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Bihar Crime: राजनीतिक प्रश्रय में पनप रहे अपराधी और आतंकी

Bihar Crime: बिहार के मोतिहारी में नागपंचमी के मौके पर समुदाय विशेष से जुड़े लोगों ने एक शोभायात्रा पर पथराव कर दिया। इस पत्थरबाजी में न केवल महावीरी शोभायात्रा में शामिल भक्त घायल हुए बल्कि कुछ पुलिसवालों को भी चोट लगी। सोशल मीडिया पर बाद में जो वीडियो सामने आये इसे देखकर लगता है कि पत्थरबाजों को न सामाजिक सद्भाव की चिंता थी और न पुलिस प्रशासन का डर।

बिहार की स्थिति को देखें तो जनसांख्यिकी में आ रहे निरंतर बदलाव सिर्फ अपराध को ही नहीं, सांप्रदायिक वारदातों को भी जन्म दे रहे हैं और बिहार के बागों से मानों धीरे धीरे बहार लापता होने लगी है। कहने को यहाँ से जंगलराज का दौर बीत चुका है, सुशासन आ गया है, लेकिन मोतिहारी जैसी एकतरफा पत्थरबाजी को देखकर विपक्षी राजनेताओं से लेकर आम आदमी तक से पूछें तो शायद वो यह बात बहुत विश्वास से नहीं कह पायेगा।

Bihar Crime: Criminals and terrorists flourishing under political patronage

आम आदमी को सवाल करने पर सरकारी डंडा दिखा देनेवाली बिहार पुलिस सुनियोजित अपराधों को नियंत्रित करने में अपनी हनक खो देती है। हाल ही में एक बयान में बिहार के डीजीपी ने पुलिस के अच्छे काम के बारे में बड़े बड़े दावे जरूर किये लेकिन एक नजर हाल की घटनाओं पर डालते ही ऐसे दावों की पोल खुल जाती है। सीधे आतंकवाद की बात करें तो जनवरी से जुलाई 2023 में ही अलग अलग अख़बारों-समाचार चैनल ये बता रहे थे कि एनआईए ने गुजरात, यूपी के अलावा बिहार के पटना और दरभंगा में "गजवा-ए-हिन्द" मोड्यूल को ध्वस्त करने के लिए कार्रवाई की है।

बम बनाने की फैक्ट्री या बम बनाने के दौरान हुए धमाकों की बात कर लें, तो नवादा, बिहारशरीफ, पटना, भागलपुर समेत दर्जन भर जिलों से ऐसी ख़बरें इसी वर्ष आ चुकी हैं। बांका और सिवान से आने वाली ख़बरों के अलावा, कई ख़बरें तो ऐसी हैं जिनमें बम मस्जिद में छुपा कर रखे गए थे और उनके फटने से कभी ईमाम तो कभी आम लोग हताहत हुए। राजद के एमएलए मुहम्मद नेहालुद्दीन तो सासाराम में हुए विस्फोट पर ये तक कह चुके हैं कि मुस्लिम आत्मरक्षा में बम बना रहे थे।

बिहार में हाल ही में जो दंगे और शोभायात्राओं पर पथराव की घटनाएं सुनाई दे रही हैं, उनकी आहट पहले से सुनाई दे रही थी। ये और बात है कि जब सवाल उठाये गए तो सवालों को "सांप्रदायिक" घोषित करके पूछने वालों को ही "पॉलिटिकली करेक्ट" लोगों ने चुप करवा दिया था। एक समुदाय विशेष के दबदबे वाले इलाकों में सरकारी स्कूल जब नियत दिन के बदले "जुम्मे" की छुट्टी करने लगे, उस समय भी कई नेताओं और आम लोगों ने पूछा था कि किस "भीड़तंत्र" के दबाव में नियमों को ताक पर रखा जा रहा है?

समाचार पत्रों में से केवल एक दैनिक जागरण ने सीमांचल के क्षेत्रों, पूर्णिया, किशनगंज, अररिया, और कटिहार आदि क्षेत्रों में बांग्लादेशी घुसपैठियों के कारण हो रहे जनसंख्यकीय बदलावों पर ध्यान दिलाने का साहस दिखाया था। रिपोर्ट में बताया गया था कि पूरे भारत में जहाँ मुस्लिम आबादी 4 प्रतिशत की दर से बढ़ी, वहीं सीमांचल में ये आंकड़ा सीधा चार गुना करीब 16 प्रतिशत का था। इस विचित्र दर से बढ़ रही आबादी की ओर से सुशासन ने आंखे मूँद ली थीं, क्योंकि ये समुदाय विशेष सत्ताधारी दल राजद का वोट बैंक माना जाता है। जिस "माय" समीकरण से राजद चुनावी जीत हासिल करती है, उसमें "एम" मुस्लिम और "वाय" से यादव मिलाकर "एमवाय समीकरण" बनता है।

