Significance of Deepawali: किसके लिए और क्यों जलाएं दीपावली पर दीप?
Significance of Deepawali: भारतरत्न डॉ. पांडुरंग वामन काणे के 'धर्मशास्त्र का इतिहास' के अनुसार दीपों के उत्सव (दीपावली) को सम्पूर्ण भारत में मान्यता प्राप्त है किन्तु इसके कृत्य विभिन्न प्रकार से विभिन्न युगों एवं विभिन्न प्रान्तों में सम्पादित होते रहे हैं। किसी देव या देवी के सम्मान में किया गया यह केवल एक उत्सव नहीं है, जैसे श्रीकृष्ण-जन्माष्टमी या नवरात्र हैं।

यह चार या पांच दिनों तक चलता है और इसमें कई पृथक्-पृथक् कृत्य हैं। दीपावली के दिवस तीन ही हैं। इसे अधिक ग्रन्थों में 'दीपावली' और कहीं-कहीं 'दीपालिका' (भविष्योत्तरपुराण, 140) संज्ञा दी हुई है।
यदि इस उत्सव के किसी एक कृत्य पर बल दिया जाता है तो उसे 'सुखरात्रि' (राजमार्तण्ड एवं कालविवेक), यक्षरात्रि (वात्स्यायन - कामसूत्र 1/4/42), सुखसुप्तिका (व्रतप्रकाश, हेमाद्रि) की संज्ञाएं भी प्राप्त हो गईं। प्रो. पी.के. गोडे ने दीपावली उत्सव की प्राचीनता पर विद्वत्तापूर्ण प्रकाश डाला है।
सभी बातों के संयोग से दीपावली लगभग 5 दिनों तक चलती रहती है। इसमें पांच दिनों तक पांच कृत्य होते हैं, यथा - धन-पूजा, नरकासुर पर विष्णु-विजय का उत्सव, लक्ष्मी-पूजा, बलि पर विष्णु की विजय का उत्सव एवं भाई-बहिन-प्यार के आदान-प्रदान का उत्सव।
कार्तिक के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी से ही पांच दिनों तक दीप-प्रकाश एवं पटाखों के छोड़ने के कृत्य होते रहते हैं। त्रयोदशी को 'धनतेरस' कहा जाता है। चतुर्दशी से लेकर चार दिनों के उत्सव का वर्णन भविष्योत्तरपुराण में विस्तार के साथ दिया हुआ है।
दीपावली है यक्षरात्रि
दीपावली के सुखरात्रि, यक्षरात्रि तथा सुखसुप्तिका जैसे पौराणिक नाम हैं। दीपावली उत्सव पुराणों, धर्मसूत्रों, कल्पसूत्रों में विस्तृत रूप से पाया जाता है किंतु आश्चर्य की बात है कि कामसूत्र में दीपावली का कोई जिक्र न होकर 'यक्ष-रात्रि' का उल्लेख हुआ है। यक्ष-रात्रि से यही अनुमान लगाया जाता है कि उस समय इस दिन यक्ष पूजा होती थी।
दूसरी व्याख्या से लक्ष्मी पूजा की रात्रि अर्थ भी निष्पन्न हो जाता है। प्राचीन काल में शायद दीपावली उत्सव शास्त्रीय या धार्मिक विधि रूप में नहीं मनाया जाता रहा है क्योंकि वेदों और ब्राह्मण ग्रंथों में दीपावली का कोई उल्लेख नहीं है। पद्मपुराण और स्कंदपुराण में दीपावली का वर्णन है। उसी के आधार पर दीपावली उत्सव का प्रचलन अब तक है।
कार्तिक की अमावस्या के साथ 'यक्ष' शब्द जोड़ने का तात्पर्य 'श्रीसूक्त' से स्पष्ट होता है, जो ऋग्वेद के परिशिष्ट भाग का एक सूक्त है। इस सूक्त के एक मंत्र में 'मणिना सह' शब्द का प्रयोग है। इस मणि का संबंध 'मणिभद्र यज्ञ' से है, जिसका यक्षों से संबंध होने से कामसूत्र के काल तक दीपावली की रात यक्षरात्रि कहलाती है।
नन्हा-सा दीप, दीप नहीं भगवती महालक्ष्मी का मुख है
कार्तिक के बीचों-बीच दीपावली आई तो अपावन अंधेरी अमावस्या प्राण और चेतना के उजाले से जगमगा उठी। हर साल दीपावली तरह-तरह के सुखद समाचार लेकर आती है। खेत-खलिहान, बाग-बगीचे और राह-डगर में पसरे अंधेरे-उजाले के बीच चैतन्य सेतु बनाती दीपावली का आना सनातन परिपाटी है, जो पुराकाल में शुरू हुई होगी। यह तेज, दीप्ति, द्युति, कांति, प्रकाश और प्रभा के मनोभावों का पर्व है।
दीपावली विलास और मादकता की अंधेरी लंका को मिटाने वाले श्रीराम की अयोध्या नगरी जैसी प्रकाशित है। दीपावली की रात घोर अंधेरे के बीच प्रकाश की शक्ति सगर्व सिर उठाकर फूट पड़ती है तो देखते ही लगता है कि एक नन्हें से अग्निगर्भ दीप ने आसपास के सारे अंधकार को पराजित कर दिया। उसने अज्ञान के तमस को हरा दिया।
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यह नन्हा-सा दीप, दीप नहीं भगवती महालक्ष्मी का मुख है। आश्चर्य है कि यह दीप अपनी चोटी में अग्नि बांधकर कैसे धरती पर उतरा होगा! कब इसने धरती को पहले-पहल अपनी आभा से आच्छादित किया होगा!
