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Uttarakhand Glacier Burst: जहां फटा ग्लेशियर वहीं से शुरू हुआ था 51 साल पहले चिपको आंदोलन

Uttarakhand Glacier Burst : देवभूमि उत्तराखंड को एक बार फिर प्रकृति का प्रकोप झेलना पड़ा है। आज से करीब साढ़े 7 साल पहले 2013 में यहां जो कुदरत का कहर दिखने को मिला था, वही तस्वीर एक बारगी फिर नजरों के सामने आ गई। रविवार को चमोली जिले में ग्लेशियर टूटने से ऋषिगंगा और धौलीगंगा नदियों में भयंकर उफान आ गया, जिससे वहां बन रहा पावर प्रोजेक्ट पूरी तरह से तबाह हो गया। इस घटना में अभी तक 18 लोगों की जान गई है, जबकि 200 से ज्यादा लोग लापता बताए जा रहे हैं। पिछले एक दशक से जो हालात देवभूमि में दिखाई दिए, उसको एक महिला ने करीब 50 साल पहले ही भाप लिया था। साथ ही लोगों को इस आने वाले खतरे से आगाह भी करती रहीं।

जहां ग्लेशियर फटा, वहीं से शुरू हुआ था चिपको आंदोलन

जहां ग्लेशियर फटा, वहीं से शुरू हुआ था चिपको आंदोलन

चमोली जिले के रैणी गांव में जहां ग्लेशियर फटा है। वहीं आज से 51 साल पहले चिपको आंदोलन शुरू हुआ था। साल 1970 में रैणी गांव की गौरा देवी के नेतृत्व में पेड़ों को बचाने के लिए इस आंदोलन की शुरुआत हुई। गौरा देवी के साथ महिलाएं और लोग पेड़ों को बचाने के लिए उनसे लिपट गए थे। इस आंदोलन से पूरे विश्व में पेड़ों की सुरक्षा का संदेश गया था। अफसोस इस बात का है कि जिस धरती से पर्यावरण संरक्षण का संदेश गया वहीं पर कुदरत ने अपना कहर बरपाया। गौरा देवी का साफ कहना था कि अगर हम प्रकृति को नहीं बचा पाएंगे, तो एक दिन इसका बड़ा खामियाजा हमें भुगतना होगा। अगर चमोली जिले की बात करें तो यहां की कुल आबादी 3.90 लाख है। करीब 15 से 20 हेक्टेयर जंगल को नुकसान हुआ है।

ग्लेशियरों का निचला हिस्सा कमजोर

ग्लेशियरों का निचला हिस्सा कमजोर

ये सब कैसे हुआ इसका जवाब साल 2019 में आई एक स्टडी में मिलता है। जर्नल साइंस एडवांसेज में पब्लिस स्टडी से खुलासा हुआ है कि वर्तमान समय में हिमालय के ग्लेशियरों के पिघलने की रफ्तार पिछली सदी के आखिरी 25 साल के मुकाबले दोगुनी हो चुकी है। तापमान बढ़ने से ग्लेशियरों के निचले हिस्से को नुकसान हो रहा है। इस स्टडी के लिए 10 सालों का सैटेलाइट डेटा लिया गया था, जिसमें भारतके साथ चीन, नेपाल और भूटान के आंकड़े शामिल हैं। वहीं जून 2019 की रिपोर्ट के मुताबिक साल 2000 के बाद ग्लेशियर हर साल डेढ़ फीट के बराबर बर्फ खो रहे हैं।

सवालों के घेरे में सरकारी प्रोजेक्ट्स

सवालों के घेरे में सरकारी प्रोजेक्ट्स

देवभूमि में आपदाओं के बाद हमेशा से ही बड़े बांधों और पॉवर प्रोजेक्ट्स पर सवाल उठते रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट भी इस पर अपनी चिंता जाहिर कर चुका है। इतना ही नहीं जल संसाधन मंत्रालय ने 2016 में सुप्रीम कोर्ट के सामने ये माना भी था कि राज्य में गंगा पर कोई भी नया पॉवर प्रोजेक्ट पर्यावरण के लिए बड़ा खतरा साबित होगा। वहीं SC ने 2013 की केदारनाथ त्रासदी के बाद राज्य के 39 में से 24 पॉवर प्रोजेक्ट्स पर रोक लगा दी थी, लेकिन केस कोर्ट में होने के बावजूद भी डैम और पॉवर प्रोजेक्ट्स का काम बदस्तूर जारी है। वहीं ऑल वेदर रोड के काारण भी उत्तराखंड में पर्यावरण को भारी नुकसान पहुंचा है।

 उमा भारती ने कही ये बात

उमा भारती ने कही ये बात

वहीं इस पर भारतीय जनता पार्टी की वरिष्ठ नेता उमा भारती ने प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने कहा कि ये चिंता का विषय है। वो गंगा और उसकी मुख्य सहायक नदियों पर बांध बनाकर पावर प्रॉजेक्ट्स लगाने के खिलाफ थीं। उमा भारती ने ट्वीट कर कहा कि 'जोशीमठ से 24 किलोमीटर दूर पैंग गांव जिला चमोली के ऊपर का ग्लेशियर फिसलने से ऋषि गंगा पर बना हुआ पावर प्रोजेक्ट जोर से टूटा और एक तबाही लेकर आगे बढ़ रहा है। यह हादसा जो हिमालय में ऋषि गंगा पर हुआ यह चिंता और चेतावनी दोनों का विषय हैं।

नहीं भूलता 2013 का वो मंजर

नहीं भूलता 2013 का वो मंजर

इससे पहले जून 2013 का मंजर आज भी लोगों को भूल से भी नहीं भुलाया जा रहा है। 16 जून को बड़ी संख्या में श्रद्धालु केदार बाबा के दर्शन के लिए केदारनाथ पहुंचे थे, तभी वहां पर अचानक मौसम बदला और बादल फट गया। इसके बाद जल सैलाब ने केदारनगरी में भारी तबाही मचाई। अधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक 4400 से ज्यादा लोग इस घटना में मारे गए या फिर लापता हो गए थे। प्रकृति का ऐसा रौद्र रूप देखने को मिली कि सड़क, मकान, पुल सब तबाह हो गए। 16-17 जून को केदारनाथ के साथ ही जल प्रलय ने रुद्रप्रयाग, चमोली, उत्तरकाशी, बागेश्वर, अल्मोड़ा, पिथौरागढ़ जिले में भी भारी तबाही मचाई।

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