बीजेपी के 'ममता बेग़म' की काट के लिए है चंडी पाठ: सौगत रॉय

ममता बनर्जी के सारे चमचे बीजेपी में चले गए: सौगत रॉय
Sanjeev Verma/Hindustan Times via Getty Images
ममता बनर्जी के सारे चमचे बीजेपी में चले गए: सौगत रॉय

तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के वरिष्ठ नेता और सांसद सौगत रॉय ने बीबीसी हिन्दी को दिए ख़ास इंटरव्यू में कहा है कि "मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के सारे चमचे बीजेपी में चले गए हैं."

जब सौगत रॉय से पूछा गया कि तृणमूल कांग्रेस छोड़कर बीजेपी में जाने की होड़ क्यों मची है? इस सवाल के जवाब में उन्होंने कहा, ''जो भी पार्टी छोड़कर गए हैं, वे कोई महान नेता नहीं थे. सब ममता बनर्जी के चमचे थे. उससे कुछ फ़र्क़ नहीं पड़ता.''

कई लोगों का आरोप है कि ममता बनर्जी के भतीजे अभिषेक बनर्जी के कारण ये सब छोड़कर जा रहे हैं. इस सवाल पर सौगत रॉय ने कहा, ''अभिषेक बेचारे ने क्या किया है. वो नौजवान है और ममता का भतीजा है.''

''ये कोई पाप तो नहीं है. मुकुल रॉय क्या है? ग्रैजुएट भी नहीं था और उसको ममता ने रेल मंत्री बना दिया. शुवेंदु अधिकारी को ममता ने तीन मंत्रालय दे दिया था. ममता भी अब इस चीज़ को समझ रही होंगी कि इन लोगों को उठाना नहीं चाहिए था.''

ममता अगर बीजेपी से गठबंधन कर सकती हैं तो ओवैसी की पार्टी को अछूत क्यों मानती हैं?

इस सवाल पर सौगत रॉय ने कहा, '' मैं तो अछूत नहीं मानता हूँ. टीएमसी ने 2006 तक यानी 15 साल पहले तक बीजेपी से गठबंधन किया. उसके बाद से हमने बीजेपी से गठबंधन नहीं किया.''

अभी तो स्पष्ट रूप से हमारी पार्टी की लाइन बीजेपी विरोधी है. लेकिन हम ये चाहते हैं कि टीएमसी अकेले चुनाव लड़ेगी. आप देखेंगे कि हमने किसी दूसरी पार्टी से भी गठबंधन नहीं किया. 2016 में जो हमने सरकार बनाई थी, अपने बूते पर ही थी.''

बीजेपी और ममता

ममता बनर्जी ने बीजेपी से जो गठबंधन किया था, क्या वो ग़लत फ़ैसला था?

इस सवाल के जवाब में सौगत रॉय ने कहा, ''उस समय कांग्रेस से निकलकर जब ममता आई तो उसने खड़ा होने के लिए सहारा खोजा. जब उसे लगा कि अपने दम पर खड़ी हो जाएगी तो बीजेपी का साथ छोड़ दिया. उस वक़्त तो बीजेपी इतनी मज़बूत नहीं थी.''

''2006 तक बीजेपी सरकार में नहीं थी. 2006 तक ही हम साथ रहे. लेकिन मोदी के आने के बाद हम साथ नहीं रहे. हमने अपना सपोर्ट बेस बनाए रखने के लिए बीजेपी को छोड़ दिया.''

क्या अतीत में ममता ने बीजेपी से गठबंधन नहीं करतीं तो और अच्छा रहता?

सौगत रॉय कहते हैं, ''हो सकता है. संभव है. लेकिन ये हाइपोथेटिकल सवाल है.''

क्या ममता बीजेपी के दबाव में चंडी पाठ कर रही हैं, ''नहीं, नहीं, पहले भी करती थी. बीजेपी का प्रेशर आने से पहले से ही हर साल 100 से 150 दुर्गा पूजा का उद्घाटन करती थी. पब्लिक मीटिंग में नहीं करती थी, लेकिन बीजेपी जब 'ममता बेग़म' कहती है तो इसका काउंटर करने के लिए उन्हें ये सब करना पड़ रहा है.''

''हमें बीजेपी का काउंटर करने के लिए ये सब करना पड़ेगा. हम बीजेपी से कम हिन्दू नहीं हैं, लेकिन हम बीजेपी के हिन्दुत्व वाली राजनीति नहीं करते हैं. उसको हम बंगाल से निकालेंगे. ममता चंडी पाठ भी करती हैं और लाइल्लाह भी करती हैं. हमें बीजेपी के दबाव में धार्मिक प्रतीकवाद की राजनीति करनी पड़ रही है.''

'बीजेपी बंगाल को तबाह कर देगी'

अगर बीजेपी राज्य में सत्ता में आती है तो पश्चिम बंगाल में किस तरह की तब्दीली देखने को मिलेगी?

