Ayodhya: अजर, अमर हैं अयोध्या जी
Ayodhya: दीपावली का त्यौहार राम और राम की अयोध्या से जुड़ता है। दीपावली के दिन राम और अयोध्या दोनों का समान रूप से प्रतीकात्मक महत्व है। इस अयोध्या में दीपावली से ठीक एक दिन पहले अयोध्या में दीपोत्सव शुरु करके उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अयोध्या को उसकी मौलिक पहचान देने का प्रयास किया है। इस साल प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने दीपोत्सव में शामिल होकर दीपावली और अयोध्या दोनों की गरिमा के अनुकूल कार्य किया है।

अयोध्या की महिमा ही ऐसी है कि अयोध्या के नाम के साथ जी जोड़कर आदरपूर्वक संबोधित किया जाता है। साधु संत, कथाकार, बुजुर्ग और श्रद्धालु आज भी अयोध्या को अयोध्या नहीं बल्कि अयोध्या जी कहकर ही संबोधित करते हैं। ऐसा इसलिए क्योंकि अयोध्या भारतीय लोक चेतना के शिखर पर विराजमान मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम की नगरी है।
वैवश्वत मनु की अयोध्या
त्रेता युग में यह अयोध्या एक वैभवशाली नगर था। रामायण में महर्षि वाल्मिकी इस नगर का वर्णन करते हुए लिखते हैं अयोध्या कोशल नामक महान जनपद की राजधानी है। लेकिन यह नगर उससे भी बहुत प्राचीन है।
ऋग्वेद (4.30.18) में सरयू नदी के किनारे एक नगर का उल्लेख आता है जहां आर्य लोग निवास करते हैं। पौराणिक इतिहासकारों का मत है कि संभवत: ऋग्वेद में इसी नगर का उल्लेेख हुआ है जिसे हम आज अयोध्या के रूप में जानते हैं।
रामायण में भी अयोध्या नगर की स्थापना विवस्वान के पुत्र वैवस्वत मनु महाराज ने की थी। वैवश्वत मनु 14 मनुओं में सातवें मनु कहे जाते हैं जिनका वर्तमान काल चल रहा है। इनसे पहले 6 मनुओं की सृष्टि आरंभ होकर नष्ट हो चुकी है। भारतीय काल गणना के अनुसार एक मनु का मनवंतर होता है। इस तरह जब चौदह मनवंतर पूरे होते हैं तो एक कल्प बीतता है। एक कल्प ब्रह्माजी के एक दिन के बराबर है।
भारत के इसी कालबोध के कारण भारतीय अपनी सभ्यता को सनातन सभ्यता कहते हैं। यह अनादि और अनंत है। पाठक इसे ऐसे समझ सकते हैं कि चार युगों सतयुग, त्रेता, द्वापर और कलयुग ये चार युग होते हैं जिन्हें मिलाकर एक मनवंतर बनता है जिसके संचालक एक मनु होते हैं।
ऐसे चौदह मनुओं के चौदह मनवंतर को मिलाकर एक कल्प बनता है जो ब्रह्माजी के एक दिन के बराबर होता है। हमारे शास्त्र ब्रह्मा जी की आयु 100 वर्ष निर्धारित करते हैं।
इक्ष्वाकु वंश और कोशल जनपद
इस कालबोध से अयोध्या इस मन्वंतर के आरंभ से ही उपस्थित है क्योंकि इस नगर की स्थापना वर्तमान वैवश्वत मनु ने किया है। वैवश्वत मनु के दस पुत्र थे जिनमें एक इक्ष्वाकु भी थे। इक्ष्वाकु का उल्लेख ऋग्वेद में भी आता है लेकिन यह निश्चित नहीं है कि वहां जिन इक्ष्वाकु का उल्लेख हुआ है वो राजा हैं, कुल हैं या जाति। लेकिन पौराणिक साहित्य इक्ष्वाकु से ही सूर्यवंश का प्रारंभ मानता है जिन्होंने कोशल देश पर राज किया। लेकिन इक्ष्वाकु का वंश उनसे भी छह पीढी पहले से मौजूद है। पौराणिक काल गणना के अनुसार इस वंश की शुरुआत पुराण पुरुषोत्तम से होती है और इसी वंश में सातवीं पीढी में इक्ष्वाकु राजा बनते हैं जो अयोध्या नगर की स्थापना करते हैं।
सूर्यवंशी राजा इक्ष्वाकु की 42वीं पीढी में राजा सगर और 46वीं पीढी में राजा भगीरथ होते हैं जिनकी तपस्या से धरती पर गंगा अवतरण की कथा आती है।
इक्ष्वाकु वंश की 60वीं पीढी में राजा रघु आते हैं जिनके नाम पर इस वंश को रघुवंश भी कहा जाता है। रघु की संतान थे ऋज और ऋज के पुत्र थे राजा दशरथ। राजा दशरथ के चार पुत्रों में ज्येष्ठ पुत्र राम थे जो इक्ष्वाकु वंश की 63वीं पीढी थे।
वाल्मिकी रामायण में अयोध्या का विवरण
कोशल देश पर एक से एक परम प्रतापी राजा आते रहे लेकिन अयोध्या अजर, अमर स्वरूप में सरयू के किनारे सदा सर्वदा विद्यमान रही। राजा दशरथ और भगवान राम के समय में अयोध्या एक भव्य और दिव्य नगर था जिसका उल्लेख वाल्मिकी रामायण में आता है।
