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Lalu Yadav Family: घोटाले पर कार्रवाई और कार्रवाई पर राजनीति

दिल्ली के राउज एवेन्यू कोर्ट से फिलहाल जमीन के बदले नौकरी वाले मामले में लालू परिवार के कुछ सदस्यों को जमानत मिल गयी है लेकिन भ्रष्टाचार पर होने वाली कार्रवाई पर राजनीति जारी रहेगी।

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Lalu Yadav Family: पिछले तीन-चार दशकों से देश के विभिन्न राज्यों में कई क्षेत्रीय पार्टियां उभरीं, जिन्होंने अपने गृह प्रदेश की सत्ता हासिल कर राष्ट्रीय राजनीति में भी अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज की। इन क्षेत्रीय पार्टियों में एक कॉमन बात यह देखी गई कि लगभग हर पार्टी के शीर्ष नेता पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगे।

लेकिन बिहार का राष्ट्रीय जनता दल यानी राजद देश की अकेली क्षेत्रीय पार्टी है जो भ्रष्टाचार को लेकर सर्वाधिक बदनाम रही है। जब-जब यह पार्टी सत्ता में आती है, भ्रष्टाचार और जंगल राज की खबरें देश भर के मीडिया में सुर्खियां बनने लगती हैं। यही कारण है कि अब विपक्षी पार्टियों के नेता राजद और लालू परिवार पर ऐसे बयान भी बेहिचक दे रहे हैं, जो आरोप-प्रत्यारोप के लिए कुख्यात भारतीय राजनीति में पहले शायद कभी नहीं सुने गये।

बिहार भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष संजय जयसवाल, विधान परिषद में विरोधी दल के नेता सम्राट चौधरी और सुशील मोदी आदि ने लालू प्रसाद और उनके परिवार को आदतन भ्रष्टाचारी कहना शुरू कर दिया है। संजय जयसवाल ने मीडिया से बात करते कहा, "लालू प्रसाद यादव आदतन अपराधी हैं और जेल जाने के बावजूद जब वह केंद्र में मंत्री बने तो उन्होंने बड़ा भ्रष्टाचार किया। उन्होंने नौकरी के बदले जमीन लिखवाया है। अपने नेताओं से भी उन्होंने मकान लिखवाया है।"

राजद के अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव दो बार बिहार के मुख्यमंत्री रहे और एक बार यूपीए की सरकार में केंद्रीय मंत्रिमंडल में रेल मंत्री रहे। मुख्यमंत्री के पद पर रहते हुए उन पर कई घोटालों के आरोप लगे थे, जिनमें देश का सबसे चर्चित चारा घोटाला भी शामिल है। चारा घोटाला सार्वजनिक धन के दुरुपयोग का एक ऐसा श्रृंखलाबद्ध घोटाला सिद्ध हुआ जिसमें उन्हें एक से अधिक मामलों में सजा हुई। कई बार लालू प्रसाद जेल गए, वे चुनाव लड़ने के अयोग्य हो गए। अब भी सभी मुकदमों की सुनवाई पूरी नहीं हुई है। लेकिन आश्चर्य की बात यह है कि रेल मंत्री के रूप में उनका पांच साल का कार्यकाल (2004 से 2009) भी अब चारा घोटाला की तरह घोटालों की एक जटिल श्रृंखला में तब्दील होता दिख रहा है।

हाल में ही केंद्रीय जांच एजेंसी सीबीआई की जांच और प्रर्वतन निदेशालय के छापे के बाद लालू प्रसाद, उनके छोटे बेटे और बिहार के वर्तमान उप-मुख्यमंत्री तेजस्वी यादव समेत परिवार के कई सदस्यों पर गंभीर वित्तीय भ्रष्टाचार, पद के दुरुपयोग के सनसनीखेज आरोप लगे हैं। इनमें सर्वाधिक चर्चित मामला है- लैंड फॉर जॉब! लालू प्रसाद पर आरोप लगे हैं कि उन्होंने रेलवे में नौकरी देकर कई लोगों की कीमती जमीन प्रत्यक्ष तौर पर या अप्रत्यक्ष रूप से अपने परिवारों के नाम करवा ली। हालिया छापे के बाद प्रवर्तन निदेशालय ने कहा है कि, "यह 600 करोड़ का घोटाला है। जांच में पता चला है कि 350 करोड़ रुपए के प्लॉट और 250 करोड़ रुपए के लेनदेन हुए हैं।" बिहार, दिल्ली, मुंबई समेत 24 जगहों पर छापे मारे गए हैं। इनमें एक करोड़ नकद रुपए मिले हैं, कीमती गहने, कागजात आदि प्राप्त हुए हैं। जांच में पता चला है कि रेलवे के विभिन्न जोन में ग्रुप डी की भर्ती में 50% कैंडिडेट्स की भर्ती लालू परिवार के चुनावी क्षेत्रों से हुई है।

