Get Updates
Get notified of breaking news, exclusive insights, and must-see stories!

Atal Bihari Vajpayee Birthday: संचार कला के जादूगर थे अटल बिहारी वाजपेयी

महात्मा गांधी को बेहतरीन संप्रेषक माना जाता था। गांधी को हमने नहीं देखा। हमारी पीढ़ी ने अटल बिहारी वाजपेयी को देखा है। अगर संप्रेषक की भूमिका में देखें तो अटल बिहारी वाजपेयी कहीं से भी उन्नीस नजर नहीं आते।

Birthday of Atal Bihari Vajpayee expertise in communication arts

Atal Bihari Vajpayee Birthday: अटल जी की जिह्वा पर सरस्वती का वास ही नहीं था, बेहतरीन संप्रेषक की तरह उन्हें इस तथ्य की समझ थी कि किस मंच पर कैसी भाषा का इस्तेमाल करके अपनी बात दूर-दूर तक पहुंचाई जा सकती है। राजनेताओं को तो वैसे भी मंचों का इस्तेमाल करने से परहेज नहीं रहता, लेकिन पान बेचने वाले पनवाड़ियों के जरिए भी अपनी बात दूर-दूर तक पहुंचाई जा सकती है, इसके जरिए अपना समर्थक आधार बढ़ाया जा सकता है, आज सोशल मीडिया के दौर में इसकी समझ शायद ही किसी राजनेता को हो।

लेकिन अटल जी दूसरी मिट्टी के बने थे। चूंकि अभावों के बीच छोटे शहरों में उनका शुरूआती जीवन गुजरा था, इसलिए उन्हें चट्टी-चौराहों की पान दुकानों की संचारक के तौर पर अहमियत पता थी। इसलिए 1996 में लोकसभा के चुनाव से पहले 1995 की गर्मियों में उन्होंने दिल्ली में पान विक्रेता संघ की मीटिंग को भी संबोधित किया।

भारतीय जनता पार्टी राजनीतिक परिदृश्य में तकरीबन इकलौती चल रही थी। महाराष्ट्र की धरती पर शिवसेना का साथ इसका अपवाद था। इसके बावजूद देश नेहरू की करीब चार दशक पुरानी भविष्यवाणी को अगले आम चुनाव में सच होने की उम्मीद पालने लगा था। नेहरू ने 1957 में लोकसभा में चुने गए वाजपेयी की वाणी को सुनकर उनके प्रधानमंत्री होने की घोषणा की थी। जाहिर है कि आम सभाओं में जहां वाजपेयी जाते, उनका परिचय भारत के भावी प्रधानमंत्री के तौर पर 1995 में तेज हो चुका था।

राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली में मदनलाल खुराना की सरकार थी। उस सरकार में डॉ. हर्षवर्धन दिल्ली के स्वास्थ्य मंत्री थे। डॉक्टर हर्षवर्धन दिल्ली को सिंगापुर की तर्ज पर पान-गुटका की पीक और सिगरेट के धुएं से मुक्त करने का सपना देख रहे थे। इसकी वजह से पनवाड़ियों और ठेले वालों को डर फैल गया था कि कहीं उनकी रोजी-रोटी न छिन जाए।

लिहाजा कानपुर के एक बड़े पान मसाला निर्माता फर्म की पहल पर अखिल भारतीय पान विक्रेता संघ का गठन हुआ और उसने दिल्ली के मावलंकर हाल में अपनी पहली सभा बुलाई। चूंकि उन दिनों राजनीतिक क्षितिज पर वाजपेयी का प्रभाव और हैसियत बढ़ती जा रही थी, इसलिए संघ ने उन्हें न्यौता भेजा। गुटका लॉबी को उम्मीद थी कि अगर वाजपेयी आए और उन्होंने पनवाड़ियों के रोजगार की चिंता जता दी तो दिल्ली की भाजपा सरकार पर दबाव पड़ेगा और वह अपना फैसला टालने को मजबूर हो जाएगी।

