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BBC Documentary: क्या बीबीसी की साजिश में शामिल है भारत तोड़ो गैंग?

बीबीसी की डाक्यूमेंट्री के पीछे वे सभी लोग हैं, जो 2002 से ही मोदी विरोधी एजेंडे पर काम कर रहे थे| बड़ा सवाल यह है कि 20 साल बाद इस मुद्दे को फिर से क्यों जिंदा किया गया है|

BBC Documentary on pm modi is Bharat Todo gang involved in this conspiracy

BBC Documentary: अंग्रेजों ने फूट डालो और राज करों की नीति अपनाकर भारत पर राज किया| यह वाक्य हम आज़ादी के बाद से सुनते आए हैं| जाते जाते भी वे मुसलमानों को भड़का कर उनका अलग देश बना गए| सुभाष चन्द्र बोस के जर्मनी के साथ मिलने और दूसरे विश्व युद्ध के बाद भारतीय सेना में विद्रोह की आशंका को भांपते हुए वे भारत छोड़ तो गए, लेकिन अपनी हार पचा नहीं पाए| गांधी और नेहरू की सहमति से भारत और पाकिस्तान के रूप में दो टुकड़े करके स्थाई दुश्मन बना गए| दोनों देशों को लड़ाने का अंग्रेजों का अधूरा एजेंडा अब भी ब्रिटिश राजनीतिज्ञ और ब्रिटिश ब्रॉडकास्टिंग कारपोरेशन के माध्यम से जारी है|

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यह एक एतिहासिक तथ्य है कि 1947 में बीबीसी ने कश्मीर पर पाकिस्तान के पक्ष में स्टैंड लिया था| जवाहर लाल नेहरू जब युद्धविराम करके कश्मीर के मसले को संयुक्त राष्ट्र में ले गए थे, तब ब्रिटिश सरकार ने भी कश्मीर पर पाकिस्तान का स्टैंड लिया था| ब्रिटेन की सरकार और बीबीसी की पाकिस्तान और मुस्लिमपरस्ती के अनेक प्रमाण मौजूद हैं| बीबीसी ने नेहरू के कार्यकाल से लेकर नरेंद्र मोदी के कार्यकाल तक हिन्दुओं मुसलमानों को लड़ाने की भारत विरोधी मानसिकता और नीति बनाए रखी है|

नब्बे के दशक में एक बार तो ऐसी स्थिति आ गई थी कि बीबीसी भारत में मृतप्राय हो गया था, लेकिन रामजन्मभूमि आन्दोलन शुरू होने और बाबरी ढांचा टूटने के बाद एजेंडे के तहत बीबीसी को भारत में फिर से खड़ा करने की प्लानिंग की गई| बीबीसी में कट्टरपंथी मुस्लिम और वामपंथी पत्रकार भरे गए| रेडियो सेवा को बंद करके पहले आधा आधा घंटे के न्यूज वीडियो बना कर "एनडीटीवी" जैसे आरएसएस भाजपा विरोधी टीवी चैनलों पर चलाए गए| फिर ये केप्सूल ईटीवी के हिन्दी न्यूज चैनलों पर भी चले| मोदी सरकार बनने के बाद बीबीसी के न्यूज वीडियो ने भाजपा, आरएसएस और मोदी सरकार विरोधी स्पष्ट लाईन पकड़ कर यूट्यूब का रूख किया| पिछले आठ साल से बीबीसी उसी एजेंडे पर काम कर रहा है|

हिन्दू और भारत विरोधी ब्रिटिश मानसिकता का यह ताज़ा प्रमाण है कि 2002 में गुजरात दंगों के समय ब्रिटिश विदेश मंत्री जैक स्ट्रा ने भारतीय उच्चायुक्त को एक रिपोर्ट भेजने को कहा| इस काम को पूरा करने के लिए कुछ राजनयिक ब्रिटेन से भी भेजे गए, जिन्होंने खुद गुजरात में जाकर और नई दिल्ली में ब्रिटिश लाईब्रेरी में दिल्ली के पत्रकारों को बुला कर उनसे फीडबैक लिया| इनमें ज्यादातर मुस्लिम और वामपंथी पत्रकार ही थे, लेकिन मेरे जैसे कुछ निष्पक्ष क्षेत्रीय अखबारों में काम करने वाले पत्रकार भी इन वार्ताओं में शामिल हुए थे|

क्षेत्रीय पत्रकारों को बुलाने का मकसद यह था कि वे अपने सीनियर वामपंथी पत्रकारों को सुनें और अपनी लेखनी में उसी लाईन को अपनाएं, इस तरह ब्रिटिश सरकार भारतीय मीडिया को प्रभावित करने का काम कर रही थी| इस फीडबैक में गुजरात दंगों के राजनीतिक और चुनावी इफेक्ट के बारे में पत्रकारों से राय ली जाती थी| यह सब काम ब्रिटिश उच्चायोग की देखरेख में हो रहा था| यही वह रिपोर्ट है, जिसमें कहा गया था कि गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने मुस्लिम विरोधी दंगों को हवा दी|

