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Draupadi Ka Danda: पांडवों के स्वर्गारोहण जाते हुए यहां द्रौपदी हुई थीं बेहोश, नाग ताल की होती है पूजा

Draupadi Ka Danda: स्वर्गारोहण जाते द्रौपदी यहीं बेहोश हुईं

उत्तराखंड को देवभूमि कहा जाता है। यहां देवताओं का वास माना जाता है। देवभूमि में कई हिंदू देवी देवताओं के मंदिर हैं। जिनका यहां से कुछ खास नाता रहा है। ऐसी ही एक जगह है उत्तरकाशी में द्रौपदी का डांडा पर्वत। जहां नेहरू पर्वतारोहण संस्थान के प्रशिक्षणार्थी ट्रेनिंग के लिए जाते हैं। द्रौपदी का डांडा नाम कैसे पढ़ा इसको लेकर पौराणिक मान्यता है कि द्रौपदी का डांडा वही जगह है जहां द्रौपदी स्वर्गारोहण के दौरान बेहोश हुई थीं।

द्रौपदी का डांडा का नाम कैसे पड़ा

द्रौपदी का डांडा का नाम कैसे पड़ा

नेहरू पर्वतारोहण के प्रशिक्षणार्थी द्रौपदी के डांडा में ही ट्रेनिंग के लिए जाते हैं। रविवार को यहां हुए हिमस्खलन से अब तक 19 लोगों के शव बरामद हुए हैं, 10 अब भी लापता है। द्रौपदी का डांडा का नाम कैसे पड़ा इसको लेकर स्थानीय लोगों के पास जानकारी है।

द्रौपदी डांडा वहां पर पौराणिक मान्यता है कि द्रौपदी बेहोश हुई

द्रौपदी डांडा वहां पर पौराणिक मान्यता है कि द्रौपदी बेहोश हुई

उत्तरकाशी के पंडित प्रकाश चंद्र नौटियाल शास्त्री बताते हैं कि पांडव अंतिम समय में स्वर्गारोहण के लिए उच्च हिमालय की तरफ निकले थे। स्वर्गारोहण के दौरान ये कहा गया कि कोई भी पीछे मुड़कर नहीं देखेगा। जिसने पीछे मुड़कर देखा वो आगे नहीं जा पाया। सिर्फ युधिष्ठिर और एक कुत्ता ही स्वर्ग पहुंचे थे। बाकि सभी रास्ते में बेहोश हो गए। जिस जगह को द्रौपदी डांडा कहा जाता है। वहां पर पौराणिक मान्यता है कि द्रौपदी बेहोश हुई थी। डांडा पहाड़ी शब्द है, जिसका मतलब होता है चोटी।

गंगोत्री, यमुनोत्री, केदारनाथ, बद्रीनाथ चारोंधाम इसी पर्वत श्रृखंला से जुड़े

गंगोत्री, यमुनोत्री, केदारनाथ, बद्रीनाथ चारोंधाम इसी पर्वत श्रृखंला से जुड़े

प्रकाश चंद्र नौटियाल शास्त्री बताते हैं कि पांडव स्वर्गारोहण के समय केदारनाथ होते हुए हिमालय के रास्ते सेमुरू पर्वत से होकर गए। गंगोत्री, यमुनोत्री, केदारनाथ, बद्रीनाथ चारोंधाम इसी पर्वत श्रृखंला से जुड़े हैं। स्वर्गारोहण का रास्ता चारों धाम की पर्वत श्रृंखला से माना गया है। उत्तरकाशी में भटवाड़ी क्षेत्र के ग्रामीण इस पर्वत की पूजा करते हैं। इसकी तलहाटी में खेड़ा ताल है जिसे नाग देवता का ताल मानते हैं।

 भुक्की में प्रसिद्ध नाग, जो सेमनागराजा वाले नाग माने जाते

भुक्की में प्रसिद्ध नाग, जो सेमनागराजा वाले नाग माने जाते

द्रौपदी डांडा भुक्की गांव से होकर जाता है। भुक्की में प्रसिद्ध नाग देवता का मंदिर भी है। जो कि सेमनागराजा वाले नाग माने जाते हैं। इसके ऊपर ही भुक्की नाग ताल भी है। भुक्की और हुरी दो गांवों में नाग देवता का प्रसिद्ध मंदिर है। जो कि सेमनागराजा गए थे।

द्रौपदी का डांडा समुद्रतल से 18600 फीट की ऊंचाई पर

द्रौपदी का डांडा समुद्रतल से 18600 फीट की ऊंचाई पर

द्रौपदी का डांडा समुद्रतल से 18600 फीट की ऊंचाई पर स्थित है। उत्तरकाशी से पहले भटवाड़ी करीब 40 किमी सड़क मार्ग है। यहां से तीन किमी की पैदल दूरी पर भुक्की गांव है। यहां से 3 किमी आगे तेल कैंप, आगे 3 किमी दूर गुर्जर हट, फिर 4 किमी की दूरी पर बेस कैंप है। बेस कैंप से ढाई किमी की दूरी पर है एडवांस बेस कैंप। यहां से करीब ढाई किमी दूर डोकराणी बामक ग्लेशियर है। यहां पर समिट कैंप लगाया जाता है।

नेहरू पर्वतारोहण संस्थान, भारत के प्रमुख पर्वतारोहण संस्थानों में

नेहरू पर्वतारोहण संस्थान, भारत के प्रमुख पर्वतारोहण संस्थानों में

नेहरू पर्वतारोहण संस्थान 14 नवंबर 1965 को स्थापित किया गया था। यह भारत के प्रमुख पर्वतारोहण संस्थानों में से एक है, जिसकी एशिया में पहचान है। द्रौपदी का डांडा पर्वत को पर्वतारोहण के एडवांस कोर्स के लिए सबसे बेहतर माना जाता है। निम पर्वतारोहण के एडवांस कोर्स के लिए इस पर्वत का ही उपयोग करता है।

 एनआईएम के इतिहास में पहली बार ऐसी घटना हुई

एनआईएम के इतिहास में पहली बार ऐसी घटना हुई

द्रौपदी का डांडा डोकरानी बामक ग्लेशियर जिस जगह से शुरू होता है वहां से द्रौपदी का डांडा की चढ़ाई शुरू होती है। द्रौपदी का डांडा पर्वत की ऊंचाई 5006 मीटर बताई जा रही है। एडवांस कोर्स के लिए द्रौपदी का डांडा का ही प्रयोग किया जाता है। एनआईएम के इतिहास में पहली बार ऐसी घटना हुई है।

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