जब सूर्य, चंद्रमा और तारे अस्त हो जाते हैं तो मनुष्य दीप के सहारे बचा रहता है। सूर्य और चंद्रमा ने अस्त होते-होते संसार को अंधेरे से बचाने के लिए अपनी किरणें दीप को दे दी। तभी तो तिमिर को चुनौती देता हुआ दीप ललकार कर अंधेरे से कहता है, 'अरे अंधकार, तू संसार को ढकने का साहस मत कर। सूर्य और चंद्रमा यदि अस्त हो भी गए तो क्या हुआ? क्या तू मुझे नहीं देख रहा, जो अपनी किरणों की लहरों से आकाश को परिप्लुत कर रहा हूं।' इतना कहकर वह पुरुषार्थी दीप अंधियारे की पांत को पीकर उसे काजल के रूप में उगलकर अपनी विजय पताका फहरा देता है।
राम नाम 'मणि दीप'
जगमगाते दीप देवोपम भूमिका निभाते हैं। देहरी पर धरा दीप भीतर और बाहर, दोनों ओर उजियारा करता है। गोस्वामी तुलसीदास भगवान श्रीराम के नाम को 'मणि दीप' कहते हैं, जिसे जपने से अंदर और बाहर, दोनों ओर उजाला होता है।
शास्त्र दीप को निर्जीव नहीं, वरन देवता मानते हैं - भो दीप देवरूपस्त्वम्...। दीप के देवता में परिवर्तित हो जाने का एक सुंदर इतिहास है। धार्मिक विधि में दीप का साक्ष्य होना जरूरी है। उससे आरती और अनुष्ठान पूरे होते हैं।
पुराकाल में अग्नि को बचाए रखने के तमाम उपायों में दीप सबसे आसान तरीका था। जब अग्नि की जरूरत पड़ती तो बाती से बाती मिला दी जाती थी। ऐसे में वह सहारा था जीवन का और सारे लौकिक व्यवहारों का।
वेदभाष्यकार महर्षि यास्क के अनुसार 'भरत' का अर्थ आदित्य है और उससे उत्पन्न प्रजा 'भारती' है। इस प्रकार भारत शब्द का सही और सच्चा अर्थ है सूर्य संतान। तात्पर्य है कि भारत का मतलब प्रकाशमय है।
दीपावली के दिन और रात, दोनों सुंदर हैं। पर वह शोभा रात में पाती है, जब रोशनी की प्रजा के रूप में नन्हें-नन्हें दीप उतरते हैं। इन दीपों की चमकती स्वर्ण आभा-सी लौ अंधेरे को चीरकर प्रकाश की विजय पताका फहराती है।
इस नाते परंपरा का अलौकिक बोध 'तमसो मा ज्योतिर्गमय' यानी अंधेरे से लड़ने की प्रेरणा है। अंधेरा अनादि है, जो प्रकाश से भले पुराना है पर अनंत नहीं है। क्योंकि उसका विनाश होता है। अंधेरा अज्ञान है, जो ज्ञानरूपी प्रकाश से हार जाता है।
दैवीय शक्ति का प्रतीक है दीप
प्रश्न है कि दीप क्यों व किसके लिए जलाएं? कभी लगता है कि मौजूदा काले व कपटी परिवेश में माता लक्ष्मी का आवाहन और पूजन करना बेतुका है। वैदिक संस्कृति ने जिस लक्ष्मी को दीपावली की तामसी रात में पूजा, वह बैंकों में कैद धनरूपी लक्ष्मी नहीं थी।
ऋषियों का तात्पर्य उस लक्ष्मी से था, जो अमृत और चंद्रमा की बहन, समुद्र की पुत्री और भगवान नारायण की प्रिया है।
वेद कहते हैं कि माता लक्ष्मी सुखी दाम्पत्य, स्वादिष्ट अन्न, लहलहाती फसल तथा गौ माता से जुड़ी है। इसलिए यह मानकर लक्ष्मी की आराधना होनी चाहिए कि लक्ष्मी का संबंध धन से नहीं वरन चरित्र और धन की पवित्रता से है।
