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Bihar Scams: घोटालों को दबाने के लिए निकाला जाति जनगणना का जिन्न?

Bihar Scams: बिहार में जाति जनगणना के बाद तरह तरह के सवाल उठ रहे हैं। इन सवालों में जानबूझकर कुछ जातियों को कमतर दिखाने का आरोप तो लग ही रहा है। एक आरोप यह भी लग रहा है कि नीतीश कुमार ने जाति जनगणना का पांसा अपने शासन काल में हुए घोटालों को छिपाने के लिए फेंका है।

हजार करोड़ का सृजन घोटाला

नीतीश शासन की बहती गंगा मानकर जिन घोटालों में हाथ धोये गए हैं, उनमें से सबसे चर्चित सृजन घोटाला था। हजार करोड़ के इस घोटाले का नाम "सृजन घोटाला" इसलिए पड़ा क्योंकि बिहार के भागलपुर जिले में "सृजन महिला सहयोग समिति" नाम की एक संस्था इससे जुड़ी थी। मनोरमा देवी नाम की एक महिला ये एनजीओ चलाती थी। सरकार से जो फण्ड इन्हें काम करने के लिए मिलते थे, उसे बीच में ही गायब करके दूसरे बैंक खातों में डाल दिया जाता था। जो सूद मिलता उससे दिखाने के लिए छोटा-मोटा कुछ-कुछ काम जैसा आयोजन इत्यादि किया जाता और करोड़ों का मूलधन आराम से सूद कमाने के लिए रख लिया जाता।

Bihar Scams and caste census released to suppress scams?

ये कार्यक्रम सात वर्षों तक 2007 से 2014 के बीच चलता रहा। इस दौरान मनोरमा देवी ने जो अन्य कारनामे किये उनमें 2003 में 24000 स्क्वायर फीट की जमीन 30 वर्षों के लिए लीज पर ली, जिसके लिए उन्होंने 2400 रुपये की भारी भरकम रकम अदा की थी! शुरूआती पुलिस प्राथमिकियों की मानें तो ये घोटाला 16 दिसम्बर 2003 से 31 जुलाई 2017 तक चलता रहा जिसमें सरकारी खजाने से अवैध निकासी होती रही।

तटबंध घोटाला

एक सामाजिक कार्यकर्त्ता शिवेश भारती ने पटना उच्च न्यायलय में एक जनहित याचिका दायर की, जिसमें कहा गया कि 3608 करोड़ रुपये खर्च करने के बाद भी सीतामढ़ी में तटबंधों की हालत खस्ता है। सुनवाई के बाद हाई कोर्ट ने मामले की जांच करने के आदेश दिए। इस मामले के सामने आने पर राजद के नेताओं ने (जो कि उस वक्त विपक्ष में थे) जमकर बवाल काटा। चारा घोटाले से जुड़े एक मामले के सजायाफ्ता अपराधी लालू यादव तक कहने लगे कि बिहार में घोटालों की सेल लगी है - एक पर एक मुफ्त ले लो!

अभी का हाल देखें तो चाचा-भतीजा यानी नीतीश कुमार और तेजस्वी यादव मिलकर सरकार चला रहे हैं।।घोटाले का क्या हुआ पता नहीं। वैसे इस मामले में सच्चाई बाहर आने की कितनी संभावना थी, इसका अनुमान आप इस बात से लगाइए कि जांच जल संसाधन विभाग के कर्मियों पर होनी थी और अदालत के आदेश के बाद जल संसाधन विभाग के ही 72 कर्मचारी इस घोटाले की जांच कर रहे थे! उस दौर के राजद नेताओं के बयानों की मानें तो ये घोटाला भी 11,000 करोड़ रुपये से ऊपर का था।

महादलित घोटाला

इस घोटाले का नाम महादलित घोटाला इसलिए पड़ा क्योंकि नीतीश बाबु की सुशासन सरकार ने दलितों में भी कुछ जातियों को चुनकर महादलित घोषित कर दिया था। महादलितों को अंग्रेजी बोलना और कंप्यूटर चलाना सिखाने के नाम पर 2010 से 2016 के बीच घोटाला किया गया। इस मामले में राज्य की विजिलेंस ब्यूरो ने 23 अक्टूबर 2017 को एस.एम. राजू पर एफआईआर दर्ज की। बाद में एक दूसरी एफआईआर हुई जिसमें कई आरोपी थे।

ब्रिटिश लिंगुआ नाम की एक संस्था जो पटना में खासी प्रसिद्ध है, उसके निदेशक बीरबल झा, उस दौर के मिशन निदेशक और रिटायर हो चुके आईएएस अफसर राघवेन्द्र झा और राजनारायण लाल, रामाशीष पासवान, मिशन के तब के ओएसडी अनिल कुमार सिन्हा (जो कि अब रिटायर हैं), मिशन के कोऑर्डिनेटर शशि भूषण सिंह, सहायक निदेशक हरेन्द्र कुमार श्रीवास्तव और बिरेन्द्र चौधरी और तब के मिशन के स्टेट प्रोजेक्ट ऑफिसर देबजानी कार को भी बाद में एफआईआर में आरोपी बनाया गया।