इस पर सौगत रॉय कहते हैं, ''बीजेपी बंगाल को तबाह कर देगी. सत्ता में आने के दो दिन बाद ही बोलेगी कि सब को माथे पर चुटिया रखना होगा, महिलाओं को साड़ी छोड़कर कुछ नहीं पहनना होगा और खान-पान को कंट्रोल करेगी.''

''बीजेपी का नेता दिलीप घोष है, जो आईटीआई पास है. ठीक है कि जो जीता वही सिकंदर. लेकिन हमारे बंगाल में अब तक परंपरा थी कि पढ़ा-लिखा ही नेता बनता था. सिद्धार्थ शंकर रॉय और ज्योति बसु लंदन से बैरिस्टर थे. डॉ वीसी रॉय हिन्दुस्तान के सबसे नामी डॉक्टर थे. वहाँ पर दिलीप घोष नेता के रूप में उभरकर आएगा तो यह शर्मनाक ही है. देश की बदनसीबी है.''

बीजेपी के राज्यसभा सांसद स्वपन दासगुप्ता अब इस्तीफ़ा देकर विधानसभा चुनाव लड़ रहे हैं. जाने-माने पत्रकार दासगुप्ता ने बीबीसी हिन्दी से कहा कि ममता बनर्जी के राज में "हिन्दुओं को दोयम दर्जे का नागरिक बना दिया गया है."

उनकी इस टिप्पणी पर सौगत रॉय कहते हैं, ''इसको बंगाल के बारे में कुछ भी पता नहीं है. दिल्ली में रहकर पूरा ध्यान तो मोदी से दोस्ती बनाने में लगाया है. स्वपन दासगुप्ता अमीर परिवार से आता है लेकिन कोलकाता से स्कूल के बाद कोई ताल्लुक नहीं है. अगर उन्हें सीएम बनाया जाता है तो दुखद होगा. हाँ, दिलीप घोष से ज़्यादा शिक्षित है, ज़्यादा प्रेजेटेंबल है लेकिन बंगाल के बारे में उसे कुछ पता नहीं है.''

बंगाल में बीजेपी को लगातार जीत क्यों मिल रही है?

बंगाल में बीजेपी को लगातार जीत क्यों मिल रही है? आख़िर टीएमसी को जनता नापसंद क्यों करने लगी है?

इस सवाल के जवाब में वो कहते हैं, ''हम लोग अब तक नहीं समझ पाए हैं कि बीजेपी को 2019 के लोकसभा चुनाव में 18 सीटों पर जीत कैसे और क्यों मिली. हालाँकि हमने इसे लेकर कुछ तब्दीली ज़रूर की है. हमने प्रशांत किशोर को कैंपेन की ज़िम्मेदारी दी. पुराने लोगों को टिकट नहीं दिया. बांग्ला अस्मिता को उभारने की रणनीति अपनाई.''

टीएमसी, वामपंथी पार्टियों और कांग्रेस के बारे में कहा जा रहा है कि इन्होंने 'अपर कास्ट भद्रलोक' को शीर्ष पर रखने वाली राजनीति की और दलितों, अल्पसंख्यकों, पिछड़ी जातियों और आदिवासियों के बीच से नेतृत्व पैदा नहीं होने दिया गया.

दूसरी तरफ़ बीजेपी ने हिंदू पहचान की राजनीति को बंगाल में स्थापित कर दिया है और वो भारी पड़ रही है.

इस पर सौगत रॉय कहते हैं, ''बीजेपी ने किस दलित और पिछड़ी जाति के आदमी को नेता बना दिया है? दिलीप घोष यादव है लेकिन वो तो आरएसएस का आदमी है. आरएसएस जो कहेगा वो वही करेगा. आरएसएस में लोग समर्पित हैं लेकिन सबकी कम्युनल लाइन है. टीएमसी को अब इन तबकों से नेतृत्व को उभारना होगा."

'अपर कास्ट भद्रलोक'

रॉय का मानना है कि बंगाल की राजनीति दूसरे तरह की रही है.

वे कहते हैं, "बंगाल में अब तक जो मुख्यमंत्री हुआ वो अपर कास्ट से हुआ. शहरी इलाक़े में ब्राह्मण, कायस्थ और वैद्य इन तीन जातियों का प्रभुत्व रहा है. ज्योति बसु और सिद्धार्थ शंकर रे और डॉक्टर विधान चंद्र सब कायस्थ थे, बुद्धदेव भट्टाचार्य ब्राह्मण थे. ममता भी ब्राह्मण हैं. ये समस्या बंगाल में है. बंगाल का आभिजात्य बहुत प्रगतिशील रहा है. इस आभिजात्य का देश में पुनर्जागरण लाने में बड़ी भूमिका रही है."

दलितों, आदिवासियों और अल्पसंख्यकों में नेतृत्व नहीं पैदा करने का क्या ये तर्क सही है?

इस पर सौगत रॉय कहते हैं, ''इस बारे में जो कम्युनिस्ट लोग मानते हैं, मैं उसी को मानता हूँ. उनका कहना था कि जब हम लीडरशीप खोजेंगे तो हम पहचान की राजनीति की तरफ़ बढ़ेंगे और हमें ये नहीं करना है. हम भी ऐसा ही सोचते हैं.''

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