Parliament Debate: संसद की बहस में एक दूसरे को नीचा दिखाने की जंग
संसद के इस बजट सत्र में बहस होनी थी राष्ट्रपति के अभिभाषण पर लेकिन बहस हुई अडानी के व्यापार पर। कांग्रेस की ओर से राहुल गांधी तो बीजेपी की ओर से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपने अपने भाषण में परसेप्शन की जंग लड़ी।

Parliament Debate: जब ज़िंदगी से ही सहजता का लोप होता जा रहा है तो फिर विशुद्ध राजनीति के गढ़ संसद से सहजता की उम्मीद ही बेमानी है। हिंडनबर्ग की रिपोर्ट का ऐन संसद के बजट सत्र के दौरान आना भी सहज नहीं था। यह तय था कि रिपोर्ट आएगी तो संसद में हंगामे का अवसर मिलेगा, फिर अडानी पर सवाल होंगे, उसके बाद प्रधानमंत्री मोदी पर भी सवाल उठेंगे।
राष्ट्रपति के अभिभाषण पर चर्चा के दौरान कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी जिस तरह प्रधानमंत्री मोदी पर हमलावर हुए, उससे सारी योजना साफ नजर आने लगती है। लेकिन इस पूरी बहस को लेकर राजनीति पर निगाह रखने वाले अनुभवी लोगों को जैसा अंदाजा था, पूरा घटनाक्रम ठीक वैसे ही घटा। राहुल गांधी अपनी रौ में आरोप लगाते रहे और उनका समर्थक तंत्र सदा की भांति उनके भाषण को भूतो न भविष्यति साबित करता रहा।
उसके जवाब में भी प्रधानमंत्री मोदी भी हमेशा की तरह आरोपों से बेपरवाह अपने अंदाज में बिना राहुल का नाम लिए उन्हें सलटाते रहे। मोदी के समर्थक हमेशा की तरह वाह वाह करते रहे। लेकिन अपने भाषण में उन्हें न तो अडानी का नाम लेना था और ना ही लिया। कुल मिलाकर सवाल जवाब के इस नोंक झोंक में 8 साल से जारी राजनीतिक एजेण्डा सेटिंग का ही खेल चला।
ऐसे में यह सवाल गम्भीरता से जरूर उठना चाहिए कि इस बहसबाजी से उस जनता को कितना फायदा हुआ, जिसके टैक्स के पैसे से संसद चलती है और जिसके प्रति संसद जवाबदेह है। इस सवाल का जवाब शून्य ही होगा, और कुछ नहीं।
अडानी मसले पर संसद में बहस होती रही। इसमें बहस कम, आरोप लगाने का एजंडा ज्यादा दिखा। विपक्ष की ओर से लोकसभा में राहुल गांधी तो राज्यसभा में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने मोर्चा संभाला। दोनों सदनों में जवाब प्रधानमंत्री मोदी ने दिया। राहुल गांधी ने पूरी कोशिश की थी, उनके इकोतन्त्र ने भी साथ दिया था कि प्रधानमंत्री को कांग्रेस की पिच पर बल्लेबाजी के लिए उतरने को मजबूर कर दिया जाए। लेकिन मोदी कांग्रेस की बजाय अपनी पिच पर धुंआधार बल्लेबाजी करके निकल लिये। उन्होंने दोनों सदनों में एक बार भी अडानी का नाम नहीं लिया। उलटे कांग्रेस और राहुल की बखिया उधेड़ कांग्रेसियों की खुन्नस और बढ़ा गए।
संसद के बजट सत्र में कांग्रेस की समूची कोशिश है कि मोदी और अडानी के रिश्ते को संसद के भीतर मुद्दा बनाया जाए। इस दौरान अडानी के कारोबार की बढ़त के साथ मोदी का हाथ होने के तथ्य को स्थापित करने का प्रयास हो रहा है तो मोदी सदा की तरह राहुल को कमजर्फ ही साबित करने की कोशिश में लगे रहे। बहस देख-सुनकर कभी नहीं लगा कि यह राष्ट्रीय बहस है। राहुल गांधी एवं कांग्रेस की कोशिश बहस के मुलम्मे में निजी खुन्नस का इजहार करना था। ऐसे माहौल से निबटने के अभ्यस्त प्रधानमंत्री मोदी के लिए यह पिच आसान हो गई। नैरेटिव के आधार पर समर्थन और विरोध की राजनीति करने वाले चंद लोगों को छोड़ दें तो इस पूरी बहस से कोई फायदा नहीं मिला।
