कौन हैं पेशावर कांड के नायक वीर चंद्र सिंह गढ़वाली, जिनकी प्रतिमा का अनावरण करने पहुंचे राजनाथ
केंद्रीय रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह वीर चंद्र सिंह गढ़वाली की पुण्य तिथि पर
देहरादून, 1अक्टूबर।उत्तराखंड के पौड़ी जिले के पीठसैंण में पेशावर कांड के नायक वीर चंद्र सिंह गढ़वाली की पुण्यतिथि पर भाजपा सरकार ने कार्यक्रम आयोजित किया है। जिसमें केंद्रीय रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह शिरकत करने पहुंचे हैं। इस दौरान राजनाथ सिंह वीर चंद्र सिंह गढ़वाली की मूर्ति और प्रतिमा का अनावरण करेंगें। कार्यक्रम में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी, रक्षा एवं पर्यटन राज्य मंत्री सांसद अजय भट्ट, प्रदेश अध्यक्ष मदन कौशिक, कैबिनेट मंत्री डॉ धन सिंह रावत, पूर्व सीएम और सांसद तीरथ सिंह रावत समेत भाजपा के दिग्गज नेता मौजूद रहेंगे। चुनावी साल में गढवाली के गांव में भाजपा के इस कार्यक्रम के कई सियासी मायने भी निकाले जा रहे हैं।

कौन हैं वीर चंद्र सिंह
चंद्र सिंह का जन्म 25 दिसंबर 1891 को जलौथ सिंह भंडारी के घर पर हुआ था। 3 सितंबर 1914 को वे सेना में भर्ती हुए, 1 अगस्त 1915 को उन्हें सैनिकों के साथ अंग्रेजों ने फ्रांस भेज दिया। 1 फरवरी 1916 को वे वापस लैंसडौन आ गये। इसके बाद 1917 में उन्होंने प्रथम विश्व युद्ध के दौरान अंग्रेजों की ओर से मेसोपोटामिया युद्ध व 1918 में बगदाद की लड़ाई लड़ी। प्रथम विश्व युद्ध के बाद अंग्रेजों ने उन्हें हवलदार से सैनिक बना दिया। चंद्र सिंह की सेना से छुट्टी के दौरान राष्ट्रपिता महात्मा गांधी से मुलाकात हुई। 1920 में चंद्र सिंह को बटालियन के साथ बजीरिस्तान भेजा गया। वापस आने पर उन्हे खैबर दर्रा भेजा गया और उन्हें मेजर हवलदार की पदवी भी मिल गई। इस दौरान पेशावर में आजादी की जंग चल रही थी। अंग्रेजों ने चंद्र सिंह को उनकी बटालियन के साथ पेशावर भेज दिया और इस आंदोलन को कुचलने के निर्देश दिए। 23 अप्रैल 1930 को आंदोलनरत जनता पर फायरिग का हुक्म दिया गया, तो चंद्र सिंह ने 'गढ़वाली सीज फायर' कहते हुए निहत्थों पर फायर करने के मना कर दिया। आज्ञा न मानने पर अंग्रेजों ने चंद्र सिंह व उनके साथियों पर मुकदमा चलाया। उन्हें सजा हुई व उनकी संपत्ति भी जब्त कर ली गई। अलग-अलग जेलों में रहने के बाद 26 सितंबर 1941 को वे जेल से रिहा हुए।

महात्मा गांधी ने दी थी 'गढ़वाली' की उपाधि
इसके बाद वे महात्मा गांधी से जुड़ गए व भारत छोड़ो आंदोलन में उन्होंने सक्रिय भूमिका निभाई। चंद्र सिंह भंडारी को 'गढ़वाली' की उपाधि देते हुए महात्मा गांधी ने कहा था कि मेरे पास गढ़वाली जैसे चार आदमी होते तो देश कब का आजाद हो जाता। वहीं, आजाद हिद फौज के जनरल मोहन सिंह ने कहा था कि पेशावर विद्रोह ने हमें आजाद हिद फौज को संगठित करने की प्रेरणा दी। 22 दिसंबर 1946 में वामपंथियों के सहयोग से चंद्र सिंह ने गढ़वाल में प्रवेश किया। 1967 में इन्होंने कम्युनिस्ट के उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ा पर हार गए। एक अक्टूबर 1979 को उनका लंबी बीमारी के बाद निधन हो गया। 1994 में भारत सरकार ने उनके सम्मान में एक डाक टिकट भी जारी किया गया। उत्तराखंड राज्य गठन के बाद उनके नाम से कई योजनाएं चलाई गई। जिनमें पर्यटन, स्वरोजगार और मेडिकल कॉलेज के नाम से संचालित हैं।

भाजपा की नजर 14 विधानसभा सीटों पर
वीर चंद्र सिंह गढवाल के पैतृक गांव और पौड़ी जिले में भाजपा ने चुनावी साल में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के जरिए कई समीकरणों को साधने की कोशिश की है। इस पूरे कार्यक्रम के लिए डॉ धन सिंह रावत की और से भी लगातार कोशिश की जा रही थी, जिसमें वे काफी हद तक कामयाब रहे हैं। इसके साथ ही वे पार्टी और हाईकमान के सामने एक बार फिर अपना दबदबा कायम रखने में कामयाब हुए हैं। धन सिंह रावत श्रीनगर सीट से विधायक हैं। गढ़वाल संसदीय सीट पर 14 विधानसभा सीटें आती हैं जिसमें बद्रीनाथ, थराली, कर्णप्रयाग, केदारनाथ, रुद्रप्रयाग, देवप्रयाग, नरेंद्रनगर, यमकेश्वर, पौड़ी, श्रीनगर, चौबट्टाखाल, लैंसडाउन, कोटद्वार और रामनगर हैं। इन सभी सीटों पर ठाकुर वोटर प्रतिशत भी ज्यादा है। इस तरह से इस कार्यक्रम के जरिए भाजपा ने एक तीर से कई निशाना साधा है।

चुनाव से पहले ही आती है भाजपा को याद
भाकपा माले के गढवाल सचिव इंद्रेश मैखुरी ने डॉ धन सिंह रावत पर निशाना साधते हुए कहा कि चुनाव से ठीक पहले भी धन सिंह ने तत्कालीन रक्षामंत्री मनोहर पर्रिकर को गढवाली के समाधी स्थल पीठसैंण लेकर गए थे और अब फिर चुनाव से पहले रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह को लेकर आए हैं। उन्होंने कहा कि भाजपा के पास नायकों की कमी है। इंद्रेश मैखुरी ने कहा कि चंद्र सिंह गढवाली जीवन भर सांप्रदायिक सौहार्द के लिए लड़े, जबकि भाजपा सांप्रदायिक बंटवारे की राजनीति करती है। ऐसे में गढवाली जी की विचारधारा भाजपा की विचारधारा को कोई मेल नहीं है। भाजपा के पास नायकों की कमी है। गढवाली हमेशा कम्यूनिस्ट रहे। कांग्रेस में भी नही गए। चुनाव भी कम्यूनिस्ट पार्टी से लड़ा। जहां तक गढवाली के नाम पर योजनाओं की बात है तो राज्य सरकारों ने जो-जो गढ़वाली जी के नाम पर योजनाएं चलाई हैं, दुर्भाग्यवश वे सभी भ्रष्ट्राचार का अड्डा बना हुआ है। जिसको लेकर हमेशा गढवाली ने विरोध किया।
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