लक्ष्मी अशुद्ध, अपवित्र और अप्राकृतिक से कभी नहीं जुड़ती है। जिसका आस्वादन-भोजन अशुद्ध है, जिसकी भाषा-वाणी अपवित्र है, जिसका संस्कार-विहार अप्राकृतिक है, वह लक्ष्मी का आशीर्वाद कैसे प्राप्त कर सकता है? सच्ची और स्थाई लक्ष्मी वही है जो शील और मर्यादा से पायी जाए।
आचार्य कुबेरनाथ राय 'मराल' में लिखते हैं, 'धरती की बेटी माता सीता के सगे भाई हैं ये दीप। इन दीपों से हमारा गहरा पारिवारिक रिश्ता है। हमारे अपने हाथों से बनाये दीप जब जलने लगते हैं तो देवताओं का तारामंडल फीका पड़ जाता है। सारे अपशकुन तथा सारी अशुभ शक्तियां मनुष्यकृत प्रकाश के सामने नतमस्तक हो अपनी हार मान लेती हैं। दीपावली मनुष्य के लिए गौरव बोध का पर्व है।'
पादुका-प्रशासन का मुक्ति पर्व
जनश्रुति है कि दीपावली के दिन भगवान श्रीराम 14 वर्षों का वनवास पूरा कर अयोध्या लौटे थे। श्रीराम के लौटते ही दीपावली अयोध्या में पादुका-प्रशासन का मुक्ति पर्व बनी। अयोध्यावासियों ने माना कि पादुका-प्रशासन के दिन लद गए। असली राजा राम और रानी सीता वनवास पूरा कर अयोध्या लौट आए हैं। पादुकाओं की जगह अब श्रीराम राजा होंगे। तभी से राम राज्य की शुरूआत के प्रतीक के रूप में दीपावली पर दीप जलाए जा रहे हैं।
राम राज्य की दीपावली शोषणमुक्त समाज की सच्ची प्रतीक है। उसका संदेश व्यक्ति में भीतर बैठे 'रावण' को मारकर वहां 'राम' को जगाना है।
प्रकाश की किरणें हर साल चेताने आती हैं कि मन की लंका को मारकर वहां अयोध्या बनाओ। जहां बहुत धन-धान्य है, वहां धर्म का गला घुटने लगता है। आज हमारे शहरों के हालात ऐसे ही हैं।
यह अच्छा है कि श्रीराम की अयोध्या उनके वनवास के 14 सालों में बदली नहीं वरना उसे देखकर श्रीराम की आंखें नम हो जाती। वे अपनी अयोध्या को ही नहीं पहचान पाते। लेकिन अयोध्या में चहुं ओर प्रकाश ही प्रकाश था। अंधेरे के लिए कहीं कोई गुंजाइश नहीं थी। क्या राम की दीपावली की किरणें आज के दीप किरणों से मेल खा रही हैं?
पापाचार दीपावली की किरणों को अयोध्या से दूर कर रहा है। अगर समाज का एक वर्ग समृद्धि से अछूता रह गया तो फिर इस दीवाली को राम कैसे पहचानेंगे? दीवाली अंधेरे पर उजाले की जीत का पर्व तो है पर साथ में यह उजाले के आपसी संबंधों के अवलोकन का पर्व भी है। कहीं ऐसा न हो कि किसी का उजाला किसी के अंधेरे पर पनप रहा हो! यदि ऐसा है तो वनवास से लौटे राम सरयू में अपने पांव धोए बिना कहीं फिर से दूसरे वनवास में न चले जाएं। तब बिना राम के कैसी दीपावली और कैसे दीप?
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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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