Delhi Assembly: दिल्ली में विधानसभा कब तक रहेगी?
अगर भाजपा की योजना के मुताबिक़ ही गोटियाँ फिट हुई, तो लोकसभा चुनाव से पहले दिल्ली विधानसभा को समाप्त कर दिया जाएगा और दिल्ली से राज्यसभा के तीन सांसदों का प्रावधान भी खत्म हो जाएगा|

Delhi Assembly: पंडित जवाहर लाल नेहरू के समय ही यह महसूस कर लिया गया था कि दिल्ली में विधानसभा की जरूरत नहीं है| इसलिए 1952 में बनी विधानसभा को चार साल बाद राज्य पुनर्गठन आयोग की सिफारिश पर 1956 में ही खत्म कर दिया गया था| दिल्ली के पहले मुख्यमंत्री चौधरी ब्रह्म प्रकाश का भी उस समय के प्रशासक के साथ ऐसा ही टकराव रहता था, जैसा केजरीवाल का उपराज्यपाल के साथ बना रहता है| दिल्ली विधानसभा को भंग करने के बाद दस साल तक केंद्र सरकार का प्रशासक दिल्ली की कमान संभालता रहा| दस साल बाद 1966 में मेट्रोपोलिटन काउंसिल का गठन किया गया, जिसमें 56 निर्वाचित और 5 मनोनीत सदस्य थे|

मेट्रोपोलिटन काउंसिल की भूमिका सिर्फ सलाहकार की थी, सारी शक्तियाँ केंद्र की ओर से नियुक्त प्रशासक के पास ही थीं| राजीव गांधी के प्रधानमंत्रित्व काल में राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र बनाकर दिल्ली को विकसित करने का आईडिया आया| उसके लिए एक आयोग का गठन किया गया| उस वक्त मुख्य उद्देश्य दिल्ली के कांग्रेस नेताओं को रेवड़ियां बांटने का था, इसलिए आयोग की सिफारिश में विधानसभा गठन का सुझाव दिया गया|
कांग्रेस 1991 में जब दुबारा सत्ता में आई तो आयोग की सिफारिश पर सीमित अधिकारों के साथ विधानसभा का गठन कर दिया गया, लेकिन दिल्ली का प्रशासक उपराज्यपाल को बनाया गया, जिसकी नियुक्ति राज्यपालों की तरह राष्ट्रपति ही करता है| 1993 में दिल्ली विधानसभा के पहले चुनाव हुए तो सत्ता भाजपा के हाथ में आ गईं| फिर 1998, 2003 और 2008 में लगातार तीन बार शीला दीक्षित के नेतृत्व में कांग्रेस जीती| केंद्र में उस दौरान छह साल भाजपा की सरकार थी और आए दिन कांग्रेसी मुख्यमंत्री शीला दीक्षित और भाजपाई पूर्व मुख्यमंत्री मदन लाल खुराना में खटपट होती रहती थी| दिल्ली मेट्रो का श्रेय लेने और उद्घाटन करने पर भी विवाद होते थे|
2013 से आम आदमी पार्टी जीत रही है, तो पिछले 9 साल से केंद्र की भाजपा सरकार और मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल के बीच टकराव बना हुआ है| केजरीवाल जब से दिल्ली के मुख्यमंत्री बने हैं, वह सीधे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर हमले कर रहे हैं| जबकि विभिन्न मुद्दों पर टकराव के बावजूद शीला दीक्षित ने कभी भी अटल बिहारी बाजपेयी पर सीधे हमले नहीं किए थे, उन्होंने राजनीतिक मर्यादा को बना कर रखा था|
आम आदमी पार्टी ने तीन बार दिल्ली विधानसभा का चुनाव जीतने के बाद दिल्ली नगर निगम को भी जीत लिया है| राष्ट्रीय पार्टी बनने और दिल्ली नगर निगम चुनाव जीतने के बाद अरविन्द केजरीवाल भाजपा और कांग्रेस दोनों के सामने चुनौती बन कर खड़े हो गए हैं| हर मुद्दे पर केंद्र सरकार और उप राज्यपाल के साथ उनका टकराव हो रहा है| हर मुद्दे पर हाईकोर्ट और सुप्रीमकोर्ट में केंद्र सरकार और उप राज्यपाल को केजरीवाल चुनौती दे रहे है|
दिल्ली के मेयर के चुनाव पर उपराज्यपाल के साथ टकराव भी सुप्रीमकोर्ट पहुंच गया| केजरीवाल चाहते हैं कि उप राज्यपाल उनकी चुनी हुई सरकार के हर फैसले पर मोहर लगाएं, हर फाईल पर साईन करें। हालांकि 1991 में दिल्ली विधानसभा गठन के समय संविधान में जोड़े गए अनुच्छेद 239एए और 239एबी में स्पष्ट है कि उप राज्यपाल ही दिल्ली का प्रशासक है, लेकिन वह कैबिनेट से पास और विधानसभा से पारित कानूनों के अनुसार काम करेंगे, इसके अलावा बाकी सब शक्तियां उन्हीं के पास हैं| दिल्ली पुलिस, क़ानून व्यवस्था और भूमि संबंधी मामले सीधे उपराज्यपाल के पास रहेंगे| इसके अलावा अगर केंद्र सरकार और दिल्ली सरकार एक ही विषय पर क़ानून बनाती है, तो केंद्र का क़ानून लागू होगा|