संसद के मंच का लक्ष्य लोक और राष्ट्र हित होना चाहिए। लेकिन दुर्भाग्य से यह मंच इन दिनों कुछ ज्यादा ही राजनीतिक खेमेबंदी, उतार-चढ़ाव के प्रकटीकरण का माध्यम बन गया है। यह बहस बेमानी है कि इसके लिए ज़िम्मेदार कौन है। दरअसल हमने जिस तरह की व्यवस्था स्वीकार की है, उसमें इसके लिए किसी एक को उत्तरदायी नहीं ठहराया जा सकता।
आज के दौर में संसदीय विपक्ष का मकसद विरोध के लिए विरोध करना और सत्ता पक्ष को नीचा दिखाना हो गया है। जवाब में सत्ता पक्ष भी विपक्ष की बखिया उधेड़ने पर आमादा नज़र आता है। ऐसी बहसों से राष्ट्र, उसके लोक और उसके भविष्य को जो हासिल हो सकता है, वही इस बहस का प्राप्य समझा जा सकता है।
संसद में राष्ट्रपति के अभिभाषण पर चर्चा के नाम पर अडानी और मोदी संबंधों पर हुई इस बहस के पहले अडानी की सम्पत्ति 130 अरब डॉलर से घटकर 58 अरब डॉलर रह गई थी। लेकिन बहस के सिर्फ तीन दिन के भीतर अडानी के शेयरों में एक बार फिर से तेजी दिखाई देने लगी है। अब विपक्ष से पूछा जा सकता है कि क्या मोदी-अडानी गठबंधन इतना प्रभावी है कि अडानी के शेयर एक बार फिर ऊंचाई की ओर जाने लगे। वैसे इस पूरी बहस में राहुल गांधी यह क्यों भूल गए कि कारोबार में अडानी के जिस एकाधिकार और विशेषज्ञता पर सवाल उठा रहे हैं, उसका उदारीकरण के इस दौर में कोई मतलब नहीं रह जाता। उदारीकरण के दौर में बड़े कॉरपोरेट घरानों को मदद करना सरकारों की अघोषित नीति बन गया है।
जाहिर तौर पर उदारीकरण की इस नीति पर चलने का काम मोदी सरकार ने नहीं किया बल्कि कांग्रेस की नरसिंहराव सरकार ने किया था। राहुल गांधी यह क्यों भूल गए कि जब कांग्रेस की मनमोहन सरकार थी तो उनके बहनोई रॉबर्ट वाड्रा से भी अडानी की नजदीकी रही। राहुल गांधी यह कैसे भूल गए कि राजस्थान और छत्तीसगढ़ की उनकी ही पार्टी की सरकारें क्यों अडानी के स्वागत में लाल कालीन बिछाए खड़ीं हैं?
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अगर अडानी और अंबानी ही मुद्दा हैं तो फिर किस सरकार की जरूरत नहीं है? बहस तो इस पर होनी चाहिए कि बिग कॉरपोरेट पैदा करने की नीति पर हमें कितना आगे बढना है। 140 करोड़ के देश में क्या चंद बड़े कॉरपोरेट घराने देश के समग्र विकास को सुनिश्चित कर सकते हैं? दुर्भाग्य से इस पर न तो कांग्रेस बात कर रही है और न ही बीजेपी। राष्ट्रपति के अभिभाषण के बहाने संसद में हुई बहस का एकमात्र मकसद सिर्फ अपने-अपने राजनीतिक दृष्टिकोण को स्थापित करना और दूसरे के परसेप्शन को खारिज करना और नीचा दिखाना रहा। बेशक इस खेल की शुरुआत कांग्रेस ने की लेकिन बाद में प्रधानमंत्री मोदी भी इसी परसेप्शन की लड़ाई लड़ते नजर आये।
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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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