विजिलेंस ब्यूरो के मुताबिक 2012-13 से लेकर 2015-16 के बीच ब्रिटिश लिंगुआ को 7.3 करोड़ रुपये दिए गए। उन्हें 40-40 छात्रों-छात्राओं के बैच को पढ़ाना था लेकिन जांच में पता चला कि जिन छात्र-छात्राओं का नाम एक बैच में था, वही नाम दूसरे कई बैच में भी थे! इस तरह बिना पढ़ाये ही महादलितों के नाम पर पैसे लिए जाते रहे। इस मामले की जांच भी अभी तक चल रही है।

टॉयलेट घोटाला

विचित्र नाम वाला ये घोटाला कहीं दूर नहीं हुआ था। सुशासन बाबु की सरकार के ठीक नाक के नीचे, राजधानी पटना से इस घोटाले की बदबू उठने लगी। पंद्रह करोड़ का ये घोटाला करने में ज्यादा समय भी नहीं लगाया गया था। केवल 1 मे से 16 जून 2016 के बीच पंद्रह करोड़ रुपये जो केंद्र की स्वच्छ भारत मिशन योजना के थे, वो गायब हो गए। तब के पटना के डीएम, संजय अग्रवाल ने पाया कि नियमों को ताक पर रखकर पैसे निकाले गए हैं तो उन्होंने जांच करवाई कि सचमुच शौचालय बने भी हैं या नहीं?

जांच में पाया गया कि कार्यपालक अभियंता विनय कुमार सिन्हा और पीएचईडी के लेखापाल बिटेश्वर प्रसाद ने मिलकर चार एनजीओ पकड़े जिनके जरिये पैसे की निकासी करनी थी। बिटेश्वर प्रसाद ने धड़ाधड़ 200 से अधिक चेक महीने-डेढ़ महीने में जारी कर डाले और स्टेट बैंक ऑफ़ इंडिया के एक सहायक प्रबंधक शिव कुमार झा ने इन चेकों की निकासी में मदद की। इस तरह गरीबों के लिए जो शौचालय कभी बने ही नहीं, उन्हें बनाने की रकम निकाल ली गयी। इस घोटाले की बू भी अभी तक आ रही है।

गंगा ब्रिज घोटाला

ये बिहार का सबसे नया ताजा घोटाला है जो तेजस्वी यादव का पीछा ही नहीं छोड़ रहा। इस घोटाले पर रोशनी डालने के लिए मनीष कश्यप का नाम लिया जाता है। मनीष कश्यप पर फिलहाल तमिलनाडु की पुलिस ने एनएसए लगाकर गिरफ्तार किया है और दूसरे कई पुराने मामले खोदकर बिहार पुलिस की आर्थिक अपराध इकाई भी लगी हुई है। गंगा नदी पर भागलपुर जिले में आगुवानी-सुल्तानगंज के बीच सस्पेंशन ब्रिज का निर्माण हो रहा था। इस 3 किलोमीटर लम्बे पुल का निर्माण 2017 में शुरू हो गया था। पहली बार ये पुल 30 अप्रैल 2022 को टूटा था। उसके बाद यही पुल 5 जून 2023 को टूट गया। जब दूसरी बार ये पुल टूटा तब इसपर कथित रूप से आठ मजदूर थे और एक गार्ड था जो कि लापता है।

इस पुल को 2020 में ही बनकर पूरा हो जाना था और इसकी लागत थी 1710 करोड़ रुपये। नियत समय के तीन साल बाद भी ये पुल बनते-बनते ही टूट क्यों रहा है? कहा जाता है कि इससे "पार्टी फण्ड" में दस फीसदी यानि 171 करोड़ रुपये का 'कट' जा रहा है। अब ब्रिज का क्या है? ब्रिज तो बनता और टूटता रहता है।

एक के बाद एक इतने घोटाले हाल के दौर के हैं जिनपर जवाब देना नीतीश कुमार और तेजस्वी यादव की सरकार के लिए बड़ा मुश्किल हो होगा। एक पुल गिरने पर ही जब सवाल हुए तो पूछने वाले पत्रकार को उठा कर जेल में फेंक दिया गया। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का बिहार में ये हाल है कि अख़बारों में जहरीली शराब से मौत भी नहीं लिखा जाता। आजकल छपता है कि मिलावटी पेय पीने से कोई अंधा हो गया तो किसी की जान चली गयी।

अब समस्या एक के बदले दो हो गयीं हैं। पहले सत्ताधारियों को केवल भ्रष्टाचार के मुद्दे से निपटना था। अब एक तरफ जहाँ सिपाही भर्ती में घोटाला खुलकर सामने आ रहा है, वहीं दूसरी तरफ अत्यंत पिछड़ी जातियां भी प्रतिनिधित्व मांगने लगी हैं। राजद-जद(यू) गठबंधन के लिए रोज़े माफ़ करवाने गए थे, नमाज गले पड़ गयी वाली स्थिति हो गयी है। बाकी सबसे ताजा जांच जो पुलिस भर्ती में हुए घोटाले की होनी शुरू हुई है, उसकी आंच भी थमने वाली नहीं क्योंकि जिस पद पर बहाली में घोटाला सामने आया है, उस पद पर आवेदन देने वालों में भी तो 68% पिछड़ी जातियों के युवा होंगे।

तब इन घोटालों को दबाने और छिपाने के लिए जाति जनगणना का सहारा ले लिया तो क्या गलत किया? राजनीति में तो वैसे भी प्रचलित है कि जिस सवाल की जवाब न दे सको उस सवाल को ही बदल दो। नीतीश कुमार ने जाति जनगणना करवाकर यही किया है।

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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