द्वितीय केदार मदमहेश्वर के कपाट खुलने की प्रक्रिया शुरू, जानिए कब खुल रहे हैं कपाट और क्या है पौराणिक महत्व

द्वितीय केदार भगवान मदमहेश्वर के कपाट खुलने की प्रक्रिया आज बृहस्पतिवार 16 मई से शुरू हो गई है। मदमहेश्वर के कपाट 20 मई को पूर्वाह्न 11.15 दर्शनार्थ खुल जायेंगे।

श्री बदरीनाथ- केदारनाथ मंदिरसमिति( बीकेटीसी) अध्यक्ष अजेंद्र अजय ने बताया कि मदमहेश्वर मंदिर के कपाट खुलने की तैयारियां पूरी कर ली गई हैं।

Madmaheshwar temple process opening doors Second Kedar begins when doors opening what mythological

कपाट खुलने की प्रक्रिया के अंतर्गत भगवान मदमहेश्वर की चल विग्रह उत्सव डोली आज शीतकालीन गद्दी स्थल ओकारेश्वर मन्दिर ऊखीमठ मंदिर सभामंडप में दर्शनार्थ विराजमान होगी। इस अवसर पर मदमहेश्वर धाम के पुजारी टी गंगाधर लिंग, पुजारी बागेश लिंग, ओंकारेश्वर मंदिर प्रभारी रमेश नेगी सहित पंचगौंडारी हकहकूकधारी तीर्थपुरोहित और श्रद्धालुजन मौजूद रहेंगे। 17 मई को पूजा- अर्चना एवं नये अनाज का भोग लगाकर सर्वकल्याण की कामना की जायेगी।

बीकेटीसी मीडिया प्रभारी डा. हरीश गौड़ बताया कि 18 मई प्रात: को भगवान मदमहेश्वर की चल विग्रह डोली और देव निशान शीतकालीन गद्दी स्थल श्री ओकारेश्वर मन्दिर से श्री राकेश्वरी मंदिर रांसी रात्रि विश्राम को पहुंचेगे। 19 मई को श्री राकेश्वरी मंदिर रांसी से प्रवास हेतु दूसरे पड़ाव गोंडार गांव पहुंचेगी। 20 मई सुबह श्री मदमहेश्वर जी की चल विग्रह डोली गोंडार से श्री मदमहेश्वर धाम पहुंचेगी और पूर्वाह्न शुभ लग्न में सवा ग्यारह बजे श्री मदमहेश्वर जी के कपाट खुलेंगे

पंच केदार उत्तराखंड में भगवान शिव के पांच मंदिरों का समूह है। पौराणिक मान्यता है कि पंच केदार का निर्माण पांडव व उनके वंशजों ने करवाया था। पंच केदार में सबसे पहले आता है केदारनाथ धाम। जो कि 12 ज्योर्तिलिंग के साथ ही चारों धाम में से एक है।

इसके बाद द्वितीय केदार मध्यमेश्वर तृतीय केदार तुंगनाथ व चतुर्थ केदार रुद्रनाथ और पंचम केदार कल्पेश्वर हैं। इनमें से चार केदार शीतकाल में बंद रहते हैं जबकि पंचम केदार कल्पेश्वर वर्षभर खुले रहते हैं।

मध्यमेश्वर धाम मध्यमेश्वर रुद्रप्रयाग जिले में समुद्रतल से 11470 फीट की ऊंचाई पर चौखंभा शिखर की तलहटी में स्थित है। जहां बैल रूप में भगवान शिव के मध्य भाग के दर्शन होते हैं। पौराणिक कथा के अनुसार नैसर्गिक सुंदरता के कारण ही शिव-पार्वती ने मधुचंद्र रात्रि यहीं मनाई थी। मान्यता है कि यहां के जल की कुछ बूंदें ही मोक्ष के लिए पर्याप्त हैं।

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