Alapan Bandyopadhyay:ममता-मोदी सरकार में टकराव के बीच, क्या यह कमजोरी बनी इस्तीफे की वजह

कोलकाता, 31 मई: पश्चिम बंगाल के चीफ सेक्रेटरी अलपन बंधोपाध्याय ने तीन महीने की सेवा विस्तार के बदले दिल्ली जाने की बजाय इस्तीफा देकर केंद्र और ममता सरकार के बीच टकराव के ताजे मुद्दे को नया मोड़ दे दिया है। हालांकि, फिलहाल इससे उनके मूल कार्यकाल पर कोई फर्क नहीं पड़ा है और वो उसी दिन यानी 31 मई, 2021 को रिटायर हुए हैं, जो उनके लिए पहले से निर्धारित था। इतना जरूर हुआ कि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने कोविड मैनेजमेंट और यास चक्रवात के नाम पर केंद्र से कहकर तीन महीने के लिए उनका जो सेवा विस्तार करवाया था, उसका फायदा उन्हें नहीं मिल पाया। लेकिन, सीएम ने इसकी कमी उनको अपना मुख्य सलाहकार बनाकर पूरी करने की कोशिश की है। आइए जानते हैं कि क्या सिर्फ ममता के कहने पर ही उन्होंने दिल्ली में प्रतिनियुक्ति के केंद्र के फरमान को ठुकरा दिया है या फिर इसके पीछे उनकी अपनी भी कोई निजी कमजोरी थी ?

अलपन बंदोपाध्याय के पास विकल्प क्या थे ?

अलपन बंदोपाध्याय के पास विकल्प क्या थे ?

पश्चिम बंगाल के सरकारी अमले के बीच अलपन बंदोपाध्याय की छवि चुपचाप अपना काम करने वाले अधिकारी की रही है, जो बहुत कम बोलते हैं। 1987 बैच के बंगाल कैडर के आईएएस अधिकारी बंदोपाध्याय के मुख्य सचिव का कार्यकाल आमतौर पर रूल बुक को फॉलो करने के लिए जाना जाता है। वो सोमवार को ही रिटायर होने वाले थे, लेकिन कोरोना महामारी से निपटने के उनके अनुभव के नाम पर मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने मोदी सरकार से कहकर उनका कार्यकाल तीन महीने के लिए बढ़वाया था। लेकिन, इस दौरान केंद्र और राज्य सरकार में ऐसी तल्खी बढ़ गई कि केंद्र ने उन्हें सेवा विस्तार तो दिया, लेकिन सोमवार को सुबह 10 बजे तक दिल्ली में रिपोर्ट करने का फरमान भी सुना दिया। इससे जुड़े नियमों के जानकारों का कहना है कि इसके बाद अलपन बंदोपाध्याय के पास दो ही विकल्प थे- या तो केंद्र की प्रतिनियुक्ति पर दिल्ली में योगदान दें या फिर अपने तय समय पर इस्तीफा देकर रिटायरमेंट ले लें। शायद उन्हें दूसरा विकल्प ज्यादा मुनासिब लगा।

सबके साथ सौहार्दपूर्ण रहा निजी रिश्ता

सबके साथ सौहार्दपूर्ण रहा निजी रिश्ता

जब से देश कोरोना महामारी से जूझ रहा है अलपन केंद्र और राज्य सरकार के बीच एक कड़ी बनकर काम कर रहे थे। इस दौरान कई बार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्रियों के बीच रिव्यू मीटिंग हुई, जिसमें ज्यादातर समय ममता बनर्जी ने शामिल होना जरूरी नहीं समझा। ऐसे में इसी अधिकारी ने केंद्र और राज्य सरकार के बीच पुल की जिम्मेदारी निभाई। वैसे ये बहुत कम बोलने वाले अधिकारी माने जाते रहे हैं, लेकिन जब बोलते हैं तो उनमे एक अच्छे वक्ता के सारे हुनर दिखाई पड़ते हैं। यही वजह है कि जब सीएम ममता बंगाल के गवर्नर जगदीप धनकड़ के खिलाफ अदावत दिखाने का कोई मौका नहीं छोड़ती थीं, तब भी इनका राज्यपाल के साथ बहुत ही अच्छा संबंध बना रहा। टीएमसी के कार्यकाल में ही नहीं बुद्धदेब भट्टाचार्य के कार्यकाल में भी उनका मुख्यमंत्री से अच्छा रिश्ता था।

