Farming India: सेंसर तकनीक से धान की सिंचाई में आएगी क्रांति, एक-एक बूंद पानी का होगा सटीक उपयोग

Farming India: पूर्वी उत्तर प्रदेश में धान की खेती को जलवायु परिवर्तन के अनुकूल बनाने की दिशा में एक नई पहल की जा रही है। इंटरनेशनल राइस रिसर्च इंस्टीट्यूट (इरी) के वैज्ञानिक अब सेंसर आधारित सिंचाई प्रणाली पर फील्ड लेवल पर परीक्षण कर रहे हैं।

इस तकनीक के जरिये धान की सीधी बुवाई (DSR) वाले खेतों में पानी की जरूरत को समय पर पहचान कर सटीक सिंचाई की जा रही है। इससे जल की बचत के साथ-साथ फसल की उत्पादकता और मिट्टी का स्वास्थ्य भी बेहतर बनेगा।

Farming India sensor based

गुरुवार को वाराणसी के पनियारा गांव में इरी के दक्षिण एशिया क्षेत्रीय केंद्र (आइसार्क) की टीम ने मिट्टी की नमी और सिंचाई के तरीकों पर विस्तार से अध्ययन किया। इसमें सस्य विज्ञान, भू-स्थानिक प्रणाली, कृषि अर्थशास्त्र और जल विशेषज्ञ शामिल रहे।

स्मार्ट उपकरणों से तय होगा सिंचाई का शेड्यूल

शोधकर्ताओं ने खेतों में नमी मापने वाले सेंसर, जलस्तर की स्वचालित निगरानी प्रणाली और ड्रोन आधारित मैपिंग टूल्स का उपयोग किया। इसका उद्देश्य यह जानना है कि फसल की किस अवस्था में कितनी नमी जरूरी है और कब सिंचाई करनी चाहिए।

इस तकनीक से खेतों की वास्तविक स्थिति का आंकलन हो रहा है। वैज्ञानिक यह भी जांच कर रहे हैं कि अलग-अलग सिंचाई के अंतराल से फसल की वृद्धि, मिट्टी की उर्वरता और पानी की खपत पर क्या असर पड़ता है।

जलवायु-अनुकूल खेती के लिए जरूरी है डेटा आधारित सिंचाई

इरी आइसार्क के निदेशक डॉ. सुधांशु सिंह ने कहा कि अब समय आ गया है जब पारंपरिक सिंचाई की जगह डेटा आधारित स्मार्ट सिंचाई को अपनाया जाए। इससे खेती टिकाऊ बनेगी और जल संकट से जूझ रहे क्षेत्रों को राहत मिलेगी।

उन्होंने बताया कि इरी ऐसे समाधान विकसित कर रहा है जो किसानों की उत्पादकता बढ़ाने के साथ-साथ जलवायु के बदलते प्रभावों से निपटने में मदद करें। यह तकनीक लंबे समय तक खेती को सुरक्षित बनाए रखने में सहायक साबित हो सकती है।

स्थानीय जरूरतों के अनुसार बनेंगे सिंचाई प्रोटोकॉल

इस शोध के तहत वैज्ञानिक यह भी जानने की कोशिश कर रहे हैं कि मिट्टी में कितनी नमी रहने पर डीएसआर खेतों को सिंचाई की जरूरत होती है। इसके लिए जगह और मौसम के अनुसार डेटा इकट्ठा किया जा रहा है।

वरिष्ठ जल वैज्ञानिक डॉ. एंटोन उरफेल्स ने कहा कि जब सेंसर से प्राप्त जानकारी को भू-स्थानिक विश्लेषण से जोड़ा जाता है, तब क्षेत्र विशेष के लिए उपयुक्त सिंचाई प्रोटोकॉल तैयार किए जा सकते हैं। इससे पानी की खपत घटेगी और फसल पर बेहतर असर होगा।

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