'जहां दरिया समंदर से मिला, दरिया नहीं रहता!' मोहब्बत, तमीज, तन्हाई और तसव्वुर के आखिरी शायर- बशीर बद्र

Bashir Badr Untold Story: उर्दू अदब की दुनिया में कुछ आवाजें सिर्फ सुनी नहीं जातीं, महसूस की जाती हैं। बशीर बद्र ऐसी ही एक आवाज थे। अब वह आवाज हमेशा के लिए खामोश हो गई है। 92 वर्ष की आयु में भोपाल में उनका निधन केवल एक शायर का जाना नहीं, बल्कि मोहब्बत, तहजीब और इंसानी रिश्तों की उस रवायत का टूटना है, जो धीरे-धीरे हमारे समय से गायब होती जा रही है।

वे पिछले कुछ वर्षों से डिमेंशिया से पीड़ित थे। स्मृतियां उनसे दूर जा रही थीं, लेकिन उनकी शायरी दुनिया की याददाश्त में हमेशा के लिए दर्ज हो चुकी थी। यह कमाल बहुत कम शायरों को नसीब होता है कि उनकी पंक्तियां मुशायरों से निकलकर आम आदमी की बातचीत, प्रेम-पत्रों, भाषणों और सोशल मीडिया तक पहुंच जाएं। बशीर बद्र उन्हीं विरले शायरों में थे।

bashir-badr-untold-story-urdu-poet

साल 1999। बिहार के समस्तीपुर स्थित इंद्रालय रेलवे ऑडिटोरियम की वह रात आज भी यादों में वैसे ही जगमगाती है, जैसे किसी पुराने एल्बम में सुरक्षित तस्वीर। मैं हिंदी साहित्य में डिग्री फर्स्ट ईयर का छात्र था। गीत, गजल और कविता में गहरी रुचि थी। मंच पर एक दुबला-पतला, बेहद सादा और नर्म लहजे वाला शायर आया। नाम पुकारा गया - बशीर बद्र।

उन्होंने माइक संभाला और पहला ही मतला पढ़ा-

'लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में,
तुम तरस नहीं खाते बस्तियां जलाने में।'

पूरा इंद्रालय 'इरशाद... इरशाद...' की आवाजों से गूंज उठा। उस एक शेर ने जैसे सभागार में बैठे हर व्यक्ति के भीतर कोई दरवाजा खोल दिया था। यह सिर्फ शायरी नहीं थी, समाज के लिए आईना था। उस दौर में भी यह शेर सांप्रदायिकता, हिंसा और नफरत के खिलाफ एक नैतिक प्रतिरोध जैसा लगता था। आज, इतने वर्षों बाद, यह और ज्यादा प्रासंगिक प्रतीत होता है।

बशीर बद्र की सबसे बड़ी खूबी यही थी कि वे कठिन से कठिन बात को बेहद आसान शब्दों में कह देते थे। उनकी शायरी में फारसी की जटिलता नहीं, हिंदुस्तान की गलियों की सादगी थी। वे आम आदमी के शायर थे। उनकी गजलों में मोहब्बत थी, लेकिन वह केवल आशिक-माशूक की मोहब्बत नहीं थी; उसमें इंसानियत, रिश्तों और यादों के लिए गहरी जगह थी।

करीब डेढ़ घंटे तक उस रात वे एक के बाद एक गजलें सुनाते रहे। हर शेर पर तालियां बजतीं, हर मतले पर 'वाह-वाह' उठती। लेकिन उनकी आवाज में कभी बनावट नहीं आई। वह एक ऐसे शायर की आवाज थी, जिसने जिंदगी को बहुत करीब से देखा था।

शायद यही वजह थी कि उनके अशआर सीधे दिल में उतरते थे-

'कोई हाथ भी न मिलाएगा जो गले मिलोगे तपाक से,
ये नए मिजाज का शहर है, जरा फासले से मिला करो।'

यह शेर केवल सामाजिक व्यवहार की सलाह नहीं है, बल्कि आधुनिक समय की विडंबना भी है। रिश्तों में बढ़ती दूरी, आत्मीयता का संकट और शहरी जीवन की कृत्रिमता - बशीर बद्र दो पंक्तियों में पूरा समाजशास्त्र लिख देते थे।

मुशायरे के आखिर में उन्होंने पढ़ा-

'उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो,
न जाने किस गली में जिंदगी की शाम हो जाए।'

उस समय यह शेर महज खूबसूरत लगा था। आज, उनके निधन की खबर के बीच यही पंक्तियां जैसे उनकी अपनी विदाई बन गई हैं। सचमुच, वे अपने उजाले हमारी यादों में छोड़ गए हैं।

लेकिन उस रात का सबसे गहरा असर एक और शेर ने छोड़ा था। किसी श्रोता के आग्रह पर उन्होंने पढ़ा-

'बड़े लोगों से मिलने में हमेशा फासला रखना,
जहां दरिया समंदर से मिला, दरिया नहीं रहता।'

यह शेर केवल अहंकार से सावधान रहने की सीख नहीं देता, बल्कि स्वस्तित्व-बोध का दर्शन भी रचता है। अपनी पहचान बचाए रखना, अपनी अस्मिता को भीड़ या सत्ता के सामने न खो देना - यह जीवन का गहरा सूत्र है। एक छात्र के रूप में उस रात जो बात दिल में उतरी, वह समय के साथ ध्येय-वाक्य बनती चली गई।