अयोध्या का बहुत विस्तृत और भव्य वर्णन महर्षि वाल्मिकी रामायण में करते हुए कहते हैं कि सरयू नदी के किनारे बसे कोसल जनपद में अयोध्या नाम का नगर है। अयोध्या नगर बारह योजन लंबा और तीन योजन चौड़ा है। नगर के चारों ओर फैली हुई सड़कों पर नित्य जल छिड़का जाता और फूल बिछाए जाते हैं। अयोध्या से बाहर जाने का मुख्य मार्ग अन्य मार्गों से अलग और विशाल है। मुख्य मार्ग के दोनों तरफ पेड़ों की कतारें लगी हुई हैं, जिससे यह अन्य मार्गों से अलग जान पड़ता है।
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अयोध्या में विभिन्न देशों के व्यवसायी आते हैं और व्यवसाय करते हैं। यहां ऊंचे-ऊंचे भवन बने हैं जो इस नगर के वैभव को बढ़ाते हैं। भवनों पर सोने का पानी चढ़ाया हुआ है। यहां कई नाट्य समितियां हैं, जिनमें केवल स्त्रियां ही नृत्य एवं अभिनय करती हैं। नगर में चारों ओर उद्यान तथा आम के बगीचे हैं।
नगर की रक्षा के लिए चतुर शिल्पियों द्वारा बनाए हुए सब प्रकार के यंत्र और शस्त्र रखे हुए हैं। नगर के चारों ओर गहरी खाई खुदी हुई है जिसमें प्रवेश करना या उसे लांघना अत्यंत कठिन है। नगर उपयोगी पशुओं से भी भरी पूरी हैं। यहां का पानी गन्ने के रस के समान मीठा है। अयोध्या में रहने वाले सभी नागरिक धनवान हैं। कोई भी अभावग्रस्त या गरीब नहीं हैं।
स्वाभाविक है भगवान राम के समय में महर्षि वाल्मिकी अयोध्या का जो वैभव देख रहे थे, रामायण में उसी वैभव का वर्णन किया है। महाभारत काल तक अयोध्या का यह वैभव शायद बना रहा है और कोशल महाजनपद के रूप में अस्तित्व भी।
कालांतर में भी अयोध्या भले ही अपने पौराणिक स्वरूप जैसी दिव्य और भव्य न रही हो लेकिन उसका अस्तित्व तीर्थ नगरी के रूप में सदैव बना रहा। राम के उपासकों के मन में अयोध्या जी का वही दिव्य और भव्य स्वरुप सदा बना रहा जो रामायण में महर्षि वाल्मिकी ने वर्णन किया है।
अंतस में अपार पीड़ा समेटे अयोध्या का पुनर्निर्माण
लेकिन लंबे समय तक उत्तर भारत पर इस्लामिक आक्रमण, ब्रिटिश हुकूमत और लगभग साठ साल की सेकुलर राजनीति ने अयोध्या जी को बहुत अधिक पीड़ित किया। उनकी उपेक्षा की और उसके पौराणिक महत्व को निरस्त करके उसे एक सामान्य नगर वाली सुविधा से वंचित रखा। बीते साठ सत्तर सालों से तो अयोध्या रामजन्मभूमि पर बनी बाबरी मस्जिद के कारण ही पहचानी गयी।
किसी काल में अपनी दिव्यता और भव्यता से मनुष्य को चकाचौंध करनेवाली अयोध्या के अंतस में इतनी अपार पीड़ा गहराती चली गयी कि अयोध्या नगरी उदास हो गयी।
अस्सी के दशक से रामजन्मभूमि आंदोलन के कारण उदास अयोध्या के प्रति राजनीतिक उदासीनता इतनी गहरी हो गयी कि इसे कर्फ्यू वाला शहर बना दिया गया। जिन राम के पुण्य प्रताप से अयोध्या अजर अमर हैं वह अयोध्या एक धूल धूसरित कस्बा बनकर रह गया जहां सामान्य नागरिक सुविधाओं का भी घोर अभाव था। लेकिन धीरे धीरे समय बदला। 2014 के बाद देश की राजनीति में ही परिवर्तन नहीं हुआ अयोध्या जी के भाग्य का सूर्य भी चमका।
पहले देश में मोदी और फिर उत्तर प्रदेश में योगी के शासन ने अयोध्या में न सिर्फ रामजन्मभूमि विवाद को त्वरित गति से निपटारा करवाया बल्कि अयोध्या को उसका दिव्य और भव्य स्वरूप देने का महा अभियान भी शुरु किया।
अयोध्या में श्रीरामजन्मभूमि पर मंदिर निर्माण के साथ साथ इस समय अयोध्या के पुनर्निमाण का यज्ञ चल रहा है। इसी कड़ी में हर साल अयोध्या में होनेवाला दीपोत्सव एक आकर्षण बनकर लोगों के सामने आया है जिसमें इस वर्ष प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भी शामिल हुए हैं।
इसके साथ ही अयोध्या जी में हर प्रकार की आधुनिक नगरीय सुविधाओं के विकास का काम भी चल रहा है ताकि भविष्य में जब भक्त रामलला के दर्शन करने आयें तो दिव्य भव्य अयोध्या जी का भी दर्शन पायें।
भविष्य में जो भक्त यहां आयेंगे वो इस बात को महसूस कर पायेंगे कि अयोध्या जी के अस्तित्व को चुनौती देनेवाले मिट गये लेकिन अजर, अमर अयोध्या जी वैवश्वत मन्वंतर तक सरयू के किनारे यूं ही विद्यमान रहेगी।
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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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