'जमीन ही नहीं रोजगार-संस्कृति खोने का भी डर', पढ़िए भू-कानून आंदोलन की पूरी कहानी
डेढ माह से युवाओं ने छेडा है भू कानून के खिलाफ आंंदोलन
देहरादून, 26 अगस्त। उत्तराखंड के युवा इन दिनों सख्त भू कानून की मांग कर रहे हैं। खास बात ये है कि गैर राजनैतिक संगठनों के साथ मिलकर युवाओं ने अब राज्य सरकार के खिलाफ आर-पार की लड़ाई लड़ने का ऐलान कर दिया है। साथ ही इन युवाओं ने किसी भी राजनैतिक दल का समर्थन लेने से इनकार करते हुए बिना किसी बैनर के तले आंदोलन लड़ने की बात की हैा ये बात अलग है कि कांग्रेस से लेकर यूकेडी तक इस आंदोलन में खुद को जोड़ने की बात कर रहे हैं। युवाओं का कहना है कि उत्तराखंड में जब तक सख्त भू कानून नहीं बन जाता तब तक उनकी लड़ाई जारी रहेगी।

जुलाई से चला रहे युवा आंदोलन
बीते 11 जुलाई 2021 को कॉलेज में पढ़ने वाले कुछ छात्रों ने 3 अलग-अलग समिति बनाकर भू कानून के खिलाफ मोर्चा खोला। इस समिति में अधिकतर युवाओं के साथ ही कुछ महिलाएं भी जुड़ी। जिनकी संख्या अब 500 को पार कर चुकी है। इस संगठन ने अब तक अजपने आंदोलन को किसी बेनर के नीचे नहीं रखने का फैसला लिया है। टीम का नेतृत्व कर रहे टिहरी गढ़वाल के आशीष नौटियाल ने बताया कि लंबे समय से वे सोशल मीडिया में #उत्तराखंड_मांगे_भू_कानून चला रहे हैं। इसके अलावा विधानसभा से लेकर कई इलाकों में वे भू कानून को लेकर विरोध प्रदर्शन कर चुके हैं। आशीष ने बताया कि राज्य आंदोलनकारी मंच और अन्य कुछ गैर राजनैतिक संगठनों को साथ लेकर अब वे आर-पार की लड़ाई लड़ रहे हैं। हिमाचल प्रदेश की तर्ज पर उत्तराखंड के युवा भी राज्य में भू कानून चाहते हैं.
भू कानून में संसोधन नहीं हुआ तो हो जाएंगे बेरोजगार
आशीष का दावा है कि जब से कठोर भू कानून में संसोधन हुआ है तब से पहाड़ के युवाओं में बेरोजगारी बढ़ती जा रही है। साथ ही हमारी संस्कृति और विरासत भी खोने का डर सताने लगा है। उन्होंने कहा कि बाहरी व्यक्ति उत्तराखंड में आकर यहां अपने परिवार के साथ बसने लगा है। यहां आकर वे यहां रोजगार पर भी हक जमा रहे हैं। जिससे पहले से ही बेरोजगारी की मार झेल रहे युवाओं को दूसरी समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। इतना ही नहीं बाहरी व्यक्ति आकर यहां की संस्कृति और विरासत को नहीं अपना रहा है। जिससे हमारा अस्तित्व खतरे में हैं। उन्होंने राज्य सरकार से उत्तराखंड में भू कानून को लेकर जल्द से जल्द अपना विजन स्पष्ट करने की मांग की है।
यूपी के समय में ले गई राज्य सरकार
राज्य आंदोलनकारी मंच के जिलाध्यक्ष प्रदीप कुकरेती का कहना है बीजेपी की त्रिवेंद्र रावत सरकार ने राज्य के लोगों को एक बार फिर यूपी के समय में लाकर खड़ा कर दिया है। जब हम अपनी जमीन और संस्कृति को बचाने के लिए संघर्ष करते थे। उन्होंने कहा कि प्रदेश बनने के बाद एक बार फिर यहां के लोगों को अपने अधिकार के लिए लड़ना पड़ रहा है। जमीनें हमारी और उनपर कब्जा कर रहे हैं बाहरी। प्रदीप कुकरेती का कहना है कि राज्य आंदोलन की लड़ाई जिस उद्देश्य से लड़ी गई। वह पूरा करने के लिए एक बार फिर सभी को मिलकर राज्य सरकार के खिलाफ अपना आंदोलन लड़ना होगा। जिसके लिए गैर राजनैतिक संगठन एकजुट होने लगे हैं।
सरकार का दावा सुझावों पर होगा अमल
गैर राजनैतिक संगठनों के एकजुट होने के बाद से मुख्य विपक्षी कांग्रेस और क्षेत्रीय दल यूकेडी भी भू कानून के मुद्दे पर सरकार पर गंभीर आरोप लगा रही है। कांग्रेस के विधायक मनोज रावत ने भू कानून को लेकर विधानसभा में प्राइवेट मेंबर बिल भी लाया। लेकिन सरकार की और से मंत्री सुबोध उनियाल ने यह बयान दिया कि सरकार इस विषय पर जिलाधिकारियों से सुझाव ले रही है। ताकि इससे जुड़े कई बिंदुओं पर संसोधन हो सके। चुनावी साल में सरकार और विपक्ष हर कोई भू कानून के मुद्दे पर खुद को राज्य के हित में होने वाले बदलाव की बात कर रहा है। लेकिन ये बात तय है कि चुनावी साल में भू कानून के मुद्दे को लेकर सत्ता दल और विपक्ष जमकर राजनीति कर रहे हैं।
क्या है उत्तराखंड भू कानून?
साल 2000 में उत्तराखंड राज्य बना। प्रदेश में बड़े स्तर पर हो रही कृषि भूमि की खरीद फरोख्त, अकृषि कार्यों और मुनाफाखोरी की शिकायतों पर साल 2002 में कांग्रेस सरकार के तत्कालीन मुख्यमंत्री एनडी तिवारी ने संज्ञान लेते हुए साल 2003 में 'उत्तर प्रदेश जमींदारी विनाश एवं भूमि सुधार अधिनियम, 1950' में कई बंदिशें लगाईं. इसके बाद किसी भी गैर-कृषक बाहरी व्यक्ति के लिए प्रदेश में जमीन खरीदने की सीमा 500 वर्ग मीटर हो गई. इसके बाद साल 2007 में बीजेपी की सरकार आई और तत्कालीन मुख्यमंत्री बीसी खंडूरी ने अपने कार्यकाल में पूर्व में घोषित सीमा को आधा कर 250 वर्ग मीटर कर दिया. लेकिन यह सीमा शहरों में लागू नहीं होती थी. 2017 में भाजपा सरकार आने के बाद इस अधिनियम में संशोधन करते हुए प्रावधान कर दिया गया कि अब औद्योगिक प्रयोजन के लिए भूमिधर स्वयं भूमि बेचे या फिर उससे कोई भूमि खरीदे तो इस भूमि को अकृषि करवाने के लिए अलग से कोई प्रक्रिया नहीं अपनानी होगी. औद्योगिक प्रयोजन के लिए खरीदे जाते ही उसका भू उपयोग अपने आप बदल जाएगा और वह अकृषि या गैर कृषि हो जाएगा. इसी के साथ गैर कृषि व्यक्ति द्वारा खरीदी गई जमीन की सीमा को भी समाप्त कर दिया गया. अब कोई भी कहीं भी जमीन खरीद सकता हैा












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