आईएएस बनने से पहले पत्रकार थे अलपन बंधोपाध्याय

आईएएस बनने से पहले पत्रकार थे अलपन बंधोपाध्याय

1961 में जन्मे अलपन की स्कूली शिक्षा बंगाल के नरेंद्रपुर स्थित रामकृष्ण मिशन में हुई। जब वे 11वीं में थे, तभी उन्होंने आईएएस बनने की ठान ली थी और दोस्तों के कहने के बावजूद उन्होंने साइंस या इंजीनियरिंग की जगह मानविकी पढ़ने का फैसला किया। वे प्रेसिंडेसी यूनिवर्सिटी से पॉलिटिकल साइंस में ग्रेजुएट हैं और कलकत्ता यूनिवर्सिटी से इन्होंने मास्टर्स किया। मास्टर्स करने के बाद अलपन ने पत्रकारिता में भी हाथ आजमाया था और 1983 में आनंद बाजार पत्रिका ज्वाइन की थी। इनके भाई अंजन बंदोपाध्याय पॉपुलर टीवी एंकर और बंगाली न्यूज चैनल जी 24 घंटा के एडिटर थे। दो हफ्ते पहले ही उनकी कोरोना के चलते मौत हो गई थी।

अलपन बंदोपाध्याय कमजोरी क्या थी ?

अलपन बंदोपाध्याय कमजोरी क्या थी ?

1987 में अलपन बंदोपाध्याय ने यूपीएससी की परीक्षा पास की और उन्हें बंगाल कैडर मिला। उस वक्त ज्योति बसु बंगाल के मुख्यमंत्री हुआ करते थे और रथिन सेनगुप्ता मुख्य सचिव। सेनगुप्ता ने उसी वक्त उनके बारे में भविष्यवाणी कर दी थी कि एक दिन अलपन बंगाल के चीफ सेक्रेटरी बनेंगे। लेकिन, करियर के मामले में उनकी एक कमजोरी भी रही है, जो आखिरी वक्त में शायद उनके इस तरह से रिटारमेंट की वजह भी बन गई। उन्होंने राज्य सरकार में तो विभिन्न महत्वपूर्ण पदों पर काम किया है, कई जिलों के डीएम रहे हैं। लेकिन, कभी भी दिल्ली में उनकी तैनाती नहीं हुई। एकबार रिटायर्ड आईएएस अधिकारी जवाहर सिरचर ने उनसे कहा भी था कि बंगाल से बाहर भी निकलो और दूसरे कैडर के अफसरों के साथ भी घुलो-मिलो! शायद ये कमजोरी भी रही कि उन्होंने केंद्र में प्रतिनियुक्ति पर जाने की बजाय सेवा विस्तार छोड़ने का फैसला कर लिया।

कलकत्ता यूनिवर्सिटी की वीसी हैं सोनाली चक्रबर्ती

कलकत्ता यूनिवर्सिटी की वीसी हैं सोनाली चक्रबर्ती

जब अलपन कलकत्ता यूनिवर्सिटी में पढ़ रहे थे तो यहीं पर उनकी मुलाकात सोनाली चक्रबर्ती से हुई, जो उनकी पत्नी और मशहूर कवि नीरेंद्रनाथ चक्रबर्ती की बेटी हैं। सोनाली चक्रबर्ती अभी कलकत्ता यूनिवर्सिटी की वाइस चांसलर हैं। खाली वक्त में अलपन अच्छी किताबें पढ़ने के भी बड़े शौकीन हैं।

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