Atal Bihari Vajpayee: राजनीति के कीचड़ में कमल की तरह खिलना कोई अटल जी से सीखे
अटल बिहारी वाजपेयी बेमिसाल शख्सियत के धनी थे। भारतीय राजनीति में उनके जैसा राजनेता मिलना दुर्लभ है। 25 दिसंबर 1924 को जन्मे अटल जी ने अपने जीवन में कई बड़ी सफलताओं को चूमा तो कई आकस्मिक असफलताओं की पीड़ा भी झेली।

Atal Bihari Vajpayee: अटल बिहारी वाजपेयी का सम्मोहक अंदाज राजनीति मे अपने धुर विरोधियों के लिए भी करूणा से ओतप्रोत था। उनकी भाषण कला से सदन में क्या सरकार और क्या विपक्ष, सब मंत्रमुग्ध हो जाते थे। 1977 में आपातकाल हटाए जाने पर दिल्ली के रामलीला मैदान में हुई विपक्ष की उस रैली को कौन भूल सकता है जिसमें अटल जी ने अपने अनोखे अंदाज में आंखे मूंदकर कहा था 'खुली हवा में जरा सांस तो ले लें, कब तक रहेगी आजादी कौन जाने?'
अटल जी की राजनीति का व्याकरण उन नेताओं से भिन्न था जिनकी विचारधारा का वे समर्थन करते थे। उन्हें संघ परिवार का सौम्य चेहरा माना जाता था। संघ से कई मामलों में वैचारिक मतभेद होने के बाद भी अटल जी अपने को स्वयंसेवक कहने में गर्व करते थे। अटल जी ने कहा था कि वह प्रधानमंत्री कितने दिन रहेंगे कह नहीं सकते लेकिन स्वयंसेवक वह जिंदगी भर रहेंगे। संघ निष्ठा वह विभिन्न मौकों पर विभिन्न रूपों में प्रकट करते थे। हिंदू तन मन, हिंदू जीवन, रग रग हिन्दू मेरा परिचय' उनकी बहुचर्चित और बेहद लोकप्रिय कविता रही।
विपक्ष जब कहता था कि वह गलत पार्टी में सही व्यक्ति है तो अटल जी मुस्कराकर जवाब देते कि 'फल अच्छा है तो पेड़ कैसे खराब हो सकता है?' हर नेता की तरह वाजपेयी जी की भी कुछ सीमाएं थी। 2002 में गोधरा नरसंहार और उसके बाद हुए दंगो में गुजरात के मुख्यमत्री के रूप में मोदी की कार्यशैली से असहमत होने के बाद भी पार्टी की आम सहमति के साथ गए और मोदी को मुख्यमंत्री बने रहने दिया।
अटल बिहारी वाजपेयी ने प्रधानमंत्री के रूप में अपने कार्यकाल में उस अमृतकलश को खोजने की कोशिश की जिसकी मदद से वह राष्ट्र को पुननिर्मित कर सके। वाजपेयी ने कहा था कि 'न सिर्फ भारतीय राजनीति बल्कि राष्ट्रीय जीवन का सबसे बड़ा अभिशाप है कि हम मिल जुलकर काम नहीं कर सकते। चलो एकजुट होना सीखें। विभाजन की जगह समरसता पैदा करने की कोशिश करें और अपने स्वार्थ और अहंकार को किनारे रखना सीखें।'
अटल जी एक महान समावेशी नेता थे। नेहरू के आलोचक होने के साथ ही अटल जी नेहरू के प्रशंसक भी थे। नेहरू स्वंय युवा अटल को पसंद करते थे। अटल बिहारी वाजपेयी स्वभाव से ही लोकतांत्रिक थे। संघ की छाया में काम करने के बाद भी अटल जी ने संघ से अलग अपना अस्तित्व बनाए रखा। अटल जी का यह लोकतांत्रिक स्वरूप अनेक रूपों में प्रकट होता रहा।
अटल जी ने अपने प्रधानमंत्रित्व काल में विरोधी दलों या नेताओं के प्रति कभी कोई प्रतिशोधात्मक कदम नहीं उठाया। सत्ता ने कभी उन्हें मतांध नहीं किया। 50 साल विपक्ष में रहने के बावजूद अटलजी के भाषणों या लेखों में कभी कटुता नहीं दिखी। किसी भी लोकतंत्र के लिए यह गर्व की बात हो सकती है कि कोई नेता छह दशक से ज्यादा राजनीति में रहे और उसके पूरे राजनीतिक जीवन में ऐसा एक भी उदाहरण आप न बता पाए, जो कटुता, मर्यादाहीनता और समाज में वैमनस्य का पर्याय माना जा सके।
विपक्ष में रहते हुए सत्ता पक्ष के उजले को उजला कहने की उदारता कितने नेताओं में होती है? यदि भारतीय संसद ने उन्हें सर्वश्रेष्ठ सांसद और भारत सरकार ने 'भारत रत्न' की उपाधि दी है तो अटल जी के कारण इन उपाधियों का सम्मान ही बढ़ा है। विपक्ष के नेता की उनकी भूमिका, प्रधानमंत्री की उनकी भूमिका से काफी लंबी रही है और विपक्ष की भूमिका में सरकार की आलोचना करने के बाद भी दूसरे दलों के नेताओं के साथ संबंधों को कैसे निभाया जाता है, यह अटल जी से सीखा जा सकता है।
