BJP and Muslims: राम मिलने के बाद अब मोमिन की खोज में भाजपा
पसमांदा मुस्लिम वोटरों को अपने साथ जोड़ने की कोशिश बीजेपी के लिए राम मिल जाने के बाद माया की खोज में भटकने जैसा है। क्या यह भाजपा के लिए फायदे का सौदा साबित होगा या न माया मिली न राम जैसी स्थिति हो जाएगी?

BJP and Muslims: मुस्लिमों को जोड़ने की छटपटाहट 1980 में बनी भारतीय जनता पार्टी के मूल स्वभाव और चरित्र के विपरीत है। लेकिन राजनीति भौंचक तरीके से खुद को बदलने का नाम है। अपने जन्म के समय से भाजपा ने धीरता से मंदिर मुद्दे को थामे रखा। संघ परिवार के अनुषांगी संगठनों ने इसमें भरपूर मदद की, खासकर विश्व हिंदू परिषद ने। राम मंदिर मुद्दे ने देश विदेश के तमाम साधु संतों और आध्यात्मिक चेतना को भाजपा के करीब ला दिया। दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी मुस्लिम आबादी वाले देश में मुख्य राजनीतिक दल बन गई भाजपा ने कमोबेश इस पूरी यात्रा में मुस्लिमों को दूर ही रखा। अब यह दूरी खत्म करने का प्रयास हो रहा है।
भाजपा की दो दिवसीय राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का आया बयान इस संदर्भ में महत्वपूर्ण है। उन्होंने खुलकर कहा, किसी को अछूत मत समझो। विस्तार के लिए पसमांदा मुसलमानों के पास जाओ। व्यापार करने वाले दाऊदी बोहरा लोगों तक पहुंचो। अंतरराष्ट्रीय सीमा क्षेत्रों में सघनता से जा बसे मुस्लिम लोगों के बीच जाओ। मुस्लिम व्यापारियों और मध्यवर्गीय समाज को समझाओ। उन्हें बताओ कि भाजपा उनकी दुश्मन नहीं। इसे मिशन बना लो।
उन्होंने हिदायत भरे अंदाज में मुस्लिमों के खिलाफ अनाप शनाप बयानबाजी कर पॉपुलर हुए नेताओं पर लगाम कसने की बात कही। भाजपा के इस नए पसमांदा मुस्लिम अभियान की राह में रोड़े बिछाने वालों के खिलाफ कठोर कदम उठाने तक की बात कही। इसके बड़े निहितार्थ हैं।
भाजपा या संघ परिवार की आंतरिक सोच से परिचित लोग इसे यू टर्न मानते हैं। मगर सच्चाई है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ प्रमुख मोहन भागवत बार बार भारत भूमि पर पैदा होने वाले हर नागरिक के जब हिंदू होने की बात कहते हैं, तो उनका इशारा किनारे छूटे मुस्लिम, ईसाई व अन्य धर्मों के लोगों को अंगीकार करने की तैयारी में लगने का होता है। इसमें भाजपा द्वारा मुस्लिमों के बीच पहुंच बढ़ाने की सीख भी होती है। गुजरात के मुख्यमंत्री रहते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने दाऊदी बोहरा समाज को भाजपा का वोटर बनाने की कोशिश की। उसमें उन्हें काफी हद तक सफलता भी मिली।
दुनिया में व्यापार के लिए मशहूर दाऊदी बोहरा समुदाय की जड़ें इस्लाम के प्रवर्तक मोहम्मद साहिब से जुड़ी बताई जाती हैं। अनुमान के मुताबिक इनकी आबादी बीस लाख से अधिक है। अपेक्षाकृत कम संख्या वाली इस प्रभावी मुस्लिम आबादी के अलावा भाजपा की नज़र देश की सबसे बड़ी मुस्लिम आबादी वाले पसमांदा समुदाय पर भी है। कुल मुस्लिम आबादी का 85 प्रतिशत हिस्सा पसमांदा यानि पिछड़े मुस्लिमों का है। ये पसमांदा खुद को बाहरी नहीं बल्कि भारतीय मानते हैं। अतीत में इनके पुरखे सनातन धर्म छोड़ इस्लाम में परिवर्तित हुए थे। लेकिन इस्लाम अपनाने के बाद भी इनको वर्ण व्यवस्था के कोप का शिकार होना पड़ा। खुद को बाहर से आए होने का अभिमान जताते हुए अगड़े यानी अशरफ मुसलमानों ने सामाजिक तौर पर इनको अंगीकार नहीं किया।
