोदी विरोधी प्रमुख राजनीतिक दल कांग्रेस को होगा, और मोदी विरोधी वोट बंटने से सीधा फायदा भाजपा को होगा। जिससे दोनों ही राज्यों में भाजपा की सीटें बढ़ सकती हैं।

कांग्रेस इस बात को बखूबी समझती है, इसलिए कांग्रेस ने राहुल गांधी की दस साल पहले कही गई बात को याद करके केजरीवाल के तरीके से चुनाव लड़ने का फैसला किया है। ️

शनिवार को जारी अपने चुनाव घोषणापत्र में कांग्रेस ने केजरीवाल की तरह रेवड़ियां बांटने का एलान किया है। उसने युवाओं, बेरोजगारों, रिटायर्ड बुजुर्गों, महिलाओं, पशुपालकों के अलावा शिक्षा और स्वास्थ्य का स्तर सुधारने के दस लोकलुभावन वायदे किए हैं। कांग्रेस ने वादा किया है कि वह सत्ता में आई तो 5 लाख युवाओं को रोजगार का अवसर देगी, स्टार्टअप के लिए युवाओं को 680 करोड़ रूपए, महिलाओं को 1500 रुपये महीना मुआवजा, पुरानी पेंशन योजना बहाल की जाएगी, हर घर को 300 यूनिट मुफ्त बिजली, हर विधानसभा क्षेत्र में चार अंग्रेजी माध्यम के स्कूल, हर गाँव में मोबाईल क्लिनिक से मुफ्त ईलाज, किसानों से रोजाना 10 लीटर दूध और 2 रूपए किलो के हिसाब से गाय का गोबर खरीदेगी।

इसके अलावा मजेदार वायदा यह भी है कि किसान खुद अपनी फसल की कीमत तय करेंगे। केजरीवाल स्टाईल इन घोषणाओं का वोटरों पर असर हो सकता है, लेकिन कांग्रेस के सामने मुश्किल यह है कि वीरभद्र सिंह के देहांत के बाद प्रदेश में कांग्रेस के सारे नेता राजनीतिक तौर पर बौने हैं।

कांग्रेस ने वीरभद्र सिंह की पत्नी प्रतिभा सिंह को प्रदेश अध्यक्ष बना कर इसका सबूत खुद दे दिया, क्योंकि दो बार सांसद रहने के बावजूद उनकी छवि चुप रहने वाली रानी की ही बनी हुई है। सब जानते हैं कि वह वीरभद्र सिंह का विकल्प नहीं हो सकतीं, इसलिए कांग्रेस के चार पांच मझौले नेता खुद ब खुद मुख्यमंत्री पद के दावेदार हैं।

चुनाव से पहले कांग्रेस के कई बड़े बड़े नेता पार्टी छोड़कर भाजपा में शामिल हो गए, जिस कारण उसे एंटी-इन्केम्बेन्सी का जो लाभ मिलना चाहिए था, वह उससे वंचित हो गई। ऐसा नहीं है कि भाजपा में सब कुछ ठीकठाक है, भाजपा ने 11 विधायकों का टिकट काट दिया और दो मंत्रियों का निर्वाचन क्षेत्र बदल दिया।

इससे भाजपा में भी खलबली है, अनेक विधायक बागी हो कर मैदान में डट गए हैं। उनसे निपटने के लिए भाजपा को नाकों चने चबाने पड रहे हैं, क्योंकि भले ही वे खुद न जीतें, लेकिन भाजपा के नए उम्मीदवार को हराने में प्रमुख भूमिका निभा सकते हैं।

ऐसी कल्पना भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा ने भी नहीं की थी। चुनाव की कमान जेपी नड्डा खुद संभाले हुए हैं, क्योंकि अगर भाजपा उनके गृह राज्य में ही हार गई, तो उनकी राष्ट्रीय अध्यक्ष की कुर्सी ही खतरे में पड जाएगी। इसलिए जहां गुजरात जीतना नरेंद्र मोदी और अमित शाह की नाक का सवाल है, तो हिमाचल प्रदेश जीतना जेपी नड्डा की नाक का सवाल है।

कांग्रेस में हिमाचल में सत्ता पाना प्रियंका गांधी की नाक का सवाल है, क्योंकि उन्होंने वहां अपना आलीशान घर बनाया हुआ है। अगर वह अपने "गृह-राज्य" से कांग्रेस को नहीं जीता पाई, तो कांग्रेस की भविष्य की नेता बनने के उनके चांस भी खत्म हो जाएंगे। लेकिन प्रियंका गांधी एहतिहात के तौर पर यूपी की तरह खुद कमान नहीं संभाले हुई, परंतु पर्दे के पीछे से सब कुछ वही तय कर रही हैं।

सवाल यह है कि गुजरात और हिमाचल में आम आदमी पार्टी का क्या खेल है। आम आदमी पार्टी का खेल लोकसभा चुनाव से पहले खुद को राष्ट्रीय राजनीतिक दल के तौर पर मान्यता दिलाना है। राष्ट्रीय दल की मायता के लिए जो तीन शर्ते निर्धारित हैं, उनमें से एक शर्त यह भी है कि अगर किसी राजनीतिक दल को चार राज्यों में क्षेत्रीय दल की मान्यता मिल जाए तो वह राष्ट्रीय राजनीतिक दल की मान्यता पाने का हकदार हो जाएगा।

राज्य स्तरीय राजनीतिक दल की मान्यता हासिल करने के लिए जो पांच शर्तें निर्धारित हैं, उनमें से एक शर्त यह भी है कि अगर उसे विधानसभा चुनाव में 6 प्रतिशत वोट और 2 सीट मिल जाए अथवा 8 प्रतिशत वोट मिल जाएं, सीट भले न मिले, तो उसे राज्य स्तरीय राजनीतिक दल की मान्यता मिल जाएगी।

दिल्ली, पंजाब और गोवा में आप को राज्य स्तरीय राजनीतिक दल की मान्यता है, अगर गुजरात या हिमाचल प्रदेश में उसे 8 प्रतिशत वोट मिल जाते हैं, अथवा 6 प्रतिशत वोट मिल जाएं और 2 सीट जीत ले तो उसे राष्ट्रीय राजनीतिक दल की मान्यता मिल जाएगी।

राष्ट्रीय राजनीतिक दल की मान्यता हासिल करने के लिए अन्य शर्तें आम आदमी पार्टी पूरी नहीं करती। पहली शर्त है कि उसे तीन राज्यों से लोकसभा की सीटों का दो प्रतिशत यानि 11 सीटें हासिल हों। आम आदमी पार्टी की लोकसभा में एक भी सीट नहीं है।

दूसरी शर्त है कि या तो उसे लोकसभा या चार विधानसभाओं में छह प्रतिशत वोट और साथ में लोकसभा की कम से कम चार सीटें हासिल हों। आम आदमी पार्टी यह शर्त भी पूरी नहीं करती, इसलिए उसके पास एक ही विकल्प है कि वह चार राज्यों में 8 प्रतिशत वोट हासिल करे, अथवा 6 प्रतिशत वोट और कम से कम 2 सीटें जीते। इसलिए आम आदमी पार्टी गुजरात और हिमाचल प्रदेश का चुनाव इसी लक्ष्य की प्राप्ति के लिए लड़ रही है।

यह भी पढ़ें: Kejriwal in Gujarat Election: गुजरात में तिल तिल बढ रहा है केजरीवाल की लोकप्रियता का ग्राफ

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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