वाराणसी के इस मदरसे में छात्रों को दी जाती है संस्कृत की तालीम, समझाए जाते हैं श्लोकों के अर्थ

यूपी में इस समय गैर मान्यता प्राप्त मदरसो के सर्वेक्षण को लेकर बवाल मचा हुआ है। सत्ता पक्ष और विपक्ष में वार-पलटवार हो रहा है। अमूमन मदसरे का जिक्र आते ही हमारे मन मस्तिष्क में उर्दू भाषा को लेकर बातें आने लगती हैं, लेकिन आज हम आपको एक ऐसे मदरसे की तस्वीर दिखाने जा रहे हैं, जहाँ शिक्षा धर्म और जाति से बड़ी है, ये सीख दी जाती है। यहाँ उर्दू के साथ साथ मुस्लिम बच्चों को संस्कृत भी पढ़ाई जाती है। जी हाँ इस मदरसे में उर्दू जितनी शिद्दत से पढ़ाई जाती है, उतने ही शिद्दत से संस्कृत की भी शिक्षा दी जाती है। धर्म नगरी में ऐसी तस्वीरों के कारण ही आपसी सौहार्द की मिशाल दी जाती है । ऐसे में खानम जान मदरसा भी समाज में एकता का ऐसा धागा पिरो रहा है जिसमें शिक्षा वाकई जाती और धर्म से बड़ी कही जाती है ।

एकता और अखंडता की मिसाल

एकता और अखंडता की मिसाल

एकता और अखंडता की मिसाल
बता दें कि वाराणसी के अर्दली बाजार इलाके में खानम जानम मदरसा मौजूद है, जहां पर उर्दू के साथ-साथ बच्चों को संस्कृत की भी पढ़ाई कराई जाती है। संस्कृत पढ़ाने के लिए बाहर से संस्कृत के टीचर को भी बुलाया गया है जो हर क्लास में बच्चों को संस्कृत की शिक्षा प्रदान करती है। यह मदरसा शहर के अन्य मदरसों की अपेक्षा बिल्कुल अलग है। यहां पर बच्चों को हर तरीके का ज्ञान दिया जाता है। यहाँ पढ़ाई जाने वाले विषयों में संस्कृत की शिक्षा भी मौजूद है। यहां पर बच्चों को संस्कृत पढ़ाते हैं। संस्कृत में श्लोक पाठ अध्ययन कराया जाता है। हाँ यह बात जरूर है कि मुस्लिम बच्चों को पढ़ाना थोड़ा सा मुश्किल जरूर होता है. क्योंकि उन्होंने बचपन से ही उर्दू की तालीम ली होती हैं, लेकिन यदि उनके ईश्वर, उनकी तालीम से संस्कृत को जोड़ करके पढ़ाते हैं तो बच्चे बेहद जल्दी और आसानी से सीख जाते है। हैरान करने वाली बात यह है कि यहां शिक्षा ग्रहण करने वाले बच्चे भी संस्कृत को लेकर के खासा उत्साहित हैं, घर में जहां वो उर्दू की शिक्षा ग्रहण करते हैं तो वही स्कूल में संस्कृत के श्लोक और उनके अर्थ में भी उनकी उत्सुकता दिखाई देती है। वह बकायदा श्लोक पढ़ करके उसको समझ भी रहे हैं। संस्कृत भाषा उन्हें खासा पसंद आ रही है और उन्हें पढ़ने में आनंद भी आ रहा है।

श्लोको के अर्थ भी समझाए जाते हैं

श्लोको के अर्थ भी समझाए जाते हैं

मदरसे के प्रधानाचार्य बताते हैं कि हमारे लिए शिक्षा किसी भी धर्म से बड़ी है और यही हमारे काशी की संस्कृति भी है। हमारे मदरसे में हर वर्ग के बच्चे को हर तरीके की शिक्षा दी जाती है। यहां पर कोई बाध्यता नहीं है कि आप मदरसे में पढ़ रहे हैं तो आपको उर्दू, अरबी, फारसी में ही पढ़ना है। हमारे यहां संस्कृत में भी बच्चों को पढ़ाया जाता है और हमें इस बात की प्रसन्नता है कि हमारे बच्चे अंग्रेजी, हिंदी, संस्कृत और उर्दू सभी भाषाओं को जानते हैं।
मदरसे ने पढ़ने वाली सना बताती हैं कि उन्हें संस्कृत में वंदना सिखाई गई है। साथ ही कई श्लोको के अर्थ भी समझाए जाते हैं और उन्हें संस्कृत पढ़ने में बेहद ही मज़ाता आता है। इस मौके पर सना पढाई गई वंदना भी सुनाई।

पहले मदरसें की नींव

पहले मदरसें की नींव

इतिहासकारों के मुताबिक, 11वीं सदी में इस्लामिक स्कॉलर और सेलिजुक माम्राज्य के मंत्री निजाम अल-मुल्क ने मदरसों की नींव रखी थी। ऐसा माना जाता है कि निजाम ने ईरान और खोरासान के इलाकों में पहली बार मदरसा की जाल तैयार किया था। निजाम ने दुनिया में तेजी से मदरसों में का निर्माण करवाया। जिसके बाद अन्य मुस्लिम देशों ने अपने राज्यों में मदरसे बनवाएं। वहीं कुछ इतिहासकार कहते हैं कि दुनिया का पहला मदरसा सऊदी अरब की सफा पहाड़ी पर बना था। इसमें शिक्षक के रुप में पैगंबर मुहम्मद और उनके समर्थक ही छात्र थे।

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