बिहार में 2005 में जब पहली बार नीतीश कुमार के नेतृत्व में एनडीए की सरकार बनी, तो उन्होंने कांग्रेस और राष्ट्रीय जनता दल के लपेटे में फंसी मुस्लिम आबादी के बीच पसमांदा का मसला छेड़ दिया। पसमांदा समाज से आने वाले पत्रकार अली अनवर अंसारी को राज्यसभा पहुंचाकर दूर की कौड़ी फेंकी। उसके नतीजे आए। मंदिर आंदोलन की वाहक भाजपा के साथ होने के बावजूद उनकी सेकुलर छवि बनी रही। जनता दल यू को स्थायी तौर पर बड़े मुस्लिम वोट बैंक का आधार मिल गया। यह रामविलास पासवान के दलित वोट बैंक की राजनीति में सेंध लगाने के लिए अति दलित का मसला छेड़ने जैसा था।
नीतीश कुमार ने यह क्यों और किसकी सलाह पर किया? क्या ऐसा करके उन्होंने सबको साथ लेकर चलने के संघ के एजेंडे को अमल में लाने का काम किया? अब जब नीतीश भाजपा के खिलाफ खड़े हैं तो इसका जवाब आसान नहीं।
प्रत्यक्ष रूप से राजनीति में शामिल नहीं होने वाला संघ यानी आरएसएस 2025 में शतायु होने वाला है। संघ के बताए मार्ग पर चलकर ही मंदिर आंदोलन के सहारे भाजपा को अपरिमित विस्तार मिला। लोकसभा में दो सदस्यों से 303 सांसदों तक का मुकाम हासिल किया। अगले लोकसभा चुनाव में 350 सीट हासिल करने का लक्ष्य है। लेकिन मंदिर निर्माण का वायदा अब मुद्दा नहीं रहा। ऐसे में नए मुद्दे और नई व्यूह रचना की जरूरत है। इसके लिए चरित्र के विपरीत मुस्लिम आबादी को भाजपा के करीब लाने की बात चल पड़ी है।
सवाल है, राममंदिर बन जाने के बाद मुद्दा खत्म हो जायेगा तो भारतीय जनता पार्टी राजनीति के लिए आगे क्या करेगी? अब आगे विस्तार के लिए प्रभावी मुद्दा क्या बनेगा? तो क्या अब स्थापित चरित्र के विपरीत जाकर भाजपा का मुस्लिमों को करीब लाने पर जोर होगा? अगर ऐसा है, तो 1989 में भाजपा के पालमपुर अधिवेशन की कथा बांचनी होगी। जिसमें प्रमुखता से अयोध्या में बाबरी ढांचा की जगह भव्य राम मंदिर का निर्माण करने की दिशा में आगे बढ़ने और मुस्लिम तुष्टिकरण की राजनीति से तौबा करने की बात थी। इससे हिन्दी हार्टलैंड में भाजपा को जबदरस्त समर्थन मिला। पश्चिम के गुजरात व महाराष्ट्र और दक्षिण के कर्नाटक में सरकारें बनी।
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अब जब राम मंदिर निर्माण के साथ यह मुद्दा पूरा होने को है, तो आगे विस्तार के लिए भाजपा का अगला मुख्य मुद्दा क्या होगा? यह बड़ा सवाल है। दक्षिण के केरल, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में सरकार बनाने की स्थिति में पहुंचने के लिए नए मुद्दे की तलाश है। अलग थलग पड़े पसमांदा मुस्लिम और बोहरा समाज पर निशाना है। कुछ रणनीतिकार इसे खतरनाक मगर वक्त की जरूरत मानते हैं। यह राम मिलने के बाद माया की ओर बढ़ने की कोशिश है। देश में मुस्लिमों की कुल आबादी के 85 फीसद पसमांदा हैं। इस विशाल आबादी को साधने की कोशिश करना किसी भी राजनीतिक दल के लिए लोभ मोह माया का विषय हो सकता है। भाजपा को इस माया ने घेर लिया है तो बुरा क्या है?
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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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