उप राज्यपाल और मुख्यमंत्रियों की शक्तियों पर 2018 में अपने फैसले में सुप्रीमकोर्ट ने बार बार संविधान के अनुच्छेद 239एए और अनुच्छेद 239एबी का जिक्र किया था और दोनों पक्षों को याद दिलाया था कि दिल्ली राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र है, न कि राज्य| हालांकि कोर्ट ने यह भी कहा कि उप राज्यपाल पूर्ण प्रशासक नहीं हैं, बल्कि सीमित अर्थ में प्रशासक हैं| सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि उपराज्यपाल को चुनी हुई सरकार के फ़ैसलों को स्वीकार करना चाहिए, रोकना नहीं चाहिए| लेकिन साथ ही कोर्ट ने एनार्की शब्द का इस्तेमाल करके केजरीवाल को भी एक तरह से चेताया था कि आए दिन का धरना-प्रदर्शन उन्हें शोभा नहीं देता|
सुप्रीमकोर्ट की सलाह का केजरीवाल पर कोई असर नहीं हुआ, उन्होंने टकराव का अपना तरीका चालू रखा और आए दिन उपराज्यपाल और केंद्र सरकार के खिलाफ धरना प्रदर्शन भी जारी रखे| दिल्ली महानगर परिषद में दस सदस्यों की नियुक्ति को लेकर भी विवाद खड़ा किया गया, जबकि महानगर परिषद के एकीकरण क़ानून में यह अधिकार उप राज्यपाल का है| महानगर परिषद विधानसभा का हिस्सा नहीं है, वह एक स्वतंत्र ईकाई है, लेकिन आम आदमी पार्टी उसे दिल्ली सरकार का हिस्सा मान कर चल रही है|
एमसीडी के हाल ही में हुए चुनावों से पहले दिल्ली में तीन नगर निगम थीं| चुनाव से पहले केंद्र सरकार ने नया क़ानून बनाकर तीनों को मिलाकर फिर से एक नगर निगम बना दी| यह एक सोची समझी रणनीति के तहत हुआ था, आए दिन कोर्टों और धरनों, प्रदर्शनों के झंझट से परेशान केंद्र सरकार ने दिल्ली को 1991 की स्थिति में वापस लाने का मन बना लिया है|
1991 में संविधान संशोधन करके दिल्ली को विधानसभा दे दी गई थी, लेकिन महानगर परिषद भी बनी रही| मुख्यमंत्री बन जाने के कारण चीफ मेट्रोपोलिटन काउंसलर का रूतबा खत्म हो गया| दुनिया के सभी देशों की राजधानियों में मेयर का रूतबा मुख्यमंत्री जैसा होता है, विदेशी मेहमानों का एयरपोर्ट पर वही स्वागत करता है| केंद्र सरकार अब दिल्ली के मेयर को वही रूतबा दिलाना चाहती है| इसी लिए तीनों नगर निगमों की जगह एक नगर निगम बनाई गई है।
भाजपा को उम्मीद थी कि जैसे आम आदमी पार्टी की सरकार होने के बावजूद भाजपा ने 2017 में तीनों नगर निगम जीत लीं थीं, उसी तरह वह इस बार भी एकीकृत नगर निगम जीत लेगी। बाद में दुबारा संविधान संशोधन करके विधानसभा को समाप्त कर दिया जाएगा, न रहेगा बांस, न बजेगी बांसुरी| लेकिन नगर निगम चुनाव के नतीजों ने केंद्र सरकार और भाजपा का खेल खराब कर दिया है|
चुनाव हारने के बाद भारतीय जनता पार्टी की बेचैनी ज्यादा बढ़ गई है| अपने फैसले को लागू करने के लिए भारतीय जनता पार्टी येन केन प्रकारेण दिल्ली महानगर परिषद के मेयर का पद हासिल करना चाहती है| ताकि दिल्ली पर केंद्र सरकार का नियन्त्रण हो सके| तीन बार रद्द होने के बाद अब 16 फरवरी को मेयर का चुनाव होना तय हुआ है| भारतीय जनता पार्टी की पूरी कोशिश है कि वह मेयर के चुनाव में आम आदमी पार्टी को हरा कर मेयर का चुनाव जीत जाए और फिर दिल्ली विधानसभा को समाप्त करके रोज रोज का विवाद ही खत्म किया जाए|
संविधान के अनुच्छेद 239एबी में कहा गया है कि अगर मंत्रिमंडल सरकार नहीं चला पा रहा है तो उपराज्यपाल राष्ट्रपति को इमरजेंसी लगाने की सिफारिश कर सकते हैं| बदली परिस्थियों में कांग्रेस इस मुद्दे पर मोदी सरकार का मौन समर्थन कर सकती है, क्योंकि केजरीवाल विपक्ष की राजनीति में भी कांग्रेस का नेतृत्व स्वीकार करने को तैयार नहीं हैं|
केजरीवाल और आम आदमी पार्टी का राजनीतिक उदय दिल्ली से हुआ है और अगर दिल्ली में ही उनसे मुख्यमंत्री पद छीन लिया गया तो केजरीवाल का राजनीतिक रुतबा तो खत्म होगा ही, आम आदमी पार्टी का अस्तित्व भी खतरे में पड़ सकता है| आम आदमी पार्टी के संस्थापकों में से एक योगेन्द्र यादव ने 2017 में लिखे एक लेख में लिखा था कि इस बात पर शर्त लग सकती है कि आम आदमी पार्टी की हत्या पहले होगी या आत्महत्या|
केंद्र से लगातार टकराव मोल लेकर आम आदमी पार्टी आत्महत्या की तरफ आगे बढ़ रही है, और केंद्र सरकार उसकी हत्या करने की तरफ आगे बढ़ रही है| अगर भाजपा की योजना के मुताबिक़ ही गोटियाँ फिट हुई, तो लोकसभा चुनाव से पहले दिल्ली विधानसभा को समाप्त कर दिया जाएगा और दिल्ली से राज्यसभा के तीन सांसदों का प्रावधान भी खत्म हो जाएगा|
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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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