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यूरो को बचाने वाले द्रागी इटली को क्यों नहीं संभाल पाये

इटली के प्रधानमंत्री मारियो द्रागी

नई दिल्ली, 15 जुलाई। यूरोपीय सेंट्रल बैंक यानी ईसीबी के पूर्व प्रमुख और अब इटली के प्रधानमंत्री इटली को आर्थिक संकट से बचाने में कितने कारगर होंगे इसे लेकर सवाल उठ रहे हैं. आर्थिक संकटों का सामना कर रहे इटली को बचाने लिए द्रागी ने पुरजोर कोशिश की है और उसके कुछ अच्छे नतीजे हुए मगर ताजा संकट ज्यादा बड़ा बन कर उभरा है. 10 साल पहले की तरह निवेशक फिर पूछ रहे हैं कि क्या यूरोजोन के देश सार्वजनिक कर्ज को बढ़ाते रह सकते हैं. महामारी के दौर में यह कर्ज काफी ज्यादा बढ़ गया और महंगा भी क्योंकि यूरोपीय सेंट्रल बैंक ब्याज की दरें बढ़ाने की तैयारी में है. इस बार संकट की वजह इटली में आर्थिक विकास की कमी है. ग्रीस, पुर्तगाल, आयरलैंड और स्पेन अत्यधिक खर्चों की वजह से जिस संकट में 10 साल पहले घिर गये थे वैसे हालात नहीं है, लेकिन इटली की अस्थिरता और बढ़ गई है.

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मारियो द्रागी का इस्तीफा

गुरुवार को गठबंधन सरकार में शामिल एक पार्टी ने विश्वास मत पर द्रागी का साथ देने से इनकार किया तो द्रागी ने इस्तीफा दे दिया. हालांकि राष्ट्रपति ने उनका इस्तीफा मंजूर नहीं किया है और बुधवार को द्रागी संसद को संबोधित करेंगे. उनका भविष्य फिलहाल अधर में है. 74 साल के द्रागी को यूरोप में वीडियो गेम के सितारे सुपर मारियो का खिताब दिया जाता है. अपने लंबे करियर में उन्होंने आर्थिक संकटों को हल करने वाले के रूप में पहचान अर्जित की है. इटली के प्रधानमंत्री के रूप में 17 महीने के करियर में उन्होंने देखा है कि देश में कर्ज का खर्च किस तरह से बढ़ता जा रहा है. दो महीने पहले उन्होंने एक प्रेस कांफ्रेंस में कहा था, "यह दिखाता है कि मैं हर घटना के लिए कवच नहीं हूं. मैं भी एक इंसान हूं इसलिए कुछ चीजें होंगी."

आर्थिक क्षेत्र के दिग्गज खिलाड़ी द्रागी

इटली पर कैसा संकट

इटली पर फिलहाल 2.5 लाख करोड़ यूरो का सरकारी कर्ज है. यह चार दूसरे देशों के संयुक्त कर्ज से भी बड़ा है और इतना ज्यादा कि बेलआउट पैकेज देना भी संभव नहीं है. 10 साल पहले यूरोपीय सेंट्रल बैंक के प्रमुख के रूप में मारियो द्रागी ने बाजार को यह कह कर शांत किया था कि यूरो को बचाने के लिए "चाहे जो करना पड़े" करेंगे. यह संकेत था कि मुश्किल झेल रहे देशों के बॉन्ड जम कर खरीदे जायेंगे. यही हुआ भी.

26 जुलाई 2012 को कही उनकी बातों की गूंज आज भी सुनाई देती है, बाजार तुलनात्मक रुप से थोड़ा शांत है और उम्मीद की जा रही है कि यूरोपीय सेंट्रल बैंक कर्ज के बढ़ते खर्चों पर रोक लगायेगा. बॉन्ड खरीदने की एक नई योजना पर काम चल रहा है और इसके लिए भी बाजार की यही उम्मीदें हैं. हालांकि यह उपाय भी कुछ समय के लिए ही होगा. इटली जब तक यह भरोसा नहीं दिला देता कि वह अपने दो पैरों पर खड़ा हो सकता है तब तक यूरोपीय सेंट्रल बैंक की तरफ ही निवेशकों की नजर रहेगी. एलबीबीडब्ल्यू के प्रमुख अर्थशास्त्री मोरित्ज क्रेमर का कहना है, "असल समस्या है कि बीते दो दशकों से इटली का विकास के पैमाने पर प्रदर्शन अच्छा नहीं रहा है."