लेकिन इस मौके को वाजपेयी ने अपनी बात देशभर में पहुंचाने के अवसर के तौर पर लिया। इसकी बानगी मावलंकर हॉल के मंच पर दिखी भी। मंच पर जैसे ही वाजपेयी पहुंचे, दो तरह के नारे लगने लगे। जाहिरा तौर पर पहला नारा 'वाजपेयी जिंदाबाद' का था तो दूसरे में पनवाड़ियों के गुस्से का इजहार। वाजपेयी को शायद अंदाजा नहीं था कि स्वागत के साथ उन्हें गुस्से का भी सामना करना पड़ेगा।

मंच पर चढ़ते ही उन्होंने कहा, "मैंने सोचा था कि पनवाड़ी बंधुओं का सम्मेलन है, लिहाजा मेरा पान-सुपारी से स्वागत होगा..कुछ वैसे ही जैसे हम पूजा में देवताओं का करते हैं...लेकिन यहां तो गरमी है।" वाजपेयी की आवाज का सम्मोहन था या कुछ और, एक बारगी हॉल में शांति छा गई।

वाजपेयी ने अपने चिरपरिचित अंदाज में कुछ देर के ठहराव के बाद मुस्कान के साथ कहा, "अपने यहां देवताओं को पूजा में तांबूल-सुपारी चढ़ाई जाती है...तांबूल पत्रं समरप्यामि।" इसी बीच सन्नाटे को एक तीखी आवाज ने तोड़ा, "शराब बेचने पर पाबंदी नहीं, लेकिन पान वालों के पेट पर दिल्ली में लात मारने की तैयारी है..उसे क्यों नहीं रोका जाता?"

सभा के बीच से आई इस आवाज को वाजपेयी ने बीच में ही काट दिया। उनकी भंगिमा बदल गयी। "शराब का किसने नाम लिया...कौन है वह..." वाजपेयी के रौद्र रूप को देख जैसे मावलंकर हॉल में बैठे लोगों को सांप सूंघ गया। वाजपेयी ने गुस्से में कहना जारी रखा, "शराब की पान से तुलना नहीं की जा सकती..सोच समझकर बोला करो।"

छोटे शहरों, गांवों में पनवाड़ी और चाय की नुक्कड़ की दुकानें सिर्फ पान या चाय की दुकानभर नहीं होतीं। बल्कि वे एक तरह से गांव की चौपाल होती हैं। जहां लोग जुटते हैं, सियासी मुद्दों पर बहस करते हैं और अपनी राय बनाते हैं। इस पूरी प्रक्रिया में वैचारिक संचार खूब होता है। जनमत निर्माण में इन चौपालों की भूमिका बेहतरीन होती है। अनुभवी वाजपेयी पान के ठेले और उन्हें चलाने वालों की संचार तंत्र में भूमिका को समझते थे।

वाजपेयी ने पहली बार 16 मई 1996 को अल्पमत की सरकार बनाई थी। उसी सरकार के विश्वास मत पर हुई चर्चा की शुरूआत और चर्चा का जवाब देते हुए वाजपेयी ने जो भाषण दिया था, वे दोनों भाषण भारतीय राजनीतिक इतिहास के मील के पत्थर हैं।

पहली बार संसद की कार्यवाही का सीधा दूरदर्शन पर प्रसारण विश्वास मत की उसी बहस का हुआ था। मई की चिलचिलाती गर्मियों में वाजपेयी का भाषण सुनने के लिए दफ्तरों ने भी टीवी सेट का इंतजाम किया था। यू ट्यूब पर वे भाषण मौजूद हैं। जिन्हें वाजपेयी की संचार कला को जानना है, उन्हें इन भाषणों को सुनना चाहिए।

