Play Store Apps: गूगल प्ले स्टोर की मनमानी, भारतीय कंपनियों की बढ़ी परेशानी
Play Store Apps: गूगल का अपने प्ले स्टोर से एप्स हटाना बार-बार की जाने वाली हरकत है। यह बात अलग है कि हर बार बहाने या वजह अलग-अलग हो सकती है। इस माह की शुरुआत में भी उसने अपने 'अधिकार' का उपयोग करते हुए, भारतीय कंपनियों के 140 एप्स प्लेस्टोर से हटा दिए थे।
जिन एप्स को हटाया गया था, उनमें भारत मैट्रिमनी, नौकरी, कुकू एफएम, अनएकेडेमी, एल्टबालाजी, क्वैक-क्वैक, 99 एकड़ जैसी करोड़ों के यूजरबेस वाली करीब एक दर्जन स्टार्टअप्स के एप्स भी शामिल थीं, जिनकी गिनती भारत की टेक दिग्गजों में होती है।

मोबाइल प्ले स्टोर से इतनी बड़ी संख्या में एप्स का हटाया जाना कोई सामान्य बात नहीं थी। इसलिए अलायंस ऑफ डिजिटल इंडिया फाउंडेशन (एडीआईएफ) ने इसकी शिकायत भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग (सीसीआई) से की। सरकार ने मध्यस्थता करते हुए गूगल को निर्देश दिया कि पहले वह हटाये गए एप्स को प्ले स्टोर पर बहाल करे, बाकी का मसला बाद में बातचीत के जरिए हल किया जा सकता है। सरकार ने उस वक्त यह भी स्पष्ट किया था कि गूगल को इस तरह की डिलिस्टिंग की इजाजत नहीं दी जा सकती। इस सख्ती का ही नतीजा था कि गूगल को इन एप्स की एक मार्च से पहले की स्थिति बहाल करने पर मजबूर होना पड़ा।
निलंबन और सशर्त बहाली के इस पूरे घटनाक्रम के बीच जो तस्वीर सामने आई, वह बताती है कि प्रौद्योगिकी प्रगति की दृष्टि से भले ही हम कितना ही आधुनिक हो गए हों, लेकिन व्यावसायिक प्रतिस्पर्द्धा में हमारी चुनौतियॉं और तौर-तरीकों में बहुत ज्यादा बदलाव नहीं आया है। एडीआईएफ ने भी अपनी शिकायत में गूगल पर यही आरोप लगाया है कि उसने प्रतियोगिता खत्म करने के उद्देश्य से इन एप्स को हटाया था।
हालांकि गूगल का पक्ष कुछ और ही है। उसका पक्ष यह है कि ये कंपनियॉं सर्विस चार्ज के भुगतान संबंधी नीतियों का उल्लंघन कर रही थीं। ये नीतियॉं प्लेस्टोर के जरिये अपनी सेवाएं या उत्पाद बेचने वाली कंपनियों को इन-एप्स परचेज के लिए वैकल्पिक भुगतान माध्यमों का उपयोग करने की अनुमति नहीं देतीं। प्लेस्टोर के पेमेंट सिस्टम का इस्तेमाल करने के लिए गूगल 11 से 26 प्रतिशत सेवा शुल्क की मांग करती है। इसे अदा करने से बचने के लिए कई कंपनियॉं अपने यूजर्स को दूसरे पेमेंट गेटवे उपलब्ध कराने लगती हैं।
वास्तविक दुनिया में यह एक सामान्य सी बात लग सकती है कि कोई अपना स्टोर खोलता है और उसमें उन्हीं कंपनियों का सामान बेचता है, जो उसकी शर्तों से सहमत होती हैं। जो नहीं होतीं, उनके सामने ऐसे कई विकल्प होते हैं, जिनके माध्यम से वे अपना सामान बेच सकें। लेकिन, डिजिटल दुनिया इस मायने में काफी अलग है। यहॉं करोड़ों की तादाद में एप्स मौजूद हैं। लेकिन, एंड्रॉयड या आईओएस जैसे लोकप्रिय और विश्वसनीय एप्स स्टोर की संख्या, एक दर्जन भी नहीं होगी। ऐसे में डेवलपर के सामने इन बड़े प्लेटफॉर्मों की शर्तें मानने के अलावा कोई चारा नहीं रह जाता। नहीं मानेंगे तो वे अपने उत्पाद या सेवाएं बेच ही नहीं पाएंगे।