इन समीकरणों के बदलने का नतीजा जो हुआ, बिहार अब वही झेल रहा है। हिन्दुओं की शोभायात्राओं पर पत्थरबाजी अब इतनी आम हो गयी है कि स्थानीय समाचार पत्रों के अलावा कोई उसे मुख्य समाचार भी नहीं मानता। वो राष्ट्रीय चैनलों की प्राइम टाइम बहसों का हिस्सा नहीं बनती। लगातार ऐसी हिंसा के कारण जारी हिन्दुओं के पलायन को मालदा और कैराना की ही तरह भुला दिया जाना, या फिर सीधे असत्य घोषित कर दिए जाने में क्या हर्ज है? वैसे भी नाम तो अखलाक का याद रहेगा, चन्दन गुप्ता नाम का कोई युवक तिरंगा यात्रा के दौरान एक समुदाय विशेष की भीड़ का शिकार बन भी जाए, तो उसके परिवार को मुआवजा तक नहीं मिलता।

दरभंगा इत्यादि जगहों पर समुदाय विशेष की भीड़ ने रामनवमी इत्यादि त्योहारों के दौरान जो किया, वो सिर्फ एक समुदाय विशेष ने नहीं किया है। जिन्हें याद होगा, वो बता देंगे कि बिहार में चुनावों के दौरान ही दुर्गा पूजा थी। दुर्गा पूजा विसर्जन के दौरान ही अनुराग कुमार पोद्दार को पुलिस की गोलियों का निशाना बना दिया गया था। उस वक्त मुंगेर में जिस एसपी की तैनाती थी, उसके पिता सत्ताधारी दल के उस वक्त एक प्रमुख नेता थे। बाद में आरसीपी सिंह का जदयू और नीतीश कुमार से अलगाव हो गया।

जाहिर है कि जब हमलावरों के गिरोह के गिरोह रोज तैयारियां कर रहे हों, सत्ता स्वयं आततायी के अपराधों के प्रति आंख बंद करने लगी हो और एक पक्ष पहले से ही पलायन कर रहा हो, उस दौर में दंगे होंगे ही। मोतिहारी जैसी ही घटना तो करीब-करीब हर शहर में हो चुकी है। पुलिस-प्रशासन की पोल 2021 के एनसीआरबी आंकड़ों से भी खुल जाती है। जमीन विवाद सम्बंधित 3,336 मामले बिहार में दर्ज हुए जो देश में सर्वाधिक हैं। जमीन से जुड़े विवादों में 2021 में बिहार में 815 हत्याएं हो चुकी हैं। पुलिस और सरकारी अधिकारियों पर डेढ़ सौ हमलों के साथ ही बिहार टॉप पर है। हत्या के प्रयासों में बिहार 8393 मामलों के साथ पश्चिम बंगाल के बाद दूसरे स्थान पर है।

दंगों की गिनती देखेंगे तो सीधे-सीधे धार्मिक/सांप्रदायिक दंगों के 51 मामलों के अलावा दंगा फ़ैलाने के 6,298 मामले बिहार में सामने आये। महिलाओं के विरुद्ध होने वाले अपराधों में बिहार 3,400 मामलों के साथ दूसरे नंबर पर है। बलात्कार के 786 मामले आये और दहेज़ के मामलों में भी बिहार 3,367 मामलों के साथ दूसरे स्थान पर रहा। बिहार में 2021 में दहेज़ के लिए एक हजार महिलाओं को मार दिया गया। दलितों पर अत्याचार के मामले में बिहार चौथे स्थान पर है, इसके 5,842 मामले दर्ज हुए। शादी या फिरौती के लिए स्त्रियों के अपहरण के 6,589 मामले दर्ज हुए हैं। एटीएम फर्जीवाड़े में भी बिहार 557 मामलों के साथ दूसरे स्थान पर है।

बिहार में अपराध के आंकड़ों को देखते हुए अगर कोई ये कहता है कि बिहार की शासन व्यवस्था में आमूलचूल परिवर्तन की आवश्यकता है, तो क्या गलत कहता है? चुनाव नजदीक आ रहे हैं, ऐसे में अगर बिहार को अपने पूर्व के जंगलराज वाली छवि से मुक्ति पाना है तो उसे विकास और शासन को ही मुद्दा बनाकर वोट करना होगा। हालांकि जातिवाद में गहरे धंसे बिहार से यह उम्मीद करना अपने आप में थोड़ा कठिन है। लेकिन आज नहीं तो कल इस दिशा में हर नागरिक को सोचना ही होगा।

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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