दिल्ली की न्यू फ्रेंड्स कॉलोनी में डी-1088 चार स्टोरी बंगला है। यह मेसर्स ए-बी एक्सपोर्ट्स प्राइवेट लिमिटेड कंपनी के नाम पर है। इस कंपनी का कंट्रोल तेजस्वी यादव और लालू परिवार के पास है। इसे तेजस्वी यादव अपनी आवासीय संपत्ति की तरह प्रयोग करते हैं। इसका बाजार रेट इस समय 150 करोड़ रुपए है, जबकि इसे चार लाख में लिया गया था। उम्मीदवारों से चार प्लॉट महज 7.50 लाख रुपए में आरजेडी के पूर्व विधायक अबु दोजाना ने खरीदे। इस डील में साढ़े तीन करोड़ का लाभ अबु दोजाना और राबड़ी देवी को हुआ।"

राजद, कांग्रेस समेत गैर-भाजपाई दलों के नेताओं ने सीबीआई, ईडी की हालिया कार्रवाई पर तिखी प्रतिक्रिया दी है। लालू प्रसाद यादव ने इसे भाजपा की प्रतिशोधात्मक कार्रवाई करार दिया। उन्होंने कहा कि भाजपा राजनीतिक लड़ाई को बहुत निचले स्तर पर लेकर चली गई है, जहां एजेंसी का दुरुपयोग कर उनके परिवार को तंग किया जा रहा है। कांग्रेस व अन्य विपक्ष के नेताओं ने तो इसे केंद्र सरकार की तानाशाही और लोकतंत्र की हत्या करार दिया है। बिहार सरकार में राजद के सहयोगी दल जद-यू नेता और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने भी इसे राजनीति से प्रेरित कार्रवाई बताया है। नीतीश कुमार ने कहा, जब हम राजद के साथ आते हैं, रेड पड़ने लगती हैं।

इतना ही नहीं, इस मामले पर पटना से लेकर दिल्ली तक की राजनीति गरमा गई है। भाजपा को घेरने के लिए कांग्रेस विपक्षी पार्टियों को एकजुट करने में लग गई हैं, वहीं राजद के नेताओं ने जनता की सहानुभूति प्राप्त करने के लिए इसे लेकर भाजपा विरोधी पोस्टर कैंपेन, विक्टिम कार्ड चलाना शुरू कर दिया है। स्पष्ट है कि दोनों खेमों के द्वारा इस मामले से राजनीतिक लाभ प्राप्त करने का प्रयास किया जा रहा है।

गौरतलब है कि यह मामला 2017 में ही सामने आया था, लेकिन आरंभिक कार्रवाई के बाद कई वर्षों तक मामले को ठंढे बस्ते में डाल दिया गया। आखिर क्यों? राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि केंद्र सरकार को 2017 से 2022 की अवधि में कार्रवाई की राजनीतिक आवश्यकता महसूस नहीं हुई। लेकिन जद-यू और राजद के साथ आने के बाद भाजपा बिहार की राजनीति में अकेली रह गई, इसलिए वह मामले का इस्तेमाल कर अपने पक्ष में जनमत हासिल करने का प्रयास कर रही है।

सवाल उठता है कि क्या राजद का आरोप सही है? क्या यह सच में एक गढ़ा गया मामला है? जांच एजेंसियों ने छापे में चिह्नित की गई संपत्तियों, जमीन देकर नौकरी प्राप्त करने वालों का संपूर्ण ब्यौरा सार्वजनिक कर संदेह का लाभ प्राप्त करने का कोई अवसर राजद के लिए नहीं छोड़ा है। प्राप्त जानकारी के अनुसार जल्द ही जांच एजेंसी जांच के दायरे में नौकरी प्राप्त करने वालों को भी ला रही है। इन पर कानूनी कार्रवाई, चार्जशीट दायर करने की तैयारी तेजी से चल रही है। निश्चित है जब उन 'लाभुकों' के चेहरे सामने आएंगे तो उनके और उनके परिवारों की प्रतिक्रिया भी सामने आएगी। उस परिस्थिति में राजद और विपक्षियों के पास आरोप का खंडन मुश्किल होगा।

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    आगे न्यायालय में यह मामला क्या रूप लेगा, कानूनी शिकंजे के कारण तेजस्वी प्रसाद की कुर्सी कितनी प्रभावित होगी, इसे लेकर तरह-तरह के कयास लगाए जा रहे हैं। लेकिन एक बात तो तय है कि इस मामले की आग अब जल्द शांत नहीं होने वाली। अगले लोकसभा चुनाव तक यह मामला बिहार की राजनीति को आंदोलित करते रहेगा।

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    (इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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