इंदिरा गांधी को सत्ता से बेदखल करने के लिए जेपी के आह्वान पर जनसंघ को जनता पार्टी में विलीन करने मे अटल जी ने जरा भी संकोच नहीं किया। लेकिन दोहरी सदस्यता के मामले पर संघ के निष्ठावान स्वयंसेवक बने रहने के अडिग फैसले पर रहते हुए जनता पार्टी से अलग होकर भारतीय जनता पार्टी का गठन किया और उसके संस्थापक अध्यक्ष बने। उस समय उन्होंने भविष्यवाणी किया था 'अंधेरा छंटेगा, सूरज निकलेगा, कमल खिलेगा।'
अटल जी पहले जनसंघ में, फिर भारतीय जनता पार्टी के भीतर वैचारिक और संगठनात्मक दोनों स्तरों पर लोकतांत्रिक प्रणाली को प्रोत्साहित करते रहे। भाजपा की स्थापना के साथ ही गांधीवादी समाजवाद का नारा दिया। पार्टी में अल्पसंख्यको के लिए दरवाजे खोले और पार्टी के भीतर अपने आलोचकों को भी पार्टी पदों पर प्रतिष्ठित किया। राजनीति के कीचड़ में कमल की तरह खिलना कोई अटल जी से सीखे। खुद खिले रहना और विपक्ष को खिलखिलाते रखना, इस कला में अटल जी का कोई मुकाबला नहीं था।
1998 में पोकरण में परमाणु परीक्षण अटल जी के प्रधानमंत्री काल का सबसे चमकदार लम्हा था। अटल जी ने लंबे समय से रुके हुए परमाणु परीक्षण करवा कर अनुकरणीय दूरदृष्टि, साफ नजरिए और दृढ़ विश्वास का परिचय दिया। अटल जी का मानना था कि भारत को महानता हासिल करनी है तो उसे सैन्य रूप से भी शक्तिशाली होना पड़ेगा। हालांकि अटल बिहारी वाजपेयी शांति के पक्षधर और अंहिसा के हिमायती थे। परीक्षण से कई साल पहले उन्होंने भारत और पाकिस्तान में शांति का आह्वान करते हुए एक मर्मस्पर्शी कविता 'जंग न होने देंगे' लिखी थी। 'प्यार करें या वार करें-खून एक ही बहना है, जो हम पर गुजरी है, बच्चों के संग न होने देंगे।
फरवरी 199 में लाहौर बस यात्रा प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के कार्यकाल का एक निर्णायक लम्हा था। यह एक ऐसा फैसला था जो हिन्दुस्तान और पाकिस्तान के रिश्तों में आमूलचूल बदलाव लाने की संभावना से भरा था। लेकिन कारगिल जंग ने उस सारी बढ़त पर पानी फेर दिया, जो वाजपेयी की लाहौर बस यात्रा से उपजी थी। पाकिस्तान के साथ स्थायी शांति के प्रति अटल जी खासे प्रतिबद्ध थे लेकिन कारगिल युद्ध होने पर पाकिस्तान को सबक सिखाने से भी पीछे नहीं हटे।
विदेश मंत्री और बाद में प्रधानमंत्री के तौर पर अटल बिहारी वाजपेयी ने विदेश नीति को मजबूती प्रदान की। अटल जी कहते थे कि आप अपने दोस्त तो चुन सकते हो, लेकिन पडोसियों को नहीं। अटल जी चीन, पाकिस्तान और अन्य पड़ोसी देशों से संबंध सुधारने को लेकर गंभीर थे। यही कारण था कि उनके निजी प्रयासों और व्यवहारिक दृष्टिकोण ने पड़ोसी देशों को वाजपेयी के कार्यकाल में सकारात्मक दृष्टिकोण अपनाने को मजबूर किया।
इन सबके उपर अटल जी ने कश्मीर समस्या के समाधान के लिए विशेष प्रयास किया। कारगिल, कांधार और संसद पर हमले के बावजूद 1999 से 2004 के बीच कश्मीर में जो भी सकारात्मकता दिखी वह अटल जी के कारण ही संभव हो सका। मुश्किल समय और पाकिस्तान की ओर से अड़चन के बाद भी अटल बिहारी वाजपेयी ने कभी भी कश्मीर मुद्दे पर अपना संतुलन नहीं खोया। इंसानियत के प्रति उनका जस्बा उन्हें औरों से बहुत अलग बना देता था। वाजपेयी का इंसानियत, जम्हूरियत और कश्मीरियत का नजरिया उनके बड़प्पन की मिसाल था।
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जीवन भर सार्वजनिक जीवन में रहने वाले अटल बिहारी वाजपेयी के अंदर सार्वजनिक जीवन और पद प्रतिष्ठा के प्रति एक उदासीनता भी थी। राजनीति में रहे लेकिन निर्लिप्त भाव बना रहा। उनमें गहरा सौंदर्यबोध भी था। दिल खोलकर हंसने वाले एक कुशल हाजिरजवाब अंदाज ने उन्हें हमेशा जीवंत रखा। उनके अकेलेपन ने उन्हें विवेकपूर्ण अनासक्ति की भावना और परिणामों से बेपरवाह रहते हुए अपने निश्चय पर अटल रहने की क्षमता दी। यही कारण है कि एक समय के बाद उन्होंने स्वत: सार्वजनिक जीवन से अपने आप को मुक्त कर लिया और नेपथ्य में चले गये।
यह भी पढ़ें: Atal Bihari Vajpayee birth anniversary: 'सदैव अटल' पहुंचे पीएम मोदी और राष्ट्रपति, दी श्रद्धांजलि
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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