'मिशन-काशी' फतह करने वाराणसी पहुंचे केजरीवाल

केजरीवाल दूसरी बार बनारस पहुंचे हैं लेकिन इस बार का ब्रेक लंबा होगा। पहले दौरे में शहर की नब्ज़ टटोली और इस बार शहर के लोगों का दिल टटोलने की कोशिश करने वाले हैं। आज से शुरू हो रहे है वाराणसी दौरे में सबसे पहले केजरीवाल दलित बस्ती का रुख करेंगे।
वाराणसी लोकसभा क्षेत्र में करीब 1 लाख दलित वोटर हैं और केजरीवाल इनका वोट अपने पक्ष में करने से चूकना नहीं चाहेंगे। हालांकि दिल्ली में काशी से निकलने से पहले उन्होंने यही कहा कि अपने लिए नहीं बल्कि देश बचाने के लिए वाराणसी जा रहे है।
वाराणसी में केजरीवाल का मुकाबला नरेंद्र मोदी से है और वहां पहुंचने से पहले भारतीय रेल की अपनी बोगी से ही केजरीवाल ने लोगों से इस जंग में साथ जुड़ने की अपील कर डाली। उन्होंने ट्विटर पर लिखा, 'वाराणसी-अमेठी के लिए निकल गया हूं। महाक्रांति का आगाज करने।
कृपया देश के लिए दुआ कीजिए, आपकी दुआओं ने हमेशा करिश्मा किया है। अगर वक्त है तो वाराणसी या अमेठी जरुर आइए।'
वाराणसी में चुनाव 12 मई को है और 12 मई तक केजरीवाल काशी में ही डेरा डालेंगे। केजरीवाल की काशी किलेबंदी का प्लान पूरी तरह से तैयार है। कार्यकर्ताओं के पास निर्देशों की फेहरिस्त है, जिसकी राह पर चलकर वे अपने मिशन और मकसद को अंजाम देना चाहते हैं। एक नजर जरा केजरीवाल के काशी मिशन पर भी।
केजरीवाल का 'मिशन काशी'
वोटिंग से पहले तक वाराणसी में केजरीवाल लोगों से छोटी-छोटी मीटिंग करेंगे। इसके अलावा कुछ दिनों में बड़ी रैलियां भी की जाएंगी। काशी के लोगों से भी केजरीवाल मुलाकात करेंगे और उनके बीच आम आदमी पार्टी की नीति और नियत तो स्पष्ट करने वाले पर्चे भी बांटे जाएंगे।
केजरीवाल अपने विरोधियों को भी समझाने की कोशिश करेंगे. मतदाताओं से जनसंवाद के लिए सभा का भी आयोजन होगा जिसमे लोगों के सवाल लिए जाएंगे और उनके जवाब भी केजरीवाल की ओर से दिए जाएंगे.
सूत्रों की माने तो आम आदमी पार्टी ने वाराणसी के 16 लाख वोटरों में से 10 लाख मतदाताओं से सीधे संवाद के लिए 10 लाख रुपये का बजट बनाया है। 500 कार्यकर्ताओं की एक पूरी टीम इस काम को अंजाम देगी।
वैसे केजरीवाल ने अभी से ही काशीवासियों को सावधान करने के लिए उनके दिमाग में ये बात डालनी शुरू कर दी है कि अगर मोदी काशी के किंग बनते हैं तो अगले ही दिन उसका त्यागकर वडोदरा की डगर पर चल पड़ेंगे।
तस्वीर साफ है केजरीवाल भले ही राजनीति के नए खिलाड़ी हों, पर उन्होंने सियासत को करीब से देखा है। सत्ता पाई है, ठुकराई है। जानकारों का मानना है कि काशी का मुकाबला हमेशा से टक्कर का होता आया है, और इस बार भी है।












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