बिहार में फिर लौट आयी “भूरा बाल साफ करो” की राजनीति
एक दिन पहले बिहार के सियासी हलकों में फिर से हलचल उठी। जैसा कुछ दिन पहले दिल्ली में तथाकथित बदलाव की राजनीति की बात करने वाली पार्टी ने किया था, कुछ वैसा ही मामला था। बिहार में भी कानून मंत्री ही अपराधी घोषित हो रहे थे। बिहार में ताजा उलट-फेर के बाद कार्तिकेय सिंह उर्फ़ मास्टर साहब कानून मंत्री बने थे।

अपने बयान में सीधे कैमरे के सामने सरकार को गालियाँ देने के लिए जाने-जाने वाले अनंत सिंह एके 47 जैसे हथियार रखने के लिए जेल में बंद है। अनंत सिंह की गैरमौजूदगी में कार्तिकेय सिंह मोकामा से पटना तक उनका "काम-काज" देखते हैं। इसलिए सुशासन बाबू नितीश कुमार जब कहते हैं कि उन्हें पता नहीं था कि कार्तिकेय सिंह पर कोई मामला है, तो वो साफ झूठ कह रहे हैं। पूरा बिहार जानता है कि कार्तिकेय सिंह कौन है।
बिहार की राजनीति में माना जाता है कि जद(यू) के ललन सिंह से जिसकी नहीं बनी, उसका पत्ता साफ हो गया। कुछ लोग मानते हैं कि अनंत सिंह के साथ यही हुआ। बिलकुल यही अनंत सिंह के करीबी कार्तिकेय सिंह के साथ हो रहा है। अब सवाल है कि इसमें "भूरा बाल साफ करो" कहाँ आता है?
ये "भूरा बाल साफ करो" कथित रूप से लालू युग, जिसे जंगलराज भी कहते हैं, उस दौर का नारा था। इसका पूरा मतलब होता था - भूमिहार, राजपूत, ब्राह्मण, लाला साफ करो। बिहार की राजनीति से "सामाजिक न्याय" के नाम पर इन जातियों को मिटाने के कैसे प्रयास हुए थे, इसे आसानी से देखा जा सकता है।
गायब उपनाम, कुमार पर समाप्त होता नाम, ये उस दौर के केवल कुछ नामी गिरामी पत्रकार के नाम में ही नहीं दिखेगा। पहले कम्युनिस्ट रहे और आजकल कांग्रेसी हो गए, बेगुसराय और जेएनयू से ताल्लुक रखने वाले एक युवा नेता का नाम देख लीजिये। वो भी कुमार पर समाप्त होता दिख जायेगा, उपनाम जिससे जाति का बोध होता, वो गायब है। ब्राह्मण-भूमिहारों में उपनाम हटाकर "वत्स", "शांडिल्य", "कश्यप" आदि गोत्र का नाम लगाया जाने लगा था। लाला समुदाय में ये "रंजन" होता हुआ सबसे आसानी से दिखेगा। ये पूरे दो दशक, उन्नीस सौ अस्सी से लेकर करीब दो हजार तक चला। तीस से चालीस तक की आयु के अपने आस पास के बिहार के पांच लोगों से भी पूछ के देख लीजिये, जो किन्हीं किताबों में नहीं लिखा गया वो "सामाजिक न्याय" आसानी से दिखने लगेगा।
अब आप सोचेंगे कि इसका हालिया राजनीति से क्या लेना देना? जद(यू) के ललन सिंह के बारे में माना जाता है कि उनकी आरसीपी सिंह से नहीं बनती थी। दुर्गा पूजा के दौरान मुंगेर में हुए गोली कांड में किशोर वय के पोद्दार युवक की पुलिस की गोली से मृत्यु के बाद वहाँ पर एसपी रही लिपी सिंह का तबादला हो गया था। उनकी पोस्टिंग जब सहरसा में थी तब वहाँ एक अपराधी पप्पू देव को पकड़ा गया। पुलिस हिरासत में ही कथित रूप से पप्पू देव को दिल का दौरा पड़ गया और अस्पताल ले जाने के क्रम में पप्पू देव की मौत हो गयी। पप्पू देव पर कई आपराधिक मामले थे और वो भूमिहार समुदाय से ही थे।
इसी घटना के बाद से आरसीपी सिंह को कड़ा राजनैतिक विरोध झेलना पड़ा। वो लिपी सिंह के पिता हैं, सत्ता में थे। भीड़ पर चली गोली में एक युवक के मारे जाने, या पुलिस हिरासत में संदिग्ध मृत्यु से उनकी बेटी पर कोई आंच नहीं आई। भूमिहार तबके के आरसीपी सिंह पर भड़कने और फिर संपत्ति की लम्बी लिस्ट के बाहर आने के पीछे उनके राजनैतिक विरोधी का ही हाथ माना जाता है। आपराधिक मामलों की वजह से अनंत सिंह पहले ही निपटा दिए गए थे। उनके करीबी कार्तिकेय सिंह को भी अब जब करीब करीब राजनैतिक रूप से किनारे कर ही दिया गया है तो राजद की "भूरा बाल साफ करो" की राजनीति फिर से याद आनी ही थी।
कथित सामाजिक न्याय में किसी समुदाय को न्याय मिला या नहीं, इस पर कोई जांच, कोई सर्वेक्षण तो नहीं हुआ। हाँ ये अवश्य हुआ था कि राज्य में उद्योग-धंधों के शुरू न होने के कारण सरकारी नौकरी और पलायन ही विकल्प रहे। ये पलायन केवल रोजगार के लिए था ऐसा भी नहीं था। शिक्षा के लिए और अपहरण जैसे अपराधों से बचाने के लिए भी बिहार से किशोर-किशोरियों एवं युवाओं का पलायन हुआ।
आज बिहार में कहने को सत्रह विश्वविद्यालय अवश्य हैं, लेकिन उनमें से कितनों में समय पर परीक्षा हो पाती है, किनसे तीन वर्षों में स्नातक किया जा सकता है, ये पूछने भर से बिहार में शिक्षा की दशा का पता भी चल जाएगा। इन सबकी जड़ में केवल सामाजिक न्याय के नाम पर फैलाया गया जातिवाद रहा। बिहार की राजनीति पिछले दशकों में कभी इस जातिवाद से मुक्त नहीं हुई।
बिहार के उलट-फेर के बाद अगर मंत्रालयों का गठन देखेंगे तो राजद ने फिर से एम-वाय (मुस्लिम-यादव) गठजोड़ की अपनी राजनीति जारी रखी है। फिलहाल मंत्रिमंडल में एम-वाय समीकरण को चालीस फीसदी हिस्सा मिला है। भूमिहार तबका पहले ही मंत्रालयों की कम गिनती से नाराज चल रहा था। बिहार से रोजगार के लिए और अपराधों के भय से पलायन रुका नहीं था। इस वर्ष रेल टिकटों की बिक्री का आंकड़ा देखें तो संभावना है कि ये और बढ़ा हुआ नजर आये। यानी हम गोल घूम कर वापस वहीँ पहुँच गए हैं जहाँ से करीब तीन दशक पहले बिहार में "भूरा बाल साफ करो" के कथित "सामाजिक न्याय" की राजनीति शुरू हुई थी।
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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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