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UP agriculture: मक्का की खेती में ये गलती कर रहे हैं 80% किसान, आप न करें तो बढ़ेगा मुनाफा

UP Agriculture: वाराणसी के टिकरी स्थित एनसीडीसी सेंटर में मंगलवार को त्वरित मक्का विकास कार्यक्रम के अंतर्गत जनपद स्तरीय गोष्ठी का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में बतौर मुख्य अतिथि पहुंचे रोहनिया विधायक डॉ. सुनील पटेल ने किसानों से वैज्ञानिक पद्धति से मक्का की खेती करने की अपील की।

उन्होंने कहा कि ऐसी गोष्ठियों के माध्यम से किसान तकनीक से जुड़कर उत्पादन में बड़ा बदलाव ला सकते हैं। इस दौरान विधायक ने किसानों को एफपीओ से जुड़ने की सलाह दी। उन्होंने कहा कि अकेले खेती करने के बजाय समूह में काम करने से किसानों को सरकारी योजनाओं और बाजार की बेहतर जानकारी मिलती है।

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उन्होंने यह भी बताया कि राज्य सरकार मक्का को मोटे अनाज के रूप में बढ़ावा दे रही है और इसमें संभावनाएं बहुत हैं। गोष्ठी में उप कृषि निदेशक अमित जायसवाल ने बताया कि जिले में मक्का की खेती करीब 4800 हेक्टेयर में की जाती है, जिससे औसतन 20.30 क्विंटल प्रति एकड़ उत्पादन होता है।

लेकिन यदि किसान संकर (हाइब्रिड) बीज का प्रयोग करें तो उत्पादन 40 क्विंटल तक बढ़ाया जा सकता है। पैदावार बढ़ने के साथ ही किसानों को इसमें बहुत मेहनत भी नहीं करना पड़ेगा और आने वाले समय में मक्का की खेती करने वाले किसानों को बहुत अधिक लाभ मिलेगा।

मक्का से इथेनॉल उत्पादन की बड़ी संभावना

गोष्ठी में बताया गया कि मक्का न केवल चारे और खाद्य सामग्री के रूप में उपयोगी है, बल्कि इथेनॉल उत्पादन में भी इसकी अहम भूमिका है। विशेषज्ञों के अनुसार, एक टन मक्का से लगभग 380 लीटर इथेनॉल निकाला जा सकता है, जो पेट्रोल के साथ मिश्रण के लिए उपयुक्त होता है।

जिला कृषि अधिकारी संगम सिंह मौर्य ने बताया कि जिले के आराजी लाइन और काशी विद्यापीठ विकासखंड में मक्का के प्रदर्शन हेतु 20.20 एकड़ भूमि चिह्नित की गई है। इसके माध्यम से किसानों को नई तकनीकें प्रत्यक्ष रूप से दिखाई जाएंगी, जिससे वे प्रेरित होकर अपनाएं।

खरीफ मौसम के लिए फसल बीमा योजना में भागीदारी करें

कार्यक्रम में कृषि विज्ञान केंद्र के अध्यक्ष डॉ. एन.के. सिंह ने किसानों को जानकारी दी कि वैज्ञानिक विधियों से खेती करने पर लागत घटती है और उत्पादन बढ़ता है। वहीं, वैज्ञानिक डॉ. अमितेश सिंह ने बताया कि खरीफ सीजन में मक्का की खेती मेड़ पर करने से जल प्रबंधन बेहतर होता है और उत्पादन भी संतुलित रहता है।

डॉ. राहुल सिंह ने बताया कि मक्का एक ऐसी फसल है जिसे खरीफ, रबी और जायद तीनों ही मौसमों में उगाया जा सकता है। यह फसल पोषण और आय दोनों के लिहाज से महत्वपूर्ण है। उन्होंने एफपीओ से जुड़ने पर विशेष बल दिया।

मृदा स्वास्थ्य कार्ड का करें सही उपयोग

मृदा परीक्षण विभाग के सहायक निदेशक राजेश कुमार राय ने किसानों को बताया कि उन्हें दिए गए मृदा स्वास्थ्य कार्ड में उल्लेखित उर्वरकों का ही प्रयोग करें। इससे मिट्टी की उर्वरता बनी रहती है और अनावश्यक खर्च से भी बचा जा सकता है।

जिला कृषि रक्षा अधिकारी बृजेश विश्वकर्मा ने बताया कि कृषि रक्षा रसायनों पर 50 प्रतिशत तक की सब्सिडी डीबीटी के माध्यम से सीधे किसानों के खाते में दी जा रही है। ऐसे में किसान उन्नत किस्म की दवाइयों का भी उपयोग कर सकते हैं।

कार्यक्रम के अंत में कृषक उत्पादक संगठन एवं औद्यानिक विपणन सहकारी समिति लिमिटेड, टिकरी के अध्यक्ष अमित सिंह ने किसानों से एफपीओ से जुड़ने की अपील की। उन्होंने कहा कि एकजुट होकर खेती करने से किसानों की लागत घटती है और उन्हें सरकारी योजनाओं व बाजार का सीधा लाभ मिलता है।

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