Raksha Bandhan 2023: जानिए कौन हैं उत्तराखंड की 'पिरूल वुमेन', जिनकी राखियों की देश-विदेश तक है डिमांड

उत्तराखंड में अल्मोड़ा जिले के द्वाराहाट के हाट गांव की रहने वाली मंजू आर साह की पिरूल से बनी राखियों की जबरदस्त डिमांड है। जो कि उत्तराखंड ही नहीं देश विदेश तक फेमस होती जा रही है।

उत्तराखंड में अल्मोड़ा जिले के द्वाराहाट के हाट गांव की रहने वाली मंजू आर साह की पिरूल से बनी राखियों की जबरदस्त डिमांड है। जो कि उत्तराखंड ही नहीं देश विदेश तक फेमस होती जा रही है। मंजू शाह 2010 से पिरूल से बने प्रोडेक्ट तैयार कर रही हैं। साथ ही अब तक 800 से ज्यादा महिलाओं को इसकी ट्रेनिंग देकर अपने साथ जोड़ चुकी हैं। जिस वजह से मंजू शाह को अब लोग 'पिरूल वुमेन' के नाम से पहचानने लगे हैं। मंजू ने बताया कि उत्तराखंड के कौने कौने से लोग उनसे राखी की डिमांड कर रहे हैं। जिसमें अब देश विदेश से भी लोग राखियां मंगा रहे हैं। उन्होंने एक राखी की कीमत मात्र 50 रुपए रखी है।

Raksha Bandhan 2023: Know who is Pirul Woman Uttarakhand, whose rakhi demand across country abroad

रक्षाबंधन के दौरान मंजू ने सबसे ज्यादा राखियां पर ही फोकस किया है। मंजू ने बताया कि 2009 में शादी होने के बाद 2010 में उन्होंने पहली बार पिरूल से प्रोडेक्ट तैयार करने की ट्रेनिंग लेकर काम शुरू किया। इसके बाद उन्होंने इससे कई आइटम तैयार किए। आज वे अपने साथ 800 से ज्यादा महिलाओं को जोड़ चुकी हैं जो कि इससे आर्थिक रुप से भी मजबूत होती जा रही है। मंजू ने बताया कि उन्हें बचपन से ही इस तरह वेस्ट से प्रोडेक्ट बनाने का शौक था, जो कि अब उनके लिए एक पहचान बन चुकी है।

मंजू आर साह ने अपनी बेजोड़ हस्तशिल्प कला से पहाड़ के जंगल में उगने वाले चीड़ के पत्ते (पिरूल) से स्वरोजगार का एक नया अनोखा प्रयोग शुरू किया है। मंजू पिरूल से टोकरी, पूजा थाल, फूलदान, आसन, पेन स्टैंड, डोरमैट, टी कोस्टर, डाइनिंग मैट, ईयररिंग, फूलदान, मोबाइल चार्जिंग पॉकेट, पर्स, हैट, पेंडेंट, अंगूठी, सहित तमाम तरीके के साज-सज्जा के उत्पाद भी बना रही हैं,जो लोगों को बेहद पसंद आ रहे हैं।

मंजू राजकीय बालिका इंटर कॉलेज ताड़ीखेत अल्मोड़ा में प्रयोगशाला सहायक के पद पर कार्यरत हैं। लेकिन घर की आर्थिकी को मजबूत करने के लिए उन्होंने इस काम को अपने स्वरोजगार से जोड़ा। मंजू अब कई महिलाओं को युवतियों की गुरू बन चुकी हैं। जिसके बाद कई महिलाएं और युवतियां अपने काम को आगे बढ़ा रही हैं। मंजू के सारे प्रोडेक्ट ऑनलाइन भी उपलब्ध हैं। पिरूल को उत्तराखंड के जंगलो के लिए अभिशाप माना जाता है। लेकिन मंजू की तर​ह कई महिलाएं इस अभिशाप को वरदान बनाने में जुट गई हैं।

उत्तराखण्ड में 500 से 2200 मीटर की ऊंचाई पर बहुतायत से पाये जाने वाले चीड़ के पेड़ों की पत्तियों को पिरूल नाम से जाना जाता है। उत्तराखण्ड वन सम्पदा के क्षेत्र में चीड़ के वन भी प्रचुर मात्रा में उपलब्ध हैं। इसके सूखे पत्ते अत्यन्त ज्वलनशील होते हैं। पर्वतीय क्षेत्रों में वनाग्नि के मुख्य कारणों में पिरूल भी एक कारण है। चीड़ के पेड़ पर लगने वाले ठीटे का थोड़ा बहुत व्यावसायिक उपयोग शो पीस बनाकर किया जाता रहा है, जो कि पर्यटकों को भी पसंद आता रहा है।

इसके अलावा पिरुल का उपयोग जानवरों के बिछावने के रूप में होता आ रहा है। इसके अलावा पिरुल का अब तक कोई खास इस्तेमाल नहीं हुआ है। दावा है कि 1970 के दशक में नैनीताल जिले के कैंची नामक स्थान में 'नवीन पाइनैक्स' नाम से नवीन नाम के एक उद्यमी ने पिरूल से रेशा तैयार कर वस्त्र उद्योग में इसका इस्तेमाल कर एक पहल की थी। लेकिन ये पायलेट प्रोजेक्ट ज्यादा दिन नहीं चल पाया।

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