इसी मजबूरी का फायदा एप्पल या गूगल जैसी कंपनियॉं उठाती हैं और शर्तें रखने व मनवाने के मामले में किसी तानाशाह की तरह व्यवहार करने लग जाती हैं। यही नहीं, कई बार वे इतने ज्यादा मनमाने ढंग से पेश आती हैं कि उत्पादों को आगे बढ़ाने को लेकर भी काफी भेदभाव बरतने लग जाती हैं। इसे आप इस तरह से समझ सकते हैं कि आप किसी एप्स स्टोर पर अपनी पसंद की कोई एप इंस्टॉल करने के लिए उसका नाम सर्च में डालते हैं और आपके सामने उसके बजाए, उसके जैसी दूसरी कुछ एप्स आ जाती हैं। यह बार-बार होता है और आप उन्हीं एप्स में से किसी एक को चुनने के लिए बाध्य हो जाते हैं।
इसी पक्षपात के चलते गूगल पर एंट्री ट्रस्ट कानूनों के उल्लंघन के लिए अरबों डॉलर का जुर्माना ठोका गया है। इन दिनों भी यूरोपीय संघ डिजिटल मार्केटिंग एक्ट के अंतर्गत अमेजन, एप्पल, गूगल और मेटा जैसी दिग्गज कंपनियों की जॉंच कर रहा है, जिन पर आरोप है कि वे अपने वर्चस्व का इस्तेमाल छोटी कंपनियों के उत्पादों तक ग्राहकों की पहुँच को सीमित करने में कर रही हैं। इससे उन्हीं कंपनियों को बढ़ावा मिलता है, जिन्हें ये प्लेटफॉर्म आगे बढ़ाना चाहते हैं। प्रतिद्वंद्वी कंपनियों के उत्पादों या सेवाओं पर ग्राहक स्विच ही नहीं कर पाता।
पक्षपात के मामले में न तो एप्पल कम है और न गूगल। एप्स स्टोर की दुनिया में क्रमश: आईओएस और एंड्रॉयड के माध्यम से अपनी बादशाहत कायम रखने वाली इन कंपनियों की एप्स बाजार में साझा हिस्सेदारी 95% है। इसमें भी दिलचस्प बात यह है कि यूजरबेस के मामले में एंड्रॉयड करीब 70 से 90 फीसदी और आईओएस करीब 20 से 30 फीसदी हिस्सेदारी रखता है, जबकि कमाई के मामले में आईओएस, एंड्रॉयड से आगे है। इसलिए दोनों में अपने यूजर बेस और रेवेन्यू को बढ़ाने की होड़ लगी रहती है। इसलिए वे सेवा प्रदाताओं पर ऊलजुलूल शर्तें थोपते हैं।
प्लेटफॉर्म के इस्तेमाल के ऐवज में मनमाना सर्विस चार्ज वसूल करना भी इन्हीं शर्तों में से एक है। जिस पर भारतीय एप्स डेवलपरों को ऐतराज है। उनका तर्क है कि यह शुल्क बहुत ज्यादा है और उनके विकास में बाधक है। भारतीय उपयोगकर्ताओं की भुगतान क्षमता को अमेरिकी या यूरोपीय उपयोगकर्ताओं के समकक्ष रखने के बजाए गूगल को चाहिए कि वह क्षेत्र विशेष के हिसाब से अपनी फीस तय करे। कई कंपनियों ने इस 'एकरूपता' के खिलाफ केस भी दायर किए हुए हैं।
यह टेक कंपनियों के चयन के अधिकार का ही हनन नहीं करती, बल्कि उनके द्वारा एप्स के माध्यम से पेश की जाने वाली सेवाओं के उपयोगकर्ताओं के हितों के भी खिलाफ हैं। हर देश की आबादी की क्रय शक्ति अलग-अलग होती है। यदि भारतीय डेवलपर गूगल को ज्यादा फीस चुकाएंगे तो उसकी वसूली वे अपने ग्राहकों से ही करेंगे। इससे उनकी सेवाओं के लिए ग्राहकों को ज्यादा कीमत चुकानी होगी।
उन्हें इससे बचाने के लिए कंपनियॉं चाहती हैं कि सरकार गूगल को थर्ड पार्टी बिलिंग सिस्टम की इजाजत देने के लिए बाध्य करे, जबकि गूगल कहती है कि वह अपने यूजर्स की सुरक्षा को लेकर बहुत गंभीर है और अपने इन-हाउस पेमेंट सिस्टम के अलावा किसी पर भरोसा नहीं कर सकती। लेकिन, जब वह लाखों-करोड़ों का यूजर बेस रखने वाले किसी एप्स को डिलिस्ट करती है तो क्या उसे इस बात का ख्याल नहीं आता कि वह उन्हें उस एप्स के इस्तेमाल के अधिकार से वंचित कर रही है, जिसकी सेवाएं उन्होंने पैसा देकर खरीदी हैं? और जब वह पहले ही दक्षिण कोरिया जैसे देश में थर्डपार्टी पेमेंट गेटवे की इजाजत दे रही है तो भारत में ऐसा करने में उसे हेठी क्यों महसूस हो रही है?
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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