Teelu Rauteli: पहाड़ में पराक्रम, महिलाओं के शौर्य का प्रतीक, जानिए वीरांगना के बारे में, इन्हें मिलेगा सम्मान
उत्तराखंड की वीरांगना तीलू रौतेली की 8 अगस्त को जयंती है। इस दिन राज्य सरकार प्रदेश की महिलाओं के सम्मान में तीलू रौतेली जयंती मनाती है और तीलू रौतेली पुरस्कार से भी सम्मानित करती हैं। जिनका समाज के लिए खास योगदान है।
उत्तराखंड की वीरांगना तीलू रौतेली की 8 अगस्त को जयंती है। इस दिन राज्य सरकार प्रदेश की महिलाओं के सम्मान में तीलू रौतेली जयंती मनाती है और तीलू रौतेली पुरस्कार से भी सम्मानित करती हैं। जिनका समाज के लिए खास योगदान है। तीलू रौतेली पहाड़ में पराक्रम और महिलाओं के शौर्य का प्रतीक हैं। जो कि पिता भाई और मंगेतर की शहादत का बदला लेते हुए वीरांगना बन गई।

उत्तराखंड में सत्रहवीं शताब्दी में तीलू रौतेली वीरांगना ने 15 वर्ष की आयु में दुश्मनों के साथ 7 वर्ष तक युद्धकर 13 गढ़ों पर विजय पाई थी और वह अंत में अपने प्राणों की आहुति देकर वीरगति को प्राप्त हो गई थी। तीलू रौतेली का मूल नाम तिलोत्तमा देवी था। जन्म आठ अगस्त 1661 को ग्राम गुराड़, चौंदकोट,पौड़ी गढ़वाल, के भूप सिंह रावत और मैणावती रानी के घर में हुआ।
भूप सिंह गढ़वाल नरेश फतहशाह के दरबार में थोकदार थे। तीलू के दो भाई भगतु और पत्वा थे। तीलू 15 वर्ष की होते ही घुड़सवारी और तलवार बाजी में निपुण हो गई। 15 वर्ष की उम्र में ईडा चौंदकोट के थोकदार भूम्या सिंह नेगी के पुत्र भवानी सिंह के साथ तीलू की सगाई कर दी गई। उस समय गढ़नरेशों और कत्यूरियों में प्रतिद्वंदिता चल रही थी। कत्यूरी नरेश धामदेव ने जब खैरागढ़ पर आक्रमण किया तो गढ़नरेश मानशाह वहां की रक्षा की जिम्मेदारी भूप सिंह को सौंपकर खुद चांदपुर गढ़ी में आ गया।
भूप सिंह ने आक्रमणकारियों का डटकर मुकाबला किया, लेकिन इस युद्ध में वे अपने दोनों बेटों और तीलू के मंगेतर के साथ वीरतापूर्वक लड़ते हुए शहीद हो गए। पिता भाई और मंगेतर की शहादत के बाद 15 वर्षीय तीलू रौतेली ने कमान संभाली। तीलू ने अपने मामा रामू भण्डारी सलाहकार शिवदत्त पोखरियाल व सहेलियों देवकी और बेलू आदि के संग मिलकर एक सेना का गठन किया । तीलू अपनी सहेलियों देवकी व वेलू के साथ मिलकर दुश्मनों के साथ लड़ती रही।
उन्होंने सात वर्ष तक लड़ते हुए खैरागढ, टकौलीगढ़, इंडियाकोट भौनखाल, उमरागढी, सल्टमहादेव, मासीगढ़, सराईखेत, उफराईखाल, कलिंकाखाल, डुमैलागढ, भलंगभौण व चौखुटिया सहित 13 किलों पर विजय पाई। 15 मई 1683 को विजयोल्लास में तीलू अपने अस्त्र शस्त्र को तट नयार नदी पर रखकर नदी में नहाने उतरी, तभी दुश्मन के एक सैनिक ने उसे धोखे से मार दिया।
तीलू रौतेली का ऐतिहासिक गांव पौड़ी जिले के चौंदकोट परगना के अंतर्गत आता है। प्रदेश सरकार ने गांव में वीरांगना तीलू रौतेली की प्रतिमा स्थापित की है। साल 2023 में भी 13 महिलाओं और किशोरियों को राज्य स्तरीय तीलू रौतेली पुरस्कार और 35 आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं को आंगनबाड़ी कार्यकर्ता पुरस्कार के लिए चयन किया है। इसमें दिव्यांग खिलाड़ी मोहिनी कोरंगा एवं नीलिमा राय समेत कई का चयन किया गया है।
आंगनबाड़ी कार्यकर्ता पुरस्कार के लिए नैनीताल जिले से धनी मेवाड़ी, तारा भट्ट ,नीतू अल्मोड़ा जिले से चंद्रा देवी, उमा आर्य, पुष्पा और शीला देवी का चयन किया गया है। वही बागेश्वर जिले से जानकी देवी, लीलावती देवी, अनीता नेगी, शशि कला, चंपावत जिले से उर्मिला बिष्ट, देहरादून से शहनाज व सारो देवी, हरिद्वार से यशोदा शर्मा, शशि, रूबी, रुकय्या का चयन किया गया है।












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