विश्वास मत पर चर्चा की शुरूआत में उन्होंने जो कहा था, उसका अंश उनकी संचार कला और तत्काल बुद्धि का अद्भुत उदाहरण है। उन्होंने कहा था, विपक्ष भी कहता है कि वाजपेयी अच्छे हैं। इसके जवाब में विपक्षी बेंचों से समवेत स्वर में हां-हां की आवाज निकली..वाजपेयी ने रूक कर कहा, गुड मैन इन बैड पार्टी। विपक्षी बेंचों से फिर हां-हां का तुमुलनाद उभरा। वाजपेयी ने सदा की तरह विपक्ष की तरफ सवाल उछाल दिया 'तो विपक्ष बताए कि वह अच्छे वाजपेयी के लिए क्या करने जा रहा है?' विपक्षी बेचों पर इस बार सन्नाटा था। इस दृश्य को पूरे देश ने टीवी के पर्दे पर देखा और सुना।

इसके बाद उनकी लोकप्रियता में जबरदस्त इजाफा हुआ था। 1996 में वाजपेयी सरकार भले गिर गई, लेकिन भारतीय जनता पार्टी को अछूत मानने की विपक्षी कोशिश को लोक के बीच जबरदस्त झटका लगा। यह वाजपेयी की संचार कला का परिणाम था।

यदि संचारक अच्छा हो, और उसकी जुबान में जादू हो तो यह मणिकांचन संयोग बन जाता है।
गांधी की आवाज सुनिएगा, उनकी भाषणकला में मोहकता नहीं है। शब्दों के जादू से वे वितान रचने की कोशिश नहीं करते। बल्कि उनकी आवाज उस दौर के आम भारतीय का सुर लगती है। इसीलिए तब के भारत ने उनकी आवाज को अपनी आवाज समझा। वाजपेयी कम से कम संचारक के तौर पर इन संदर्भों में आगे नजर आते हैं।

उनकी संचार कला और शब्द चयन का जादू अक्सर चलता रहा। साल 2002 में विपक्षी कांग्रेस की वजह से संसद की कार्यवाही बाधित थी। सरकार ने कांग्रेस की मांग पर चर्चा शुरू की। उस चर्चा में बतौर प्रधानमंत्री वाजपेयी ने हस्तक्षेप शुरू किया ही किया था कि गुजरात के एक कांग्रेसी सांसद ने टोका-टाकी तेज कर दी। विरोध में वाजपेयी यह कहते हुए बैठ गए कि आप ही बोलिए। हैरत होगी आज की पीढ़ी को जानकर कि उनसे भाषण देने के निवेदन की शुरूआत उसी कांग्रेस के मुख्य सचेतक प्रियरंजन दास मुंशी ने की, जिसके सांसद की टोका-टाकी से वाजपेयी आहत हुए थे।

Recommended Video

    Atal Bihari Vajpayee Jayanti: President Murmu, PM Modi ने दी श्रद्धांजलि | वनइंडिया हिंदी *News

    प्रियरंजन दास मुंशी ने तब कहा था, 'वाजपेयी जी, आप ऐसा नहीं कर सकते। करीब तीन दशक पहले आपको सुनने के लिए मैं कलकत्ता के ब्रिगेड परेड मैदान में बोलपुर से साइकिल से आया था।' अगली बारी रामविलास पासवान की थी। उन्होंने कहा था कि वे वाजपेयी जी को सुनने के लिए बोरा साथ लेकर आते थे। इसके बाद तो क्या सत्ता, क्या विपक्ष, वाजपेयी की भाषण कला की प्रशंसा में कोरस गान शुरू हो गया था।

    यह भी पढ़ें: Atal Bihari Vajpayee: राजनीति के कीचड़ में कमल की तरह खिलना कोई अटल जी से सीखे

    (इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

    More From
    Prev
    Next
    Notifications
    Settings
    Clear Notifications
    Notifications
    Use the toggle to switch on notifications
    • Block for 8 hours
    • Block for 12 hours
    • Block for 24 hours
    • Don't block
    Gender
    Select your Gender
    • Male
    • Female
    • Others
    Age
    Select your Age Range
    • Under 18
    • 18 to 25
    • 26 to 35
    • 36 to 45
    • 45 to 55
    • 55+