महाशिवरात्रि: देहरादून के टपकेश्वर में चट्टान से टपकती है पानी की बूंदे, प्रकाशेश्वर में नहीं चढ़ता दान
1 मार्च को महाशिवरात्रि, शिव मंदिर के खास महत्व और रहस्य
देहरादून, 28 फरवरी। 1 मार्च को महाशिवरात्रि है। शिवभक्त इस दिन का बेसब्री से इंतजार करते हैं, जब भोलेनाथ के दर्शन और व्रत के जरिए भक्त अपने भगवान को प्रसन्न करने के लिए शिव मंदिर पहुंचते हैं। उत्तराखंड देवभूमि है, जहां भगवान शिव के कई मंदिर हैं। जानते हैं देहरादून के शिवमंदिर के बारे में, जिनका कुछ खास महत्व और रहस्य है। देहरादून में सबसे प्रसिद्ध शिवमंदिर में टपकेश्वर महादेव मंदिर है। टपकेश्वर महादेव मंदिर में शिवलिंग पर एक चट्टान से पानी की बूंदे टपकती रहती हैं।

गुरु द्रोणाचार्य भगवान शिव की तपस्या करने के लिए यहां आए
टपकेश्वर महादेव शिवजी को समर्पित एक गुफा मंदिर है। मंदिर का मुख्य गर्भगृह एक प्राकृतिक गुफा के अंदर स्थित है। गुफा से गिरने वाली पानी की बूंदे लगातार शिव लिंग पर गिरती रहती हैं। इसी कारण इसका नाम टपकेश्वर पड़ा था। मंदिर के आस-पास जंगल और टोंस नदी भी बहती है। वहीं, मंदिर परिसर की एक गुफा में माता वैष्णो देवी का भी मंदिर है। इसके अलावा एक अन्य शिवलिंग भी हैं। शिवलिंग को ढंकने के लिए 5151 रुद्राक्ष का इस्तेमाल किया गया है। मान्यता है कि महाभारत के समय कौरव और पांडवों के गुरु द्रोणाचार्य भगवान शिव की तपस्या करने के लिए यहां आए थे। उन्होंने 12 साल तक भगवान शिव की तपस्या की थी। इस तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने गुरु द्रोण को दर्शन दिए थे। गुरु द्रोण के अनुरोध पर भगवान शिव लिंग के रूप में यहां पर स्थापित हुए थे। भगवान शिव की पूजा के कारण ही गुरु द्रोण को अश्वत्थामा के रूप में पुत्र की प्राप्ति हुई। अश्वत्थामा ने मंदिर की गुफा में छह माह एक पांव पर खड़े होकर भगवान शिव की तपस्या की। ऐतिहासिक श्री टपकेश्वर महादेव मंदिर देहरादून शहर से करीब छह किलोमीटर दूर गढ़ी कैंट छावनी क्षेत्र में तमसा नदी के तट पर स्थित है। महाभारत काल से पूर्व गुरु द्रोणाचार्य के तप से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने दर्शन दिए। गुरु द्रोण के अनुरोध पर ही भगवान शिव जगत कल्याण को लिंग के रूप में स्थापित हो गए। इसके बाद द्रोणाचार्य ने शिव की पूजा की और अश्वत्थामा का जन्म हुआ। अश्वत्थामा ने मंदिर की गुफा में छह माह एक पांव पर खड़े होकर भगवान शिव की तपस्या की और जब भगवान प्रकट हुए तो उनसे दूध मांगा। इस पर प्रभु ने शिवलिंग के ऊपर स्थित चट्टान में गऊ थन बना दिए और दूध की धारा बहने लगी। इसी कारण से भगवान शिव का नाम दूधेश्वर पड़ गया। कलियुग में दूध की धारा जल में परिवर्तित हो गई, जो आज भी निरंतर शिवलिंग पर गिर रही है। इस कारण इस स्थान का नाम टपकेश्वर पड़ गया। टपकेश्वर मंदिर में शिवरात्रि को लेकर खास तैयारियां की जाती हैं। रात में ही भक्तों की दर्शन और जलाभिषेक के लिए भीड़ जुटनी शुरू होती है।
प्रकाशेश्वर महादेव मंदिर, यहां नहीं चढ़ता है कुछ भी दान
देहरादून-मसूरी रोड पर स्थित प्रकाशेश्वर महादेव मंदिर का भी देहरादून आने वाले पर्यटक और श्रद्धालु जरुर दर्शन के लिए पहुंचते हैं। इस मंदिर में किसी भी तरह का दान स्वीकार नहीं किया जाता है। मंदिर परिसर में हर समय रसोई में मिलने वाला प्रसाद और चाय भी खास है जो कि निशुल्क मिलती है। मंदिर में स्थापित शिवलिंग, दुर्लभ पत्थरों और स्फटिक के बने हुए हैं। स्फटिक एक प्रकार का बर्फ का पत्थर है, जो लाखों वर्ष बर्फ में दबे होने से बनता है। यह दिखने पारदर्शी और कठोर होता है। प्रकाशेश्वर शिव मंदिर अपनी अनूठी वास्तुकला के लिए जाना जाता है। मंदिर के ऊपर लगभग 150 त्रिशूल बने हुए हैं। हालांकि मंदिर को रोजाना फूलों से सजाया जाता है। लेकिन महाशिवरात्रि में यहां विशेष पूजाएं आयोजित की जाती हैं।












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