वैसे यह नई बात नहीं है, उस समय के भारतीय अखबारों और टीवी चैनलों पर भी यही आरोप लगाया जाता था| खासकर एनडीटीवी न्यूज चैनल मोदी विरोधी एजेंडे पर ही काम कर रहा था| मुस्लिम कट्टरपंथियों, वामपंथी विचारधारा के पत्रकारों, वामपंथी बुद्धिजीवियों, कम्यूनिस्ट विचारधारा के एनजीओ और भाजपा विरोधी राजनीतिक दलों का एक गठजोड़ भी नरेंद्र मोदी विरोधी एजेंडे पर देश और विदेशों में काम कर रहा था|

इन सभी की लॉबिंग से भारत के उन वामपंथी एनजीओ को अमेरिका से फंडिंग की गई, जो मोदी विरोधी एजेंडे पर काम कर रहे थे| रणनीति बनाने के लिए इन सभी की आपस में कई गोपनीय बैठकें भी होती रहीं| 2004 में केंद्र में यूपीए सरकार बनने के बाद नरेंद्र मोदी पर लगे इन आरोपों को बाकायदा आधिकारिक रूप देकर जांच करवाई गई| सुप्रीमकोर्ट के दखल से सीबीआई के डायरेक्टर आरके राघवन की अध्यक्षता में एसआईटी का गठन किया गया, जो सीधे सुप्रीमकोर्ट के अधीन काम कर रही थी|

मुख्यमंत्री होते हुए नरेंद्र मोदी ने सीबीआई जांच का सामना किया, एक बार तो उन्हें गुजरात की राजधानी में ही एसआईटी के कार्यालय में नौ घंटे बिठाकर पूछताछ की गई| एसआईटी की रिपोर्ट के आधार पर सुप्रीमकोर्ट ने नरेंद्र मोदी को उन सभी आरोपों से बरी कर दिया, जो ब्रिटिश उच्चायोग के माध्यम से ब्रिटिश विदेश मंत्रालय की रिपोर्ट में लिखे गए थे और जिन्हें अब बीबीसी की डाक्यूमेंट्री में दोहराया गया है| इसी बीच नरेंद्र मोदी पर फर्जी मुठभेड़ों के कई आरोप भी लगे, सुप्रीमकोर्ट तक की सुनवाई के बाद वे सभी आरोप भी खारिज हुए|

नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद उस गिरोह में निराशा का भाव था, क्योंकि उनकी सारी कोशिशों के बावजूद भारत की जनता ने नरेंद्र मोदी का साथ दिया था, लेकिन वे थके नहीं थे| नए सिरे से नए आरोपों का सिलसिला जारी रहा| "एनडीटीवी", "द हिन्दू",और "केरेवन" के बाद "द वायर" और "सत्य हिन्दी" जैसी कई वेबसाईटें नरेंद्र मोदी विरोधी अभियान के लिए खड़ी की गईं|

2019 में नरेंद्र मोदी के दूसरी बार जीतने के बाद बीबीसी को भी फिर से खड़ा किया गया, रेडियो पूरी तरह बंद कर दिया गया और बीबीसी हिन्दी की वेबसाईट पर भाजपा और भारत विरोधी एजेंडे पर तेजी से काम शुरू किया गया| यह काम फिर उसी तरह शुरू हुआ, जैसे आज़ादी के बाद पाकिस्तान, मुस्लिम और कश्मीर के पक्ष में हुआ था| कश्मीर को पाकिस्तान का हिस्सा बताने वाले नक्शे तक जारी किए गए| पाकिस्तान के बीबीसी रिपोर्टरों से भी भारत विरोधी खबरें करवाई जाती हैं और उन्हें हिन्दी की वेबसाईट पर प्रसारित किया जाता है|

अब जब 2024 के लोकसभा चुनावों को सिर्फ 15 महीनें बाकी रह गए हैं, तो विपक्ष को एकजुट करने और भारतीय मुसलमानों को एक जगह पर लामबंद करने के लिए गुजरात दंगों पर ब्रिटिश विदेश मंत्रालय की रिपोर्ट के आधार पर डाक्यूमेंट्री बना कर प्रसारित कर दी गई है| अब इस डाक्यूमेंट्री में जिन पत्रकारों का इंटरव्यू दिखाया गया है, उस लिस्ट को देखेंगे, तो जाहिर हो जाएगा कि भारतीय न्यायपालिका में मात खाने के बाद उन पत्रकारों के अधूरे एजेंडे को पूरा करने के लिए ही बीबीसी ने यह डाक्यूमेंट्री बनाई है|

डाक्यूमेंट्री में वही सारे पत्रकार हैं, जो 2002 से नरेंद्र मोदी पर दंगे करवाने और फर्जी मुठभेड़ें करवाने का आरोप लगाते रहे हैं। मनी लांड्रिंग की आरोपी वेबसाईट न्यूजक्लिक और "द वायर" में लिखने वाले पत्रकार एलिशान जाफरी, जस्टिस लोया की हत्या के झूठे आरोप लगाने वाले "केरेवन" वेबसाईट के राजनीतिक संपादक हरतोष बल इसमें प्रमुख हैं। तीसरा पत्रकार नीलांजन मुखोपाध्याय भी "द वायर" और "केरेवन" के एजेंडा लेखक हैं|

चौथी अरुंधती राय को तो सभी जानते हैं कि वह भारत तोड़ो गैंग की अग्रणी रही है और अपने लेखों में कश्मीर पर पाकिस्तान का स्टैंड लेती रही है| क्रिस्टोफ जेफरलॉट भी भारत विरोधी और हिंदू विरोधी एजेंडा लेखक हैं| बीबीसी की इस डाक्यूमेंट्री के पीछे असली दिमाग जैक स्ट्रा का है, जो 1997 से 2010 तक लेबर पार्टी की सरकार में ब्रिटेन के विदेश मंत्री थे, लेबर पार्टी उदार वामपंथी विचारधारा की पार्टी है| इससे भी ब्रिटिश और बीबीसी की भारत और हिन्दू विरोधी मानसिकता का खुलासा होता है|

2019 में जब मोदी सरकार ने कश्मीर से 370 समाप्त कर दी थी, तो लेबर पार्टी ने भारत के खिलाफ प्रस्ताव पास किया था| लेबर पार्टी के नेता और पूर्व विदेश मंत्री जैक स्ट्रा ने बीबीसी की डाक्यूमेंट्री प्रसारित होने के बाद पहला इंटरव्यू "द वायर" को दिया, जिसमें उसने ब्रिटिश विदेश मंत्रालय की रिपोर्ट की पुष्टि की है|

बीबीसी की डाक्यूमेंट्री के पीछे वे सभी लोग हैं, जो 2002 से ही मोदी विरोधी एजेंडे पर काम कर रहे थे, लेकिन 2014 के बाद लगातार हताशा का शिकार हो रहे थे| बड़ा सवाल यह है कि 20 साल बाद और वह भी सुप्रीमकोर्ट के दो दो बार फैसलों के बाद इस मुद्दे को नए कलेवर में क्यों प्रसारित किया गया है| इस दौरान भारत की स्थिति अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मजबूत होने से जिन राष्ट्रों को भारत के सामने कमजोर होता देखा जा रहा है, उनकी भी इस भारत विरोधी साजिश में भूमिका को नकारा नहीं जा सकता|

राहुल गांधी भारत जोड़ो यात्रा कर रहे थे, लेकिन जैसे ही बीबीसी ने भारत को हिन्दू मुस्लिम आधार पर फिर से विभाजित करने की यह चाल चली, राहुल गांधी की कांग्रेस बीबीसी के पक्ष में आ कर खड़ी हो गई| वे सभी लोग फिर से लामबंद हो गए हैं, जो 2002 के दंगों के समय लामबंद थे, जो नागरिकता संशोधन क़ानून के खिलाफ लामबंद थे, जो किसान आन्दोलन के समय लामबंद थे|

समूचा विपक्ष, वामपंथी छात्र संगठन, वामपंथी अध्यापक, वामपंथी पत्रकार सभी फिर लामबंद हो गए हैं। जेएनयू हो, जामिया मिलिया हो, हैदराबाद का विश्वविद्यालय हो या चेन्नई का, या फिर दिल्ली विश्वविद्यालय, इन सभी विश्वविद्यालयों में वामपंथी, कांग्रेसी और मुस्लिम छात्र सगंठनों ने बीबीसी डाक्यूमेंट्री को दिखाने और उन छात्रों को अपने पीछे लामबंद करने की कोशिश की है, जो किसी राजनीतिक विचारधारा से नहीं जुड़े हुए, बल्कि सिर्फ शिक्षा ग्रहण करने के लिए विश्वविद्यालयों में आए हैं|

वैसे तो जैक स्ट्रा के सामने आने से ही स्पष्ट हो गया कि यह डाक्यूमेंट्री भारत, भारत के प्रधानमंत्री, हिन्दुओं और भारत की न्याय व्यवस्था पर चोट करने के इरादे से बनाई गई है। लेकिन अगर बीबीसी कहता है कि उसने शुद्ध पत्रकारिता की है, और बिना किसी राजनीतिक एजेंडे के 20 साल बाद यह डाक्यूमेंट्री बनाई है, तो उससे पूछा जा सकता है कि क्या वह अपने पूर्व प्रधानमंत्री चर्चिल पर भी डाक्यूमेंट्री बनाएगा, जो 40 लाख भारतीयों का हत्यारा था|

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    दूसरे विश्व युद्ध के समय जब भारत में सूखा पड़ा था, तो चर्चिल ने भारत के अनाज के भंडार खाली करके ब्रिटिश सेना को अनाज पहुंचा दिया था| इस त्रासदी के कारण 40 लाख भारतीय मौत के मुहं में समा गए थे| चर्चिल ने साफ़ साफ़ कहा था कि वह भारतीयों को जानवर समझते हैं, जो बिना सोचे समझे बच्चे पैदा करते रहते हैं|

    यह भी पढ़ें: BBC and India: बीबीसी के भारत-विरोधी कार्यक्रमों पर इंदिरा और राजीव गांधी भी हुए थे नाराज

    (इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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