अभिषेक बनर्जी को पश्चिम बंगाल के मतुआ मंदिर में जाने से क्यों रोका गया? क्या है इसकी वजह
पश्चिम बंगाल में पंचायत चुनाव से पहले मतुआ समुदाय वोटबैंक को लेकर सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) और विपक्षी भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के बीच एक नया राजनीतिक घमासान शुरू हो गया है।
ये हंगामा तब और बढ़ गया, जब रविवार 11 जून को बंगाल के ठाकुरनगर में मतुआ समुदाय के मुख्य मंदिर में टीएमसी के दूसरे नंबर के नेता अभिषेक बनर्जी को प्रवेश करने से रोक दिया गया।

अभिषेक बनर्जी इन दिनों टीएमसी के एक अभियान के लिए राज्य के दौरे पर हैं। इसी दौरान अभिषेक बनर्जी मतुआ संप्रदाय के सबसे पवित्र मंदिर बनगांव के ठाकुरनगर में हरिचंद-गुरुचंद मंदिर में पूजा करना चाहते थे। हालांकि बनर्जी को कथित तौर पर बनगांव के भाजपा सांसद और केंद्रीय मंत्री शांतनु ठाकुर और उनके समर्थकों ने मंदिर जाने से रोक दिया।
टीएमसी ने आरोप लगाया है कि अभिषेक बनर्जी के ब्राह्मण होने का हवाला देकर मतुआ समुदाय के सबसे बड़े मंदिर में प्रवेश करने से उन्हें रोक दिया। बता दें कि भाजपा के मंत्री शांतनु ठाकुर मतुआ नेता हैं और ठाकुर परिवार के प्रमुख सदस्य हैं। इनका समुदाय पर मजबूत नियंत्रण है।
टीएमसी प्रवक्ता कुणाल घोष ने कहा, ''वह वहां पूजा करने गए थे। इसका राजनीति से कोई लेना-देना नहीं था। लेकिन, बीजेपी कह रही है कि उन्हें अनुमति नहीं दी जाएगी क्योंकि वह एक ब्राह्मण हैं! हिंदू-मुस्लिम राजनीति से संतुष्ट नहीं, अब बीजेपी बंगाल में जाति आधारित राजनीति करना चाहती है?'
केंद्रीय मंत्री शांतनु ठाकुर ने आरोप लगाया है कि टीएमसी के कार्यकर्ताओं ने पवित्र स्थल पर भक्तों पर हमला करने की कोशिश की थी। इसी वजह से वह लोग गुस्सा में थे। शांतनु ठाकुर ने कहा, ''जो बंगाल के इतिहास को नहीं जानता है, उन्हें ये समझना होगा कि अभिषेक बनर्जी की कही हुई बातें आखिर बात नहीं है। उन्हें उनकी जगह दिखा दी गई है। वह अब समझ गए हैं कि
उसे यह नहीं मानना चाहिए कि वह (अभिषेक बनर्जी) अंतिम शब्द है। उसे उसकी जगह दिखा दी गई है। वह अब समझ गया हैं कि नामशूद्र कौन हैं। मतुआ भविष्य में उन्हें करारा जवाब देंगे।'
इस पूरे मामले ने एक बार फिर से मतुआ समुदाय को सुर्खियों में ला दिया है। बता दें कि अनुसूचित जाति (एससी) के रूप में वर्गीकृ मतुआ नामशूद्र या निचली जाति के हिंदू शरणार्थी हैं, जो विभाजन के बाद दशकों से पड़ोसी बांग्लादेश से पश्चिम बंगाल चले आए।
वे राज्य की दूसरी सबसे बड़ी अनुसूचित जाति की आबादी बनाते हैं। ज्यादातर उत्तर और दक्षिण 24 परगना में केंद्रित हैं, वे नदिया, हावड़ा, कूचबिहार, उत्तर और दक्षिण दिनाजपुर और मालदा जैसे सीमावर्ती जिलों में फैले हुए हैं।












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