बशीर बद्र की शायरी में यही बात बार-बार दिखाई देती है - अपनी रूह को बचाकर रखो। वे रिश्तों के शायर थे, लेकिन आत्मसम्मान के भी शायर थे। वे मोहब्बत सिखाते थे, मगर आत्म-विलोपन नहीं।

उनका जीवन भी किसी गजल से कम नहीं था। फैजाबाद (अब अयोध्या) में जन्मे बशीर बद्र ने विभाजन का दौर देखा, दंगों का दर्द देखा, घर जलने का दुःख देखा। कहा जाता है कि मेरठ दंगों में उनका घर और उनकी लाइब्रेरी जल गई थी। इसी दर्द को उन्होंने अपनी मशहूर शायरी 'लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में...' में बयां किया। यही टीस शायद उनकी गजलों में बार-बार 'घर', 'याद', 'धुआं', 'रोशनी' और 'तन्हाई' बनकर लौटती रही। उनके शब्द किताबों से नहीं, जिंदगी की राख से निकले थे।

उनकी शायरी में दर्द था, मगर निराशा नहीं। तन्हाई थी, मगर उम्मीद भी थी। शायद इसलिए वे हर पीढ़ी के शायर बने रहे। कॉलेज के छात्र से लेकर बुजुर्ग श्रोता तक, हर कोई उनके किसी न किसी शेर में अपनी कहानी खोज लेता था।बशीर साहब की गजलों में एक अनछुआ नयापन था, कल्पना की रुमानियत थी, एक कसक थी और एक उम्मीद - ठीक इन अशआर की तरह:

'कोई फूल धूप की पत्तियों में हरे रिबन से बंधा हुआ,
वो गजल का लहजा नया-नया, न कहा हुआ, न सुना हुआ।

जिसे ले गई है अभी हवा, वो वरक था दिल की किताब का,
कहीं आंसुओं से मिटा हुआ, कहीं आंसुओं से लिखा हुआ।'

उन्होंने उर्दू शायरी को केवल अभिजात्य महफिलों तक सीमित नहीं रहने दिया। वे मंचों के सुपरस्टार थे, लेकिन उनकी लोकप्रियता का कारण सस्ती लोकप्रियता नहीं, बल्कि गहरी मानवीय संवेदना थी। उनकी गजलें हिंदुस्तान के उस साझा सांस्कृतिक चरित्र की मिसाल थीं, जहां हिंदी और उर्दू अलग भाषाएं नहीं, बल्कि एक-दूसरे की रूह लगती हैं।

आज जब समाज लगातार खांचों में बंट रहा है, तब बशीर बद्र की शायरी और ज्यादा जरूरी लगती है। वे मोहब्बत को कमजोरी नहीं, बल्कि सभ्यता का सबसे ऊंचा मूल्य मानते थे। उनका पूरा काव्य-संसार जैसे कहता था कि इंसान बचा रहेगा, तो दुनिया बची रहेगी।

'मिरे साथ तुम भी दुआ करो, यूं किसी के हक में बुरा न हो,
कहीं और हो न ये हादिसा, कोई रास्ते में जुदा न हो।

वो फिराक हो कि विसाल हो, तेरी आग महकेगी एक दिन,
वो गुलाब बन के खिलेगा क्या, जो चराग बन के जला न हो।'

आज जब बशीर बद्र इस दुनिया में नहीं हैं, तब महसूस होता है कि कुछ लोग शरीर से जाते हैं, लेकिन भाषा में हमेशा जीवित रहते हैं। वे किताबों में नहीं, लोगों की जुबान पर बस जाते हैं। बशीर बद्र ऐसे ही शायर थे।

समस्तीपुर के उस मुशायरे की रात अब यादों की धुंध में बहुत पीछे छूट चुकी है। इंद्रालय का वह मंच, 'इरशाद' की आवाजें और माइक पर खड़े बशीर बद्र साहब - सब जैसे किसी पुराने ख्वाब का हिस्सा लगते हैं। लेकिन उनके अशआर आज भी उतने ही ताजा हैं।

'उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो,
न जाने किस गली में जिंदगी की शाम हो जाए।'

वे अक्सर मुशायरों में अपना आखिरी कलाम यही रखते थे। आज अपनी यादों का बेसुमार उजाला पीछे छोड़कर बशीर बद्र साहब अनंत यात्रा पर कूच कर गए हैं। काश, हम उनसे कह पाते-

'मुसाफिर हूं मैं भी, मुसाफिर हो तुम भी,
किसी मोड़ पर फिर मुलाकात होगी।'

Bashir Badr Death Reason: बकरीद के दिन शायर बशीर बद्र का कैसे हो गया निधन? किस बीमारी से जूझ रहे थे?
Bashir Badr Death Reason: बकरीद के दिन शायर बशीर बद्र का कैसे हो गया निधन? किस बीमारी से जूझ रहे थे?
Notifications
Settings
Clear Notifications
Notifications
Use the toggle to switch on notifications
  • Block for 8 hours
  • Block for 12 hours
  • Block for 24 hours
  • Don't block
Gender
Select your Gender
  • Male
  • Female
  • Others
Age
Select your Age Range
  • Under 18
  • 18 to 25
  • 26 to 35
  • 36 to 45
  • 45 to 55
  • 55+