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पर्याप्त सुधार नहीं

इटली को वैश्विक आर्थिक संकट के दौरान हाउसिंग के बुलबुला फूटने जैसी स्थिति का सामना नहीं करना पड़ा और उसके बजट की समस्या भी चार दूसरे संकटग्रस्त देशों की तुलना में छोटी रही है. ऐसे में उसे ईसीबी, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष और यूरोपीय आयोग की तिकड़ी से बेलआउट पैकेज मांगने की जरूरत नहीं पड़ी. हालांकि शायद अब उसे अपने इस कदम पर अफसोस हो रहा होगा.

मारियो द्रागी ने विश्वास मत हासिल कर लिया लेकिन गठबंधन में शामिल एक पार्टी ने उनका समर्थन करने से मना कर दिया

अंतरराष्ट्रीय कर्जदाताओं की मदद और दबाव के कारण पुर्तगाल ने अपना बजट संभाल लिया, स्पेन और आयरलैंड ने अपने बैंकिंग सेक्टर को दुरूस्त कर लिया और यहां तक कि ग्रीस ने भी पेंशन सिस्टम, श्रम बाजार और प्रॉडक्ट रेग्यूलेशन को में सुधार कर लिया. इस तरह के कदमों ने इन देशों को अपना आर्थिक विकास बेहतर करने में मदद दी है.

इसके उलट इटली ने विकास में बेहतरी के लिए पर्याप्त कदम नहीं उठाये. हालांकि पेंशन सिस्टम, श्रम बाजार और द्रागी के शासन में धीमे न्याय तंत्र को सुधारने की दिशा में कुछ बदलाव हुए हैं.

इसके नतीजे में देश जो कभी संकटग्रस्त देशों में सबसे अच्छा माना जाता था वह बॉन्ड बाजार से लिए कर्जे पर सबसे ऊंची प्रीमियम चुका रहा है. उसके आगे सिर्फ ग्रीस है जिसने बीते दशक में दो बार डिफॉल्ट किया है और उसका दर्जा आज भी "जंक" का है.

कुछ दक्षिणपंथी पार्टियों की यूरो विरोधी नारेबाजी के कारण भी निवेशक किनारा कर रहे हैं. बेरेनबर्ग के अर्थशास्त्री होल्गर श्मिडिंग का कहना है, "द्रागी कोशिश कर रहे हैं, उन्होंने थोड़ा बहुत किया भी है लेकिन ना तो मैं और ना ही बाजार इस बात को लेकर अब भी निश्चिंत हो पा रहा है कि इटली में विकास का रुझान पर्याप्त रूप से मजबूत है."

द्रागी की बेबसी

ईसीबी के प्रमुख के रूप में द्रागी नियमित रूप से सरकारों के मौद्रिक और दूसरे सुधारों के महत्व पर जोर देते रहे हैं. हालांकि इटली के प्रधानमंत्री के रूप में उनका बहुत सारा समय आर्थिक नीतियों पर अलग अलग विचारों वाली पार्टियों में बीचबचाव करने में गुजर रहा है. टैक्स और पेंशन सुधार जैसे विवादित मुद्दे आये दिन उभर रहे हैं.

द्रागी यूरोपीय मंचों के एक प्रमुख खिलाड़ी बन चुके हैं और आलोचकों का कहना है कि उनके जाने से अस्थिरता बढ़ेगी

अगर वे इटली की मौजूदा राजनीतिक उठापटक से निकल जाते हैं तो भी भी सत्ताधारी गठबंधन विभाजनों की वजह से कमजोर होगा और 2023 के वसंत में आम चुनाव होने तक प्रधानमंत्री कुछ ज्यादा हासिल कर पायेंगे इसकी उम्मीद कम ही लोगों को है. द्रागी ने यूरोपीय संघ से 200 अरब यूरो की महामारी से उबरने के नाम पर धन पाने के लिए एक योजना तैयार की है. यूरोपीय संघ की बैठक में उन्होंने कथित सैकड़ों "लक्ष्यों और पड़ावों" वाली इस योजना को मजबूती से लागू करने की बात कही. हालांकि इनमें ज्यादातर विधानमंडल में छोटे स्तर के बदलाव ही हैं. इनमें से भी 527 तो 2026 में शुरू होंगे जब द्रागी का मौजूदा कार्यकाल खत्म हुए काफी समय बीत चुका होगा. मदद और सस्ते कर्ज के रूप में मिलने वाली यह रकम इटली की जीवनरेखा बन सकती है अगर वह अपने बजट को थोड़ा संभाल ले. हालांकि यूरोपीय संघ से मिलने वाली आर्थिक मदद को खर्च करने का उसका पुराना रिकॉर्ड बहुत अच्छा नहीं है. पिछले बजट के साइकिल में वह यूरोपीय संघ से मिलने वाली मदद का महज आधा ही खर्च कर पाया. इस मामले में वह स्पेन के बाद सबसे खराब स्थिति में है.

इटली का संकट पुराना है

द्रागी और उनके पूर्ववर्तियों के लिए यह बात कही जा सकती है कि इटली का संकट वैश्विक आर्थिक संकट की तुलना में बहुत पुराना है. इटली में प्रति व्यक्ति जीडीपी आज 20 साल पहले की स्थिति से भी नीचे है. तब इटली सिर्फ फ्रांस और जर्मनी से नीचे थे. इस कालखंड में ग्रीस को छोड़ दूसरे सभी यूरोपीय देशों ने विकास कर लिया लेकिन यूरोपीय संघ में इटली का प्रदर्शन सबसे खराब रहा. इटली में उत्पादकता यानी एक घंटे के काम या फिर एक यूरो के निवेश से हासिल होने वाली आर्थिक उपज 1990 के दशक में बढ़नी बंद हो गई और उसके बाद से लगातार नीचे जा रही है.

इन सब के पीछे तेजी से बूढ़ी होती आबादी, कुशल कामगारों की कमी, नौकरशाही, एक धीमा और लगभग बेकार हो चुका न्याय तंत्र, शिक्षा, बुनियादी ढांचे और नई तकनीकों में जरूरत से कम निवेश जैसे कई कारण हैं. कई और यूरोपीय देशों में भी इनमें से कुछ समस्यायें मौजूद हैं लेकिन ऐसा कोई नहीं जहां ये सारी समस्या एक साथ मौजूद हो वो भी इतने ही बड़े स्तर पर. कई अर्थशास्त्री इसके पीछे इटली के कारोबारियों की उस सोच को जिम्मेदार मानते हैं जिसकी वजह से वो कारोबार को परिवार के हाथों में ही बनाये रखते हैं और बाहरी निवेशकों के साथ मिल कर उसे आगे नहीं बढ़ाते. यूरोजोन में शामिल होने की वजह से इटली के पास अपनी मुद्रा के अवमूल्यन का विकल्प भी खत्म हो गया. कई दशकों तक इस उपाय के जरिये अपनी निर्यात की कीमत घटा कर इटली ने आर्थिक विकास को मजबूत बनाये रखा था. रोम की लुईस यूनिवर्सिटी में अर्थशास्त्र के प्रोफेसर फ्रांसेस्को साराकेनो कहते हैं, "हमने 1980 के दशक में विकास का गलत मॉडल चुन लिया. वैश्वीकरण के दौर में हम उभरते बाजारों से खर्च घटा कर होड़ लेने में जुट गये. इसकी बजाय जर्मनी ने उच्च गुणवत्ता के उत्पादन में निवेश का उदाहरण पेश किया."

एनआर/ओएसजे (रॉयटर्स)

Source: DW

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