Pushkar Singh Dhami: धूमल क्यों चूके थे ? धामी ने कैसे किया धमाल ?
देहरादून, 23 मार्च। ममता बनर्जी की तर्ज पर पुष्कर सिंह धामी भी चुनाव हारने के बाद मुख्यमंत्री बन गए। बुधवार को शपथग्रहण समारोह में उन्होंने एक बार फिर से सीएम पद की शपथ ली है। भाजपा की राजनीति में यह एक नये युग की शुरुआत है।

2017 में हिमाचल प्रदेश में भाजपा के सीएम फेस प्रेम कुमार धूमल चुनाव हार गये थे। लेकिन भाजपा ने उन्हें मुख्यमंत्री नहीं बनाया था। अब ऐसी क्या वजह हुई कि चुनाव हारने के बाद भी धामी को सीएम की कुर्सी सौंप दी गयी ?

2024 के लिए लिया साहसिक फैसला
2017 से 2022 के बीच भाजपा कई अग्निपरीक्षा से गुजरी है। वक्त ने कई सबक सिखाये हैं। 'वन मैन शो' और 'टू मैन आर्मी' की छवि अब पहले की तरह फायदेमंद नहीं रही। बदली हुई परिस्थितियों में पार्टी के जमीनी नेताओं को को महत्व दिया जाना जरूरी था। समर्पित नेताओं और कार्यकर्ताओं को सम्मान दिया जाना, वक्त की मांग थी। भाजपा को यह दिखाना था कि वह अपने पूर्व के फैसले पर बिल्कुल कायम है। हार हो या जीत, वह अपने चुनावी चेहरे के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है। ऐसे ही साहसिक फैसलों से पार्टी में आत्मविश्वास बढ़ता है। नेताओं और कार्यकर्ताओं को पार्टी के प्रति निष्ठावान होने की प्रेरणा मिलती है। उत्तर प्रदेश में भाजपा को 2017 की तरह जीत नहीं मिली। उसे 57 सीटों का नुकसान हुआ है। यानी उसके प्रभाव में बड़ी कमी आयी है। अगर 2024 में जीत हासिल करनी है तो पार्टी में समर्पित नेताओं की फौज खड़ी करनी होगी। पार्टी की आंतरिक संरचना में जितना लोकतंत्र होगा, आधार उतना ही मजबूत होगा। उत्तराखंड में भी भाजपा को 2017 की तरह जीत नहीं मिली। 2022 में भाजपा को 47 सीटें मिलीं हैं। यानी पिछली बार की तुलना में उसे 10 सीटों का नुकसान हुआ है। कार्यकर्ताओं में उत्साह के संचार के लिए भाजपा को संजीवनी की जरूरत थी। सो उसने पुष्कर सिंह धामी को सीएम बनाने का निर्णय ले लिया।

क्या हुआ था धूमल के साथ?
नवम्बर 2017 में हिमाचल प्रदेश में विधानसभा के चुनाव हुए थे। भाजपा ने पूर्व मुख्यमंत्री प्रेम कुमार धूमल को सीएम उम्मीदवार बना कर चुनाव लड़ा था। चुनाव में पार्टी ने तो शानदार जीत हासिल की लेकिन धूमल सुजानपुर विधानसभा सीट पर चुनाव हार गये। उन्हें कांग्रेस के राजेन्द्र राणा ने करीब साढ़े तीन हजार वोटों से हरा दिया था। भाजपा ने 68 में से 44 सीटें जीत कर दो तिहाई बहुमत प्राप्त किया था। सरकार बनाने के कवायद शुरू हुई तो सबसे बड़ा सवाल ये सामने आया कि सीएम किसे बनाया जाय। पार्टी का एक धड़ा अनुभव के आधार पर धूमल को ही सीम बनाने की लॉबिंग कर रहा था। विचार विमर्श चल ही रहा था कि भाजपा नेतृत्व ने विधायक जयरामठाकुर को अचानक दिल्ली बुला लिया। किसी को मालूम नहीं था कि जयराम ठाकुर किस लिए दिल्ली गये हैं। वे सिराज विधानसभा क्षेत्र से पांचवीं बार विधायक बने थे। 52 साल के जयराम ठाकुर को आंतरिक गुजबाजी से भी कोई मतलब नहीं था। उस समय प्रेम कुमार धूमल की उम्र 72 साल थी। जब धूमल को ये बात मालूम हुई कि जयराम ठाकुर के दिल्ली गये हैं तो वे भी अपनी गोटी सेट करने के लिए सक्रिय हो गये। दांव-पेंच शुरू हो गया। इसकी वजह से भाजपा तत्काल जयराम ठाकुर के नाम का एलान न कर सकी। उसने थोड़ा इंतजार किया। धूमल खेमा को समझाया गया कि जयराम ठाकुर ही अगले मुख्यमंत्री होंगे और ये फैसला बिल्कुल अटल है। तब जा कर धूमल के समर्थक शांत हुए।

धामी का धमाल
उत्तराखंड चुनाव से छह महीना पहले पुष्कर सिंह धामी को मुख्यमंत्री बनाना, भाजपा का एक बड़ा फैसला था। इसकी दो वजहें थीं। एक तो एंटी इनकम्बेंसी फैक्टर से बचने के लिए ऐसा किया था। दूसरा यह कि पार्टी में आंतरिक गुटबाजी खत्म करने के लिए कोई नया चेहरा चाहिए था। 2022 का विधानसभा चुनाव धामी के मुख्यमंत्री रहते हुए लड़ गया। वे भले चुनाव हार गये लेकिन उन्होंने पार्टी को लगातार दूसरी बार सत्ता के सिंहासन पर बैठा दिया। आज तक उत्तराखंड में कोई मुख्यमंत्री अपनी पार्टी को लगातार दूसरी बार जीत नहीं दिला सका था। इस लिहाज से पुष्कर सिंह धामी की यह उपलब्धि बहुत खास थी। पार्टी ने उन्हें जिस मकसद के लिए मुख्यमंत्री बनाया था वह पूरा हो गया था। सिर्फ छह महीने के शासन में उन्होंने भाजपा को बहुमत के पार पहुंचा दिया। ऐसी कामयाबी को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता था। क्या हुआ अगर धामी चुनाव हार गये, उनको काम का ईनाम तो मिलना ही चाहिए था। लेकिन भाजपा इस नतीजे पर पहुंचने के पहले व्यापक विचार विमर्श करना चाहती थी। उसने संगठन के सभी अधिकारियों, सांसदों, विधायकों से इस मसले पर बातचीत की। जब कई विधायकों ने धामी के लिए अपनी सीट छोड़ने की पेश कर दी तो पार्टी नेतृत्व के सामने तस्वीर साफ हो गयी। तब सीएम पद के लिए पुष्कर सिंह धामी के नाम पर मुहर लग गयी।
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