परमाणु और अंतरिक्ष विज्ञान में 75 वर्षों की गौरवपूर्ण उपलब्धियां
महात्मा गाँधी ने 13 मार्च 1925 को त्रिवेंद्रम स्थित महाराजा कॉलेज में छात्रों को संबोधित करते हुए कहा था, "मैं चाहूँगा कि हमारे अपने देश में जो दो महान वैज्ञानिक हुए हैं, उन्हें आप सामने रखें। ये दोनों है डॉक्टर जगदीश चन्द्र बोस तथा डॉक्टर प्रफुल्लचन्द्र राय। कम-से-कम विज्ञान के छात्रों के लिए ये जाने-माने नाम हैं। मेरा विश्वास है कि समस्त शिक्षित भारत के लिए ये नाम सुपरिचित हैं। इन दोनों ने विज्ञान के लिए विज्ञान का उद्देश्य निश्चित किया और हम जानते है कि उनकी क्या उपलब्धियां है। उन्होंने यह कभी नहीं सोचा कि विज्ञान पढ़कर उन्हें धन या यश के रूप में क्या मिलेगा।"

जब भारत 15 अगस्त 1947 को स्वाधीन हुआ तब भी भारत के वैज्ञानिकों में यही अवधारणा कायम थी। उन्होंने विपरीत स्थितियों जैसे विभाजन, गरीबी, सीमित तकनीकी संसाधन, शीत युद्ध, पैसे की कमी इत्यादि के बावजूद भी भारत को विज्ञान के क्षेत्र में उपलब्धियां दिलाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। उस दौर में उन्हें देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू का हरसंभव सहयोग और समर्थन मिला।
प्रधानमंत्री नेहरू न सिर्फ विज्ञान की महत्ता को समझते थे बल्कि उसके संवर्धन में हमेशा ही एक कदम आगे बढ़कर सहयोग करते थे। वे कम-से-कम इस मामले में जल्दी निराश नहीं होते थे। जिसका एक उदाहरण उनके द्वारा 29 फरवरी 1948 को तत्कालीन केंद्रीय रक्षा मंत्री बलदेव सिंह को लिखे एक पत्र से मिलता है। वे लिखते हैं, "मेरी अभी डॉ. होमी भाभा से बातचीत हुई है। उन्होंने मुझे परमाणु ऊर्जा अनुसंधान पर एक विस्तृत रिपोर्ट दी है। मेरी इसमें बहुत रूचि है और मुझे यकीन है कि हमें गंभीरता से इस दिशा में कदम बढ़ाने शुरू कर देने चाहिए। हालाँकि, इससे तुरंत कोई नतीजा नहीं निकलेगा लेकिन भविष्य उनका होगा जो परमाणु ऊर्जा पैदा करने में सक्षम होंगे।"
यहाँ से स्वाधीन भारत का पहला वैज्ञानिक अनुसंधान शुरू हुआ जिसका नेतृत्व डॉ. होमी जहाँगीर भाभा के हाथों में था। इसी दौरान, केंद्रीय उद्योग एवं रसद आपूर्ति मंत्री, डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने प्रधानमंत्री नेहरू को 30 जुलाई 1948 को विश्वविद्यालयों एवं शोध संस्थानों में विज्ञान से जुड़े कर्मियों को भी सहायता देने का सुझाव दिया। प्रधानमंत्री नेहरू ने अगले दिन जवाब भेजकर सहमति जताते हुए कहा, "यह जरुरी है कि हमें वैज्ञानिक श्रम-शक्ति को बेहतर और अच्छे कार्यों के लिए अवसर पैदा करने चाहिए।"
देश को विज्ञान, प्रोद्योगिकी और नवाचार के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाने के प्रयासों की इस श्रृंखला में डॉ. भाभा के साथ डा. शांति स्वरूप भटनागर भी जुड़ गए। रसायन विज्ञान में अहम् योगदान निभाने वाले डॉ. भटनागर को वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान परिषद (सीएसआईआर) का प्रथम महा-निदेशक बनाया गया। उन्हें भारत में शोध प्रयोगशालाओं का जनक भी कहा जाता है।
4 जनवरी 1955 को बडौदा (अब बडोदरा) में आयोजित 42वीं इंडियन साइंस कांग्रेस में प्रधानमंत्री नेहरू ने डॉ. भटनागर के संस्मरण में जो बातें कही, वे अपने आप में उनके कार्यों की बेहतरीन समीक्षा है, "मेरे हमेशा से ही साइंस कांग्रेस से जुड़े प्रमुख व्यक्तियों के साथ घनिष्ठ संपर्क रहे हैं और उनमें सबसे पहला नाम एस.एस. भटनागर का था।...... डॉ. भटनागर कई चीजों का एक विशेष संयोजन थे, जिनमें उत्साह के साथ लक्ष्य को हासिल करने की जबरदस्त ऊर्जा थी। इसका परिणाम यह हुआ कि उन्होंने उपलब्धि का एक ऐसा कीर्तिमान बना दिया जो वास्तव में उल्लेखनीय है। डॉ. भटनागर के लिए, मैं सच कह सकता हूं कि उनके बिना आप आज भारत में राष्ट्रीय प्रयोगशालाओं की श्रृंखला नहीं देख सकते थे।"
वर्तमान में, सीएसआईआर 39 अत्याधुनिक संस्थान का ऐसा समूह बन गया है, जिसकी गिनती विश्व के अग्रणी वैज्ञानिक तथा औद्योगिक अनुसंधान संगठनों में होती है। साल 2021 में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने सीएसआईआर सोसायटी की बैठक को संबोधित कर वैज्ञानिकों की सराहना करते हुए कहा, "हमारे देश में विज्ञान, समाज और उद्योग को एक ही धरातल पर रखने के लिए सीएसआईआर एक संस्थागत व्यवस्था के रूप में कार्य करता है। हमारी इस संस्था ने देश को शांति स्वरूप भटनागर जैसी अनेक प्रतिभाएं और वैज्ञानिक दिए हैं जिन्होंने इस संस्था को नेतृत्व प्रदान किया।"
उधर, डॉ. भाभा की महत्वाकांक्षी योजना भी समय के साथ कीर्तिमान स्थापित करने लगी है। अप्रैल 2015 से मार्च 2020 के दौरान भारत में परमाणु ऊर्जा का कुल उत्पादन 200078 GWh रहा। वर्ष 2019-20 में देश में उत्पन्न कुल बिजली में परमाणु ऊर्जा उत्पादन का हिस्सा लगभग 3.3% था। यही नहीं, केंद्र सरकार अब परमाणु ऊर्जा क्षमता बढ़ाने के लिए प्रयासरत है। इसलिए निर्माणाधीन परियोजनाओं के पूरा होने पर 6780 मेगावाट की मौजूदा परमाणु ऊर्जा क्षमता को 2031 तक बढ़ाकर 22480 मेगावाट करने का प्रस्ताव बनाया गया है।
विगत वर्षों में परमाणु तकनीक का वैज्ञानिक प्रयोग भारत की रक्षा क्षमताओं को बढ़ाने में भी किया जाने लगा था। इसका श्रेय प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी को जाता है जिन्होंने अपने कार्यकाल में भारत के परमाणु कार्यक्रम को बिना किसी रूकावट के जारी रखने का वादा किया था। नतीजतन, 1998 में भारत उन चुनिंदा देशों में शामिल हो गया जिनके पास परमाणु रक्षा हथियार थे।
तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने भारतीय वैज्ञानिकों की इस अभूतपूर्व उपलब्धि पर संसद को संबोधित करते हुए कहा था कि, "भारत एक परमाणु संपन्न देश है। यह एक वास्तविकता है, जिससे इंकार नहीं किया जा सकता। यह ऐसी कोई प्रद्दत चीज नहीं है, जिसे हम चाहते हैं और न ही कोई ओहदा है, जो दूसरे हमें दे। यह तो हमारे वैज्ञानिकों तथा इंजीनियरों द्वारा प्रद्दत राष्ट्रीय धरोहर है। यह विश्व की आबादी के छटवें भागवाले इस भारत का अधिकार है।"
डॉ. भाभा के दौर में ही, जब एक तरफ परमाणु ऊर्जा अनुसंधान अपने शुरूआती चरणों में था, तभी 1959 में रूस ने स्पुतनिक उपग्रह का अंतरिक्ष में प्रक्षेपण कर दिया। डॉ. भाभा को जल्दी ही यह समझ आ गया कि अनुसंधान के लिए अब अंतरिक्ष एक महत्वपूर्ण क्षेत्र बन जायेगा। वर्ष 1963 में स्पेस फिजिक्स की पहली संगोष्ठी में उन्होंने भारत के अंतरिक्ष कार्यकम को शुरू करने के प्रयासों पर जोर देते हुए कहा, "अगर हमने यह काम आज नहीं किया, बाद में हमें दूसरे देशों से अधिक कीमत पर जानकारी लेने के लिए निर्भर होना पड़ेगा।"
अतः अंतरिक्ष अनुसंधान के सुचारू रूप से संचालन के लिए 1962 में ही इंडियन नेशनल कमिटी फॉर स्पेस रिसर्च (INCOSPAR) की स्थापना हो गयी थी जिसे 1969 में भारतीय अन्तरिक्ष अनुसन्धान संगठन (इसरो) में परिवर्तित कर दिया गया। हालाँकि, वर्ष 1963 में ही डॉ. विक्रम साराभाई के नेतृत्व में केरल के थुम्बा गाँव से एक साउडिंग रॉकेट का प्रक्षेपण कर भारत ने अपने अंतरिक्ष कार्यक्रम की शुरुआत कर दी थी। दुर्भाग्यवश, इस विचार को आधारभूत हकीकत में बदलने से पहले डॉ. भाभा का 24 जनवरी 1966 को निधन हो गया।
अमेरिका को भारत के परमाणु कार्यक्रमों को लेकर बेहद नाराजगी एवं चिंता सताती रहती थी। इसलिए डॉ. होमी जहाँगीर भाभा के निधन को लेकर आशंका व्यक्त की जाती है कि अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए ने उनकी हत्या करवाई थी। वे जिस एयर इंडिया के विमान में सवार होकर एक कॉन्फ्रेंस में हिस्सा लेने वियना जा रहे थे, वह मॉन्ट ब्लां के निकट अचानक से दुर्घटनाग्रस्त हो गया था। कुछ जांच-पड़तालों के अनुसार इस विमान के कार्गो में बम होने की पुष्टि की गयी है जिसके फटने से डॉ. भाभा सहित विमान में सवार सभी 117 लोगों की मौत हो गई थी। फिर वर्ष 1971 में डॉ. साराभाई का भी देहांत हो गया।
इन दो महान वैज्ञानिकों के निधन से भारतीय वैज्ञानिक अनुसंधानों को एक गहरा धक्का जरुर लगा लेकिन अगली पीढ़ी के वैज्ञानिकों जैसे प्रो. सतीश धवन, डॉ. ब्रह्मा प्रकाश, और डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम ने मोर्चा आसानी से संभाल लिया। इसरो पहले से ही आर्यभट्ट और भास्कर जैसे उपग्रहों को अंतरिक्ष में भेज अपना हौसला कायम कर चुका था। अतः भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम को पहली विशेष उपलब्धि 18 जुलाई 1980 को मिली जब श्रीहरिकोटा से उपग्रह प्रमोचन यान-3 (एसएलवी-3) के सफल प्रमोचन द्वारा रोहिणी उपग्रह आरएस-1 को अंतरिक्ष कक्षा में स्थापित किया गया। इसी के साथ भारत अंतरिक्ष क्षमता वाले राष्ट्रों के गुट का 6वां सदस्य बन गया।
इसरो के अनुसार, "एसएलवी -3 परियोजना ने सफलताओं की पराकाष्ठा हासिल की और उससे संवर्धित उपग्रह प्रमोचन यान (एएसएलवी), ध्रुवीय उपग्रह प्रमोचन यान (पीएसएलवी) तथा भू-तुल्यकाली उपग्रह प्रमोचन यान (जीएसएलवी) जैसे उन्नत प्रमोचन वाहनों की परियोजनाओं का मार्ग प्रशस्त हुआ।"
इस परियोजना से जुड़े डॉ. कलाम अपनी पुस्तक, 'विंग्स ऑफ़ फायर : एन ऑटोबायोग्राफी' में लिखते है, "एसएलवी - 3 उड़ान को सफल बनाने का पहला श्रेय अंतरिक्ष कार्यक्रम के पितामह प्रो. विक्रम साराभाई को जाता है, जिन्होंने इसके लिए कोशिश शुरू की थी। साथ ही वी. एस. एस. सी. [विक्रम साराभाई अंतरिक्ष केंद्र] के उन सैकड़ों साथियों को भी, जिनकी इच्छाशक्ति ने इस सफलता को साकार कर दिखाया और साथ ही प्रो. धवन एवं डॉ. ब्रह्मा प्रकाश को, जिन्होंने इस परियोजना का नेतृत्व किया।"
डॉ. कलाम ने इस सन्दर्भ में स्वयं से जुड़ा एक रोचक किस्सा भी अपनी इस आत्मकथा में साझा किया है। जोकि इस बात का परिचायक है कि भारतीय वैज्ञानिकों ने बेहद साधारण एवं सामान्य रहकर कैसे असाधारण कार्यों को सफल बनाया, "एसएलवी-3 की सफलता के महीने भर के भीतर ही मैं एक निमंत्रण पर बम्बई [अब मुंबई] के नेहरू विज्ञान केंद्र में गया। वहां मुझे एसएलवी - 3 से जुड़े अपने अनुभवों पर बोलना था। वहीं मेरे पास दिल्ली से प्रो. धवन का फ़ोन आया। उन्होंने अगली सुबह ही मुझे दिल्ली में अपने पास पहुँचने को कहा।
हमें प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी से मिलना था। नेहरू विज्ञान केंद्र के मेजबान ने मेरे दिल्ली जाने के टिकट का तो इंतजाम करा दिया था लेकिन मेरे साथ एक छोटी समस्या और भी थी। यह समस्या मेरे कपड़ों को लेकर थी। मैं रोजाना की तरह ही सादे कपड़ों और हवाई चपल्लों में था, जिनका कि मैं आज तक आदी हूँ। प्रधानमंत्री से मिलने जाने के लिए कम-से-कम एक स्तरीय कपड़े तो पहनने जरुरी थे। मैंने प्रो. धवन को इस समस्या के बारे में बताया तो उन्होंने मुझसे कहा कि कपड़ों के बारे में चिंता करने की जरुरत नहीं है। वह बोले, 'तुम तो अपनी सफलता से सजे हो'।"
इन्ही सफलताओं के क्रम में अगला पड़ाव 22 अक्टूबर 2008 को मानवरहित चंद्रयान-1 का सफल प्रक्षेपण था। इससे पहले दुनिया में मात्र 6 देश ही ऐसा कर पाए थे। इसरो ने इस अभियान के माध्यम से सदी की सबसे बड़ी खोज करते हुए दुनिया को बताया कि चंद्रमा की सतह पर पानी मौजूद है। इसके बाद, इसरो ने मंगल ग्रह के अनुसंधान के लिए 5 नवंबर 2013 को सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से मानवरहित मंगलयान को सफलतापूर्वक प्रक्षेपित किया। 24 सितंबर 2014 को मंगलयान मंगल ग्रह की सतह पर उतर गया। इसी विशेष उपलब्धि के साथ ही भारत अपने पहले प्रयास में मंगल ग्रह पर पहुँचने वाला पहला देश तथा सोवियत रूस, नासा और यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी के बाद दुनिया का चौथा देश बन गया था।
इस बीच सफलताओं के साथ-साथ कुछ असफलताए भी मिली जिसमें चंद्रमा पर अनुसंधान के लिए इसरो की एक महत्वपूर्ण योजना - चंद्रयान 2 प्रमुख है। हालाँकि, पूर्व प्रधानमंत्रियों की तरह वर्तमान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भी भारतीय वैज्ञानिकों के हौसलों को समर्थन दिया। उन्होंने राष्ट्र के नाम एक संबोधन में कहा, "ज्ञान का अगर सबसे बड़ा शिक्षक कोई है तो वो विज्ञान है। विज्ञान में विफलता कुछ नहीं होती, केवल प्रयोग और प्रयास होते हैं। हम निश्चित रूप से सफल होंगे। इस मिशन के अगले प्रयास में भी और इसके बाद के हर प्रयास में भी कामयाबी हमारे साथ होगी।"
जबकि, दिसंबर 2014 में जियो सिंक्रोनस लॉन्च व्हीकल, मार्क 3 (जीएसएलवी मार्क-3) के सफल प्रक्षेपण के साथ ही इसरो भारी यान एवं इंसानों को भी अंतरिक्ष में भेजने में सक्षम हो गया था।
अंतरिक्ष में इंसान भेजने की तकनीक फिलहाल अमेरिका, रूस और चीन के पास ही मौजूद है। जीएसएलवी मार्क 2 का सफल प्रक्षेपण भी इसरो की बड़ी उपलब्धियों में शामिल था, क्योंकि इसमें भारत में तैयार क्रयाजोनिक इंजन ही लगाया गया था। इस उपलब्धि के बाद उपग्रह लॉन्च करने के लिए अन्य देशों की सहायता की जरुरत नहीं होगी, यानि भारत पूर्ण रूप से आत्मनिर्भर बन गया है। आगामी परियोजनाओ के अंतर्गत भारत अब अंतरिक्ष में इंसानों को भेजने और शुक्र ग्रह के अनुसंधान पर काम कर रहा है।
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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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