Ayodhya changing Politics: अयोध्या के जरिए राजनीति की पुनर्जागरण यात्रा
Ayodhya changing Politics: पंद्रह लाख छिहत्तर हजार दीयों की जगमग। उल्लास, उत्साह, भक्ति का संगम। रोम रोम में झुरझुरी पैदा करता आनंद। गर्वित भाव से ऊर्जित चेहरे। धमनियों में तीव्र होता रक्त उद्वेग। भिंची हुई मुट्ठियां। सुनहरे अतीत का समृद्ध भाव। जय श्रीराम के जयकारे की गूंज। यह चित्र है अयोध्या की नई राजनीतिक पुनर्जागरण यात्रा का, जिसकी शुरुआत 1949 में बाबा राघवदास और महंत दिग्विजय नाथ ने जन्मभूमि पर राम परिवार की मूर्ति स्थापना के साथ की थी।

रविवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के साथ पहली बार दीपोत्सव में शामिल होने अयोध्या पहुंचे थे। उसी अयोध्या, जिसे ऐतिहासिक एवं पौराणिक होने के बावजूद आजाद भारत में सत्तर सालों तक अपने और श्रीराम के वजूद के लिये संघर्ष करना पड़ा। कोर्ट-कचहरी, राम भक्तों की खून सनी लाशों को देखने का दर्द सहते हुए बरसों उजाड़ रहना पड़ा।
आजादी के बाद से अयोध्या ने सियासत में भेदभाव के कई रंग देखे। राम की जिस अयोध्या को देश की आजादी के बाद ही मुक्त हो जाना था, उसे अपनी मुक्ति के लिये सात दशक लंबा इंतजार करना पड़ा। वह भी तब, जब राम केवल नाम नहीं बल्कि भारत की जनभावनाओं के प्रतीक हैं। लोक के जीवन एवं भाव में समाहित हैं।
अयोध्या के साथ राम को भी अपने अस्तिव की परीक्षा देनी पड़ी, जिनका प्रभाव भारत में ही नहीं इंडोनेशिया, मलेशिया, आस्ट्रेलिया, कंबोडिया, श्रीलंका, नेपाल, थाइलैंड तक किसी ना किसी रूप में है। लोक के मन में विराजमान जिस राम का नाम बड़े से बड़े आक्रांता खत्म नहीं कर पाये, उस राम के नाम पर भारत की सेकुलर सियासत ने प्रश्नचिन्ह खड़ा कर दिया।
अयोध्या में मोदी ने जब कहा, ''एक समय था राम के बारे में, हमारी संस्कृति और सभ्यता के बारे में बात करने से बचा जाता था, राम के अस्तित्व पर प्रश्नचिन्ह लगाये जाते थे।'' तब मोदी उसी धर्म निरपेक्ष सियासत पर निशाना साध रहे थे, जिसने जनभावनाओं के खिलाफ राम और अयोध्या को अछूत बनाकर रख दिया था।
मोदी ने कहा कि "अयोध्या जी दीपों से दिव्य हैं, भावनाओं से भव्य हैं, आज अयोध्या नगरी भारत के सांस्कृतिक पुनर्जागरण के स्वर्णिम अध्याय का प्रतिबिंब है।" तब वह उन करोड़ों लोगों की भावनाओं को अभिव्यक्त कर रहे थे, जो पिछले सत्तर सालों से इस अवसर का इंतजार कर रहे थे।
दरअसल, देश आजाद होने के बाद ही अयोध्या की राजनीतिक पुनर्जागरण की यात्रा शुरू हो जानी चाहिए थी, जब कांग्रेस ने आचार्य नरेंद्र देव को हराने के लिये बाबा राघव दास को उतार कर पहली बार हिंदुत्व की सियासत की शुरुआत की थी। बाबा राघव दास ने जनमानस से वादा करते हुए संकल्प लिया था कि चुनाव जीतने के बाद रामजन्मभूमि मुक्ति का आंदोलन चलाया जायेगा।
राम जन्मभूमि मुक्ति आंदोलन
हिंदुत्व और अयोध्या उत्थान की यह पहली परीक्षा सफल रही। बाबा राघवदास ने आचार्य नरेंद्र देव को 1312 वोटों से हराने के बाद अपने संकल्प को पूरा करते हुए गोरक्ष पीठ के महंत दिग्जविजय नाथ समेत कुल पांच संतों के साथ मिलकर 22-23 दिसंबर 1948 की रात में विवादित परिसर का ताला खोलकर भगवान राम की मूर्ति रखवा दी और भजन-कीर्तन शुरू कर दिया।
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यहीं से शुरू हुआ नये भारत में राम जन्मभूमि मुक्ति आंदोलन और राजनीतिक पुनर्जागरण का आंदोलन। बाबरी ढांचा में मूर्ति रखे जाने की जानकारी जब प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू को मिली तो उन्होंने मुख्यमंत्री गोविंद वल्लभ पंत को पत्र लिखकर मूर्ति हटवाने का निदेश दिया। पंत ने फैजाबाद जिले के तत्कालीन डीएम केके नायर को मूर्ति हटवाने का आदेश दिया, लेकिन नायर ने बवाल की आशंका जताते हुए मूर्ति हटवाने से इनकार कर दिया।
नेहरू के निर्देश पर गृहमंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल ने दुबारा पंत को पत्र लिखा कि प्रधानमंत्री नेहरू चाहते हैं कि मूर्ति हटवाने का कोई विकल्प तलाश जाये। पंत ने एक बार फिर डीएम पर मूर्ति हटाने का दबाव डाला। एक बार फिर मूर्ति हटवाने से इनकार करते हुए केके नायर ने अपने पद से इस्तीफा देकर समूची सरकार को सकते में डाल दिया।
बाबा राघव दास, अवैद्यनाथ की मूर्ति स्थापना और केके नायर के बलिदान से शुरू हुए आंदोलन की राजनीतिक ताकत को पहली बार अटल बिहारी वाजपेयी ने बलरामपुर से चुनाव लड़ते हुए महसूस किया। उन्होंने अनुभव किया लोकमानस में गहरे पैठे राम के खिलाफ जाकर राजनीति में टिकना मुश्किल है। राम के बिना देश का आध्यात्मिक, सांस्कृतिक पुनर्जागरण संभव नहीं है।
राम नाम से राजनीतिक पुनर्जागरण
इसके बाद राम जन्मभूमि आंदोलन ने धार्मिक, अध्यात्मिक, सांस्कृतिक पुनर्जागरण से आगे बढ़कर राजनीतिक पुनर्जागरण का रूप ले लिया।
इस आंदोलन में बाद में कई नायक उभरे। भाजपा को साधु-संतों का भी साथ मिला। वाजपेई को गोरक्षपीठ महंत अवैद्यनाथ का भी सहयोग मिला, जिन्होंने 1984 में देश के सभी पंथों के शैव-वैष्णव, धर्माचार्यों को एक मंच पर श्रीराम जन्मभूमि मुक्ति यज्ञ समित का गठन किया, और 7 अक्टूबर को सीतामढ़ी से अयोध्या के लिये धर्मयात्रा निकाली।
संयोग है कि गोरक्षपीठ राममंदिर आंदोलन के राजनीतिक पुनर्जागरण सहयात्री रहा है। 1949 में मंदिर में मूर्ति रखी गई तब महंत दिग्विजयनाथ की सहभागिता रही। 1986 में राजीव गांधी ने राम मंदिर का ताला खोलने का आदेश दिया तब महंत अवैद्यनाथ मौजूद रहे। राममंदिर निर्माण का मार्ग प्रशस्त हुआ तो गोरक्षपीठ के महंत योगी आदित्यनाथ शिलान्यास के सहभागी बने।
राम के नाम पर 1948 के उपचुनाव में हिंदुत्व के सफल राजनीतिक प्रयोग के बाद कांग्रेस ने प्रकारांतर कम्युनिस्टों के दबाव में राम मंदिर के आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक उत्थान को हिन्दू-मुलसमान का मुद्दा बना दिया और संविधान में धर्मनिरपेक्षता के नाम पर तुष्टिकरण वाली कट्टरपंथी राजनीति की नींव रखी, जबकि कांग्रेस के दिग्गज महात्मा गांधी तक सुराज और राम राज्य की बात खुलकर करते थे।
गांधी भी मानते थे कि राम केवल एक भगवान के रूप में ही पूज्य नहीं हैं बल्कि वह मर्यादा के शिखर पुरुष हैं। राम सनातन संस्कृति के कण कण में समाहित हैं। राम केवल भारतीयता के मूल्यों के प्रतीक नहीं हैं बल्कि देश की सीमा से बाहर भी सभ्यता एवं संस्कारों की पहचान हैं। भगवान श्रीराम को यदि एक सामान्य राजा के रूप में भी देखें तो उनका चरित्र अनुकरणीय है। उनका राज सुराज का उदाहरण है।
तुलसीदास ने रामायण में लिखा है, ''दैहिक, दैविक, भौतिक तापा, रामराज काहु नहीं व्यापा।'' जिसका आशय है कि राम राज्य में जनता देह के रोग, दैवीय प्रकोप और भौतिक आपदा से मुक्त थी। आजादी के 75 सालों बाद अयोध्या धार्मिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक यात्रा पर आगे बढ़ रही है, जिसके वाहक नरेंद्र मोदी और योगी आदित्यनाथ